neyaz ahmad nizami

Tuesday, August 28, 2018

:: हज की फज़ीलत कुरआन व हदीस की रोशनी में ::


कुरआन पाक में अल्लाह तआला फरमाता है ::
إِنَّ أَوَّلَ بَيْتٍ وُضِعَ لِلنَّاسِ لَلَّذِي بِبَكَّةَ مُبَارَكًا وَهُدًى لِّلْعَالَمِينَ فِيهِ آيَاتٌ بَيِّنَاتٌ مَّقَامُ إِبْرَاهِيمَ ۖ وَمَن دَخَلَهُ كَانَ آمِنًا ۗ وَلِلَّهِ عَلَى النَّاسِ حِجُّ الْبَيْتِ مَنِ اسْتَطَاعَ إِلَيْهِ سَبِيلًا ۚ وَمَن كَفَرَ فَإِنَّ اللَّهَ غَنِيٌّ عَنِ الْعَالَمِينَ
(آل عمران پارہ 4 آیت 96-97)
तर्जुमा: बेशक पहला घर जो लोगों के लिए बनाया गया वह है जो मक्का में है, बरकत वाला और हिदायत तमाम जहांन (दुनिया)  के लिए, उस में खुली हुई निशानियां हैं, मक़ाम-ए-इब्राहीम और जो शख्स (व्यक्ती) उस में दाखिल हो (प्रवेश करे) अमान में है और अल्लाह के लिए लोगो पर बैतुल्लाह का हज है,जो शख्स (व्यक्ती) रास्ता के हिसाब से हज की ताकत रखे, और जो कुफ्र करे अल्लाह सारे जहान से बे परवाह है।

अल्लामा नईमुद्दीन मुरादाबादी अपनी तफ्सीर में इस आयत करीमा की शान-ए-नोज़ूल के तहत फरमाते हैं कि यहूद ने मुसलमानो से कहा था कि बैतुल मक़्दिस (जो फिलिस्तीन में है) हमारा क़िबला है, काबा से अफज़ल (बेहतर) और उस से पहला है अम्बिया का मक़ाम-ए-हिजरत और क़िबल-ए-इबादत है, मुसलमानों ने कहा काबा अफज़ल है, इस पर यह आयत करीमा नाज़िल हुय़ी,

दूसरी जगह अल्लाह फरमाता है::

وَاَتِمُّوا الْحَجَّ وَالْعُمْرَةَ لِلّـٰهِ (پ2 ت 196 س بقرہ)
तर्जुमा: और हज और उमरा अल्लाह के लिए पूरा करो,

हदीस 1: सहीह मुस्लिम शरीफ में अबू हुरैरा رضی اللہ عنہ से मरवी कि रसूल ﷺ ने फरमाया :
 ऐ लोगो!  तूम पर हज फर्ज़ किया गया लेहाज़ा हज करो, एक शख्स ने अर्ज़ की  क्या हर साल या रसूलल्लाह ﷺ ? होज़ूर ﷺ खामोश (चुप) रहे उन्होने तीन बार यह कहा इर्शाद फरमाया कि अगर मैं हां कह देता तो तुम पर वाजिब (जरूरी) हो जाता और तुम से ना हो सकता फिर फरमाया, जब तक मैं किसी बात को ब्यान (बताउं) करूं तुम मुझसे सवाल ना करो,अगले लोग सवाल ज़्यादा करने और अम्बिया की मुखालेफत से हलाक (बरबाद) हुए, लेहाज़ा जब मैं किसी बात का हुक्म दूं तो जहां तक हो सके उसे  करो, और जब मैं किसी बात से मना करूं तो उसे छोङ दो (صحیح مسلم، کتاب الحج ،حدیث 1338)

हदीस 2: मुस्लिम व इब्न ख़ज़ीमा अ़मर इब्न आ़स رضی اللہ عنہ से रावी, रसूल ﷺ फरमाते हैं "हज उन पापों को खत्म कर देता है जो पहले हुए हैं।
(صحیح مسلم،، کتاب الایمان،، حدیث 121)

हदीस 3: इब्न माजा उम्म-ए-सलमा  رضی اللہ تعالٰی عنہا से रावी रसूल ﷺ ने फरमाया हज कमज़ोरों के लिए ज़िहाद है। 
(سنن ابن ماجہ،، ابواب المناسک،، باب الحج جہاد النساء ح2902)
(↑بہار شریعت ج اول ح ششم ص 1030-31 ↑)

हदीस 4: और फरमाया कि इस से बढ कर और कोई गुनाह (पाप) नहीं कि आदमी हज में मक़ाम-ए-अ़रफात में खङा हो और गुमान करे कि मैं नहीं बख्शा गया। (کیمیاء سعادت صفحہ نمبر188)

:: हज किसे कहते हैं और कब फर्ज़ हुआ? ::
हज नाम है अहराम बांध कर नव्वीं (9th) ज़िल्हिज्जा (इस्लामी महीना) को अरफात  में ठहरने और काबा मोअज़्ज़मा के तवाफ (प्रिक्रमा) का और उस के लिए एक खास समय रखा गया है, कि उसी समय पर यह काम किया जाए तो हज है।
हज 9हिजरी में फर्ज़ हुआ, उस की फर्ज़ियत क़तई है, जो इस की फर्ज़ियत का इन्कार करे काफिर है,मगर उम्र भर में सिर्फ एक बार फर्ज़ है। 

मसअला 1: दिखावे के लिए हज करना और हराम माल से हज को जाना हराम है।

मसअला 2: जब हज पर जाने की ताक़त हो  तो तुरंत हज फर्ज़ हो गया (उसी साल में) अब देर करेगा तो गुनहगार (पापी) होगा, मगर जीवन में कभी भी हज करेगा तो हो जाएगा।
  ::हज का समय::
मसअला 3: हज का समय शव्वाल (इस्लामी 10वां महीना) से 10वीं ज़िल्हिज्जा (इस्लामी बारहवां महीना)तक है 

:: हज वाजिब होने की शर्तें ::
हज वाजिब होने की 8 शर्तें हैं, 
जब तक यह सब ना पाई जाएं  हज फर्ज़ नहीं, वह शर्तें यह हैं 
  • (1) इस्लाम,
  • (2) दार-उल-हरब,दार-उल-इस्लाम,
  • (3) बोलूग़ (बालिग़)
  • (4) आ़क़िल (बुद्धिमान)
  • (5) आज़ाद होना
  • (6) सेहतमंद हो
  • (7) सफर के खर्च का मालिक और सवारी पर ताक़त हो,
  • (8) वक्त (समय)

हज वाजिब होने की शर्तें विस्तार के साथ:
  • (1) इस्लाम,

लेहाज़ा अगर मुसलमान होने से पहले मालदार था फिर फक़ीर हो गया तो कुफ्र के ज़माना में मालदार होने की वजह से इस्लाम लाने के बाद हज फर्ज़ ना होगा,
  • (2) दार-उल-हरब,
में हो तो यह भी ज़रूरी है कि  जानता हो कि इस्लाम के तमाम फर्ज़ों में हज है,
लेहाज़ा जिस वक्त मालदार था यह मसअला मालूम ना था और जब मालूम हुआ तब यह फकीर हो गया तो अब फर्ज़ नहीं,
 और दार-उल-इस्लाम में है तो चाहे फर्ज़ होना उसे मालूम हो या ना मालूम हो फर्ज़ हो जाएगा,क्युंकि दार-उल-इस्लाम में फर्ज़ों का मालूम होना ना होना उज़्र नहीं।

  • (3) बोलूग़ (बालिग़)

नाबालिग़ ने हज किया यानी अपना आप जब कि समझदार हो या उस के वली ने उस की तरफ से अहराम बांधा हो जब कि ना समझ हो, बहरहाल वह नफ्ल का हज हुआ,फर्ज़ हज की जगह नही हो सकता, 

  • (4) आ़क़िल (बुद्धिमान)

अक़्लमंद (बुद्धिमान) होना शर्त है लिहाज़ा मजनून (पागल) पर हज फर्ज़ नहीं, 
मजनून (पागल) था और वक़ुफ-ए-अरफा से पहले पागलपन जाता रहा और नया अहराम बांध कर हज किया तो यह हज फर्ज़ का हज हुआ वरना नहीं,
हज करने के बाद पागल हुआ फिर अच्छा हुआ तो 
इस पागलपन का हज पर कोई असर नही, यानी दोबारा हज करने की ज़रूरत नहीं,

  • (5) आज़ाद होना,

बांदी गुलाम पर हज फर्ज़ नहीं ,

  • (6) सेहतमंद हो,

कि हज को जा सके,बदन के हर हिस्से सलामत हों, अंखियारा हो, अपाहिज फालिज वाले जिस के पांव कटे हों और बुढे पर कि सवारी पर खुद ना बैठ सकता हो,  हज फर्ज़ नहीं, युं ही अंधे पर भी हज वाजिब नहीं भले ही हाथ पकङ कर उसे ले चलने वाला मिले इन सब पर यह भी ज़रूरी नही कि किसी को भेज कर अपनी तरफ से हज करा दें  या वसियत कर जाएं और अगर तकलीफ उठा कर हज कर लिया तो सही हो गया।

  • (7) सफर के खर्च का मालिक हो और सवारी पर भी,

चाहे खुद की सवारी हो या इतना माल हो कि किराया पर ले सके,
किसी ने हज के लिए माल दिया तो कोबूल करना उस पर वाजिब नहीं,देने वाला अजनबी हो या मां बाप औवलाद वगैरह  मगर जब कोबूल कर लेगा  तो हज वाजिब हो जाएगा,
पैदल की ताक़त हो तो पैदल हज करना अफज़ल है हदीस़ में है  जो पैदल हज करे हर क़दम पर 700नेकियां हैं,, 
फक़ीर ने पैदल हज किया फिर मालदार हो गया तो उस पर दूसरा हज नहीं,

  • (8) वक्त (समय),

यानी हज के महीनों में तमाम शर्तें पाई जाएं और अगर दूर का रहने वाला हो तो जिस वक्त वहां के लोग जाते हों उस वक्त शर्तें पाई जाती हों और अगर एेसे वक्त पाई गईं कि अब नहीं पहुंच पाएगा तो ज़रूरी नहीं,

:: वाजिब अदा करने की शर्तें ::

अब तक आपने हज वाजिब होने की शर्ते पढीं अब आप यहां से वाजिब अदा करने की शर्तें पढेंगे,

  • रास्ता में अमन होना, डाका वगैरह से जान जाने का खतरा हो तो जाना जरूरी नही अगर ऐसा नही है तो वाजिब है,

  • अगर अमन के लिए कुछ रिश्वत देना पङे तब भी जब भी जानै वाजिब है क्युंकि यह अपना फर्ज़ अदा करने के लिए मजबूर है,लेहाज़ा उस देने वाले पर जुर्माना नहीं,


  • रास्ता में चुंगी (toll tex) वगैरह लेते हों तो यह अमन के विरुद्ध नहीं 


  • औरत को मक्का तक जाने में तीन दिन या ज़्यादा का रास्ता हो तो उस के साथ पति या महरम का जाना शर्त है चाहे वह औरत जवान हो या बुढिया, और ती दिन से कम का रास्ता  हो तो बेगैर महरम और पती को भी जा सकती है,

महरम: वह मर्द जिस से हमेशा के लिए उस औरत का निकाह हराम हो जैसे, बाप,बेटा,भाई,वगैरह रजाई भाई, रजाई बाप,रजाई बेटा वगैरह,

शौहर या महरम जिस के साथ सफर कर सकती है  उस का आकिल बालिग़ गैरे फासिक होना शर्त है,

बांदियों को बेग़ैर महरम सफर जायज़ है

  • औरत बेगैर महरम या शौहर के हज को गई तो गुनहगार हुई मगर हज हो जाएगी यानी फर्ज़ अदा हो जाएगा,


:: अदा की सेहत  की शर्तें ::
कि अगर यह ना पाई जाएं तो हज सही नहीं और यह 9हैं।
  • (1) इस्लाम: काफिर ने हज किया तो ना हुआ।
  • (2) अहराम: बेगैर अहराम हज नही हो सकता।
  • (3) ज़मान:  यानी हज के लिए जो ज़माना मुकर्रर (निश्चित) है उस से पहले हज नही हो सकते।
  • (4) मकान: तवाफ (प्रिक्रमा) की जगह मस्जिद-ए-हराम शरीफ है, और वक़ूफ के लिए अरफात व मुज़्दलफा, कंकरी मारने के लिए मेना, क़ुर्बानी के लिए हरम, यानी जिस काम के लिए जो स्थान रखा गया है वहीं करें।
  • (5) तमीज़: 
  • (6) अक्ल: जिस में तमीज़ ना हो जैसे ना समझ बच्चा या जिस में अक़्ल ना हो जैसे पागल, यह खुद वह काम नही कर सकते जिन में नियत की ज़रूरत है जैसे अहराम,तवाफ, और जिस में नियत शर्त नहीं वह खुद करे जैसे वकुफ-ए-अरफा। 
  • (7) हज के फर्ज़ों को अदा करना,बै गैर उज़्र में।
  • (8) अहराम के बाद वकूफ से पहले जेमा(पत्नी के साथ संभोग) ना होना अगर हो गया तो हज नही हुआ।
  • (9) जिस साल अहराम बांधा उसी साल हज करना,लेहाज़ा अगर उस साल हज किसी कारण फौत (छूट) हो गया तो उमरा कर के अहराम खोल दे, और आने वाले वर्ष में दोबारा अहराम से हज करे।


:: फर्ज़ हज अदा होने की शर्तें:: 
फर्ज़ हज अदा होने के लिए 9 शर्तें हैं:
  • (1) इस्लाम,
  • (2) मरते समय तक इस्लाम ही रहना,
  • (3) आक़िल, बुद्धीमान होना
  • (4) बालिग होना,
  • (5) आज़ाद होना,
  • (6) अगर ताकत हो तो खुद हज करना,
  • (7) नफ्ल की नियत होना,
  • (8) दुसरे की तरफ से हज की नियत ना होना,
  • (9) फासिद ना करना,


:: हज में यह चिज़ें फर्ज़ हैं ::
  • (1) अहराम: कि यह शर्त है।
  • (2)  वक़ूफ-ए-अरफा: यानी 9वीं ज़िलहिज्जा को सुरज ढलने (सुर्यास्त) से 10वीं की सुब्ह-ए-सादिक से पहले तक किसी समय अरफात में ठहरना।
  • (3) तवाफ-ए-ज़्यारत: का अक्सर हिस्सा।
  • (4) निय्यत।
  • (5) तरतीब: यानी पहले अहराम,फिर वक़ूफ,फिर तवाफ।
  • (6) हर फर्ज़ का अपने वक्त पर होना।
  • (7) मकान: यानी वक़ूफ अरफात की ज़मीन में होना और तवाफ का मस्जिद-ए-हराम शरीफ मे होना।

:: वह चिज़ें जो हज में वाजिब हैं ::
हज के वाजिबात (वाजिब का बहुबचन) यह हैं:
(1) मिक़ात से अहराम बांधना: यानी मिकात से बेगैर अहराम के ना गुज़रना और अगर मिक़ात से पहले ही अहराम बांध लिया तो भी जायज़ है।
(2) सफा (صفا) व मरवा (مروہ) के बीच दौङना: इस को सई़ (سعی) कहते हैं।
(3) सई को सफा से शुरू करना: और अगर मरवा से शुरू कू तो पहला फेरा शुमार ना किया जाए, उस का  एआदा करे (यानी दोबारा सफा से शुरू करे)।
(4) पैदल सई करना: 
(5) दिन में वकूफ किया तो उतनी उतनी देर तक वकूफ करे की सूरज डूब जाए,चाहे सूरज ढलते ही शुरू किया हो या बाद में, (यानी सुरेयासेत तक वकूफ में व्यस्त रहे) और अगर रात में वकूफ किया तो उस के लिए किसी खास हद तक वक़ूफ करना वाजिब नही, मगर वह उस वाजिब का तारिक (छोङने वाल) हुआ।

(6) वकूफ में रात का कुछ हिस्सा आ जाना।
(7) अरफात से वापसी में इमाम की पैरवी करना यानी जब तक इमाम ना निकले यह भी ना चले।
(8) मुज़दलेफा  ठहरने।
(9)मग़रीब और इशा की नमाज़ इशा के वक्त मुज़दलेफा में पढना।
(10) तिनों जमरों पर 10वीं 11वीं 12वीं तीनो दिन कंकरियां मारना यानी 10वी को सिर्फ जुमरत-उल-उक़बा पर और 11वीं 12वीं को तीनों पर रमी मारना।
(11) जुमरत-उल-उक़बा की रमी पहले दिन हलक़ से पहले होना।
(12) हर रोज़ की रमी का उसी दिन होना।
(13) सर मुंडाना या बाल कतरवाना 14: कुरबानी के दिनों में होना, 15: हरम शरीफ में होना अगरचे मेना में ना हो।
(16)क़ेरान और तमत्तोअ वाले को क़ुरबानी करना और।
{क़ेरान:हज और उमरा दोनो के अहराम की निय्यत करेउसे क़ेरान कहते हैं।
तमत्तोअ: मक्का में पहुंच कर 1शव्वाल से 10ज़िलहिज्जा में उमरा करके वहीं से हज का अहराम बांधे उसे तमत्तोअ कहते हैं}
[بہار شریعت جلد اول صفحہ70]
(17) उस कुरबानी का हरम और कुरबानी के दिनो में होना।
(18)  तवाफ-ए-एफादा (طواف افاضہ) का अक्सर हिस्सा कुरबानी के दिनो में होना 
नोट: अरफात से वापसी के बाद जो तवाफ किया जाता है उसे )  तवाफ-ए-एफादा (طواف افاضہ) कहा जाता है और इसे तवाफ-ए-ज़्यारत भी कहा जाता है।
(19) तवाफ हतीम के बाहर होना।
(20) दाहीनी तरफ से तवाफ करना यानी काबा शरीफ तवाफ करना वाले की बाईं जानिब हो।
(21) उज्र ना हो तो पांव से चल तवाफ करना।
(22) तवाफ करने में  नापाकी से पाक होना (पवित्र) होना अगर अपवित्रता में तवाफ किया तो ना हुआ।
(23) तवाफ के समय सतर (छुपाने वाला बदन का हिस्सा)छुपा होना अगर खुल गया तो दम वाजिब होगा यानी कुरबानी करनी पङेगी। 
(24) तवाफ के बाद दो रकात नमाज़ पढना, ना पढी तो दम वाजिब यानी जरूरी नहीं।
(25) कंकरीयां फेंकने, ज़बह और सर मुंडाने,और तवाफ में तरतीब यानी पहले कंकरीयां, फिर क़ुरबानी, फिर सर मुंडाए, फिर तवाफ करे।
(26) तवाफ-ए-सद्र यानी मिक़ात से बाहर रहने वालों के लिए रुख्सत का तवाफ करना।
(27)वक़ुफ-ए-अरफा के बाद सर मुंडाने तक जेमा (पत्नी से संभोग) ना होना।
(28) सिला कपङा मुंह और सर छुपाने से बचना।
मसअला: वाजिब के छोङने से दम ज़रूरी होता है चाहे जान कर या अनजाने या भूल कर किया हो, चाहे उसे वाजिब का होना याद हो या ना हो,
::हज की सुन्नतें::

  • (1) तवाफ-ए-क़ोदूम: यानी मिक़ात के बाहर से आने वाला मक्का मोअज़्ज़मा में हाज़िर होकर सब में पहला जो तवाफ करे उसे तवाफ-ए-क़ोदूम कहते हैं, यह मुफरद और क़ारिन के लिए सुन्नत है।
  • (2) तवाफ का हजर-ए-असवद से शुरू करना।
  • (3) तवाफ-ए-क़ोदूम  या फर्ज़ में रमल करना।
  • (4) सफवा मरवा को बीच जो दो मिल अखज़र (हरा निशान) है वहां दौङना ।
  • (5) इमाम का मक्कका में सातवीं,6: अरफात में 9वीं 7: मेना में ग्यारहवीं को ख़ुतबा पढना, 8: 8वीं की फज्र के बाद मक्का से रवाना होना कि मेना मे पांच नमाज़ें पढ ली जाएं ।
  • (9) 9वीं रात मेना में गुज़ारना।
  • (10) सुरज निकलने के बाद मेना से अरफात को रवाना होना।
  • (11) वक़ूफ-ए-अरफा के लिए गुस्ल (स्नान) करना।
  • (12) अरफात से वापसी में मुज़दलेफा में रात को रहना और।
  • (13) सुरज निकलने से पहले यहां से मेना को चले जाना।
  • (14) 10 और 11 के बाद जो दोनो रातें हैं उन को मेना में गुज़ारना और अगर 13वीं को भी मेना में रहा तो 12वीं के बाद की रात भी मेना में रहे।
  • (15) अब्तह यानी वादिए मुहस्सब में उतरना,भले ही थोङी देर के लिए हो, और उन के अलावा और भी सुन्नते हैं जिन का उल्लेख बाद में करुंगा,


:: संक्षिप्त में हज का तरीक़ा ::

मिक़ात का बयान:
मिक़ात उस जगह को कहते हैं कि मक्का शरीफ के जाने वाले को बेगैर अहराम वहां से आगे जाना जायज़ नहीं भले ही व्यापार वगैरह या किसी और  गर्ज़ से जाता हो, 
मसअला: मिक़ात 5 हैं, 
  • (1) ज़ुल हलीफा(ذوالحلیفہ) : यह मदीना मुनव्वेरा की मिक़ात है,भारत वाले हज से पहले अगर मदीना तय्येबा को जाएं और वहां से मक्का को तो वह भी ज़ुल हलीफा से अहराम बांधें।
  • (2) ज़ातेअरक़ (ذات عرق) : यह ईराक़ वीलों की मिक़ात है।
  • (3) जोहफा (جحفہ) : यह शाम (सीरिया) वालों की मिक़ात है। 
  • (4) क़रन (قَرن) : यह नज़्द वालों की मिक़ात यह ताएफ के क़रीब है। 
  • (5) यलमलम (یَلمَلَم) : यमन वालों के लिए मिक़ात है।


अहराम का बयान: 
यह तो मालूम हो गया कि हिन्दुस्तानियों के लिए मिक़ात यानी जहां से अहराम बांधते हैं ज़ुल हलीफा(ذوالحلیفہ) और यलमलम पहाङ का एरिया है ,जब यह जगह करीब आए मिस्वाक (दांतुअन) करे और वज़ू करे और खूब मल मल कर स्नान करे ना नहा सके तो सिर्फ वज़ू करें  हैज व नेफास वाली औरतें और बच्चे भी नहाएं यानी स्नान करें और पवित्र हो कर अहराम बांधे,
बालों में कंघा कर के ख़ुश्बूदार तेल डालें
स्नान से पहले नाखून काटें,खत बनवाएं, बगल (कांख) का बाल नाफ के निचे का बाल दूर करें, बदन और कपङो पर खुश्बू  लगाएं कि सुन्नत है,
मर्द सिले कपङे और मोज़े उतार दें एक चादर नई या धुली ओढें और ऐसा ही एक तहबंद बांधें यह कपङे सफेद और नए बेहतर हैं कुछ लोग उसी समय से चादर दाहिनी बगल के निचे करके दोनो पल्लू बाएं  मोंढे पर डाल लेते हैं  यह सुन्नत के खिलाफ है बलकि इस तरह का सुन्नत तवाफ के वक्त है, बाक़ी समय में अपनी आदत के हिसाब से चादर ओढी जाए यानी दोनो मोंढे पीठ सीना  सब छुपा रहे।
जब वह स्थान आए और समय मकरूह ना हो तो दो रकात अहराम की नियत से पढें पहली रकाअत में  अल्हम्दू लिल्लाह के बाद कुलिया अइयोहल काफेरून दूसरी रकाअत में कुल हुअल्लाहू अहद,
  • हज तीन तरह का होता है: 

(1) एक यह कि सिर्फ "हज„ करे, और उसे अफराद कहते हैं और हाजी क मुफरद इस में सलाम के बाद युं कहे: 
اَللّٰھُمَّ اِنِّیْ اُرِیْدُ الْحَجَّ فَیَسِّرْہُ لِیْ وَتَقَبَّلْہُ مِنِّیْ نَوَیْتُ الْحَجَّ وَ اَحْرَمْتُ بِہٖ مُخْلِصًا لِلّٰہِ تَعَالٰی
अल्लाहुम्मा इन्नी ओरीद-उल-हज्जा फयस्सिरहो ली व तक़ब्बल्हो मिन्नी नवैत-उल-हज्जा व अहरमतो बेही मुख़्लेसन लिल्लाहे तआला,
तर्जुमा: ऐ अल्लाह मैं हज का इरादा करता हुं उसे तू मेरे लिए मोयस्सर कर और उसे मुझ से तू क़ोबूल कर मैने हज की निय्यत की और खास अल्लाह के लिए मैं ने अहराम बांधा।
(2) दूसरा यह कि यहां से सिर्फ उमरे की नियत करे मक्का मोअज़्ज़मा में हज का अहराम बांधे उसे "तमत्तोअ„ कहते हैं और हाजी क मुतमत्तेअ इस सलाम के बाद यह कहे:
اَللّٰھُمَ اِنِّیْ اُرِیْدُالْعُمْرَۃَ فَیَسِّرْھَالِیْ وَ تَقَبَّلْھَا مِنِّی نَوَیْتُ الْعُمْرَۃَ وَاَحْرَمْتُ بِھَا مُخلصًا لِلّٰہِ تَعَالٰی
अल्लाहुम्मा इन्नी ओरीद-उल-उमरता फयस्सिरहा ली व तक़ब्बल्हा मिन्नी नवैत-उल-उमरता व अहरमतो बेहा मुख़्लेसन लिल्लाहे तआला,
तर्जुमा: ऐ अल्लाह मैं उमरा का इरादा करता हुं उसे तू मेरे लिए मोयस्सर कर और उसे मुझ से तू क़ोबूल कर मैने उमरा की निय्यत की और खास अल्लाह के लिए मैं ने अहराम बांधा।
(3) तीसरा यह कि हज व उमरा दोनो की यहीं से नियत करे और यह सब से बेहतर है इसे "किरान„ कहते हैं और हाजी क क़ारिन इस में बाद सलाम के युं कहे: 




اَللّٰھُمَّ اِنِّیْ اُرِیْدُ الْحَجَّ وَ الْعُمْرَۃَ فَیَسِّرْھُمَا لِیْ وَتَقَبَّلْھُمَا مِنِّیْ نَوَیْتُ الْحَجَّ وَالْعُمْرَۃَ وَ اَحْرَمْتُ بِھِمَامُخلصًا لِلّٰہِ تَعَالٰی
अल्लाहुम्मा इन्नी ओरीद-उल-हज्जा वल उमरता फयस्सिरहोमा ली व तक़ब्बल्होमा मिन्नी नवैत-उल-हज्जा वल उमरता व अहरमत बेहेमा मुख़्लेसन लिल्लाहे तआला,
तर्जुमा: ऐ अल्लाह मैं हज और उमरा का इरादा करता हुं उन दोनो को तू मेरे लिए मोयस्सर कर और उन दोनो को मुझ से तू क़ोबूल कर मैने हज और उमरा की निय्यत की और खास अल्लाह के लिए मैं ने अहराम बांधा।
फिर बुलंद आवाज़ में तलबिया यानी लब्बैक कहे लब्बैक यह है,
لَبَّیْکَ اَللّٰھُمَّ لَبَّیْکَ لَبَّیْکَ لَا شَرِیْکَ لَکَ لَبَّیْکَ اِنَّ الْحَمْدَ وَ النِّعْمَۃَ لَکَ وَ الْمُلْکَ لَا شَرِیْکَ لَک،
लब्बैक अल्लाहुम्मा लब्बैक, लब्बैक ला शरीकsssलक लब्बैक इन्नल हम्दा व न्नेअ़मता, लका वलमुल्क लाशरीक लका।
तर्जुमा: मैं तेरे पास हाज़िर (उपस्थित) हुआ, ऐ अल्लाह मैं तेरे होज़ूर हाज़िर हुआ, तेरा कोई शरीक नहीं मैं तेरे होज़ूर हाज़िर हुआ  बेशक तारीफ और नेअमत और मुल्क तेरे ही लिए है तेरा कोई शरीक नही है। 
लब्बैक तीन बार कहे और दोरूद शरीफ पढे फिर दुआ मांगे एक दुआ यह भी है
اَللّٰھُمَّ اِنِّیْ اَسْئَلُکَ رِضَاکَ وَ الْجَنَّۃَ وَ اَعُوْذُ بِکَ مِنْ غَضَبِکَ وَ النَّارِ
अल्लाहुम्मा इन्नी अस अलोका  रेदाका वल जन्नता व अइ़जो बेका मिन ग़ज़बेका वन्नार,
तर्जुमा: ऐ अल्लाह! मैं तेरी रज़ा (इच्छा) और जन्नत का साइल (सवाली ) हूं और तेरे गज़ब और जहन्नम से तेरी ही पनाह (श्रण) मांगता हूं।
जब हरम को पास पहुंचे सर झुकाए आंखें शर्म व गुनाह से नीची किए  प्रवेश करे हो सके तो पैदल नॆगे पांव तलबिया व दोरूद पढता रहे बेहतर यह है कि दिन में नहां कर दाखिल (प्रवेश) हो ,
जब मक्का मोअज़्ज़मा दिखाई दे तो यह दुआ पढे:
اَللّٰھُمَّ اجْعَلْ لِّیْ بِھَا قَرَارًا وَّارْزُقْنِیْ فِیھَا رِزْقًا حَلَالًا.
अल्लाहुम्मा अजअ़ल ली  बेहा क़रारवं वर्ज़ुक़्नी फिहा रिज़्क़न हलाला।
तर्जुमा: ऐ अल्लाह तु मुझे उस में बरक़रार रख और मुझे उस में हलाल रोज़ी दे।
फिर मक्का मोअ़ज़्ज़मा मे दाखिल हो और यह दुआ पढे.
اللهم أنْتَ رَبِيْ وَأنا عَبْدُكَ وَالْبَلَدُ بَلَدُكَ جِئْتُكَ هَارِبًا مِنكَ إلَيْكَ لِاُؤَدِّيْ فَرَائِضَكَ وَأطْلُبَ رَحمَتَكَ وَأَلْتَمِسَ رِضْوَانَكَ أسْأَلُكَ مَسْئَالَةَ الْمُضْطَرِّيْنَ إِلَيْكَ الْخَائِفِينَ عُقُوْبَتَكَ أسأَلُكَ أَنْ تُقَبِّلَنِيَ الْيَوْمَ بِعَفْوِِكَ وتُدخِلَنِيْ فِيْ رَحْمَتِكَ وتَتَجَاْوَزَ عَنِّي بِمَغْفِرَتِكَ وَتُعِيْنَنِي عَلٰى أَدَاْءِ فَرَائِضِكَ الّٰلهُمَّ نَجِّنِي مِن عَذَابِكَ وَافْتَحْ لِي أبْوَاْبَ رَحْمَتِكَ وَأدْخِلْنِيْ فِيْهَا وَأَعِذْنِيْ مِنَ الْشَّيْطَانِ الرَّجِيْم
अल्लाहुम्मा अन्ता रबब्बी व अना अब्दोका वलबलदो बलदोका जेअतोका हारेबान मिनका एलैक ले ओवद्देया फराएज़ाका व अतलोबा रहमतका वलतमेसा रिज़वानका अस्अलोका मस्अलताल मुज़्तर्रीना एलैकल खाएफीना ओक़ूबतका अस्अलोका अन तोकब्बेवलनेयलयौमा  बे अ़फवेका व तुदखेलनी फी रहमतेका वदखिलनी फिहा, वअइ़ज़नी मेनश्शैतॉनिर्रजीम
तर्जुमा: ऐ अल्लाह तू मेरा रब है और मैं तेरा बंदा हूं और यह शहर तेरा शहर है, मैं तेरे पास तेरे अज़ाब से भाग कर हाज़िर हुआ कि तेरे फर्ज़ों को अदा करूं और तेरी रहमत को मांगू और तेरी रज़ा (मर्ज़ी) को तलाश करूं , मैं तुझसे इस तरह सवाल करता हुं जैसे मुज़तर और तेरे अज़ाब से डरने वालो सवाल करते हैं, मैं तुझ से सवाल करतालहूं कि आज तूं अपने अ़फू के साथ मुझको क़बूल कर और अपनी रहमत में मुझे दाखिल कर और अपनी मग़फिरत के साथ मुझ से दरगुज़र फरमा और फरज़ो के अदा करने पर मेरी मदद फरमा,  ऐ अल्लाह! मुझको अपनी अ़ज़ाब से निजात दे और मेरो लिए अपनी रहंत के दरवाज़े खोल दे,और उस में मुझे दाखिल कर और शैतान मरदूद से मुझे पनाह (शरण) में रख ।

जब मदआ मे पहुंचे जहां से काबा नज़र आता है यहां ठहर कर सभी मुसलमानों की मगफिरत की दुआ करे और सच्चे दिल से दरूद शरीफ पढता रहे और तीन बार अल्लाहु अकबर और तीन बार लाइलाहा इल्लल्लाह कहे और यह पढे,
رَبَّنَا آتِنَا فِي الدُّنْيَا حَسَنَةً وَفِي الْآخِرَةِ حَسَنَةً وَقِنَا عَذَابَ النَّارِ اللَّهُمَّ إِنَّا نَسْأَلُكَ مِنْ خَيْرِ مَا سَأَلَكَ مِنْهُ نَبِيُّكَ مُحَمَّدٌ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ ، وَاعُوذُ بِكَ مِنْ شَرِّ مَا اسْتَعَاذَكَ مِنْهُ نَبِيُّكَ مُحَمَّدٌ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ،
रब्बना आतेना फिद्दुनिया हसनतौं व फिल आख़िरते हसनतौं वक़िना अ़ज़ाबन्नार, अल्लाहुम्मा इन्ना नस्अलोका मिन खैरे मा सआलका मिनहो नबिय्येका मुहमदुन ﷺ व अउ़ज़ोबेका मिन शर्रे मस्तअ़ाज़का मिन्हो नबिय्येका मुहमदुन ﷺ,।
तर्जुमा: ऐ रब तू दुनिया में हमें भलाई दे और आखेरत में भलाई दे और जहन्नम के अ़ज़ाब से हमें बचा ऐ अल्लाह मैं इस खैर में से सवाल करता हूं, जिस का तेरे नबी  मुहम्मद ﷺ ने तुझसे सवाल किया और तेरी पनाह मांगता हूं उन चीज़ों के शर से जिन से तेरे नबी मुहम्मद ﷺ ने पनाह मांगी,
जब मक्का मुकर्रमा में पहुंच जाए तो सबसे पहले मस्जिदे हराम में जाए अल्लाह का ज़िक्र करते हुए  लब्बैक कहता हुआ बाबुस्सलाम तक पहुँचे पहले दाहिना पैर दाखिल करे और यह पढे। 
أَعُوذُ بِاللَّهِ الْعَظِيمِ وَبِوَجْهِهِ الْكَرِيمِ وَسُلْطَانِهِ الْقَدِيمِ مِنَ الشَّيْطَانِ الرَّجِيمِ بِسمِ اللہ اَلحَمْدُ لِلّٰہ وَالسَّلْامُ عَلٰی رَسُولِ اللہ الّٰھُمَّ صَلِّ عَلٰی سَیّدِنَا مُحمّدِ وَ عَلٰی اٰلِ سَیّدِنَا مُحمّدِ وَّ اَزْواجِ سَیّدِنَا مُحمّدِ اَلّٰلھُمَّ اغْفِرلِی ذُنُوبِی وَفْتَحلِیْ اَبْوَابَ رَحمَتِکَ♦
अऊज़ो बिल्लाहिल अज़ीम व बे वजहेहिल करीम व सुल्तानेहिल कदीम मेनश्शैतॉनिर्रजीम बिस्मिल्लाहे  अल्हमदुलिल्लाहे वस्सलामो अला रसूलिल्लाह अल्लाहुम्मै सल्ले अला सय्यदेना मुहम्मदिंव व अला अाले सय्यदेना मुहंम्मदिंव व अज़वाजे सय्यदेना मुहम्मदिन  अल्लाहुम्मग्फिरली ज़ोनूबी वफ्तहली अब्वाब रहमतेका♦•

तर्जुमा: मै खुदा की पनाह मांगता हुं, और इस की वज्हे करीम की और क़दीम सल्तनत की मर्दूद शैतान से, अल्लाह के नां की मदद से सब खूब्यां अल्लाह के लिए और रसूलुल्लाह पर सलाम, ऐ! अल्लाह  दरूरद भेज हमारे आका मुहम्मद ﷺ और उन की आल और उन की बीवियों पर ऐ! अल्लाह मेरे गुनाह बख्श दे और मेरे लिए अपनी रहमत के दरवाज़े खोल दे।

जब काबा शरीफ पर नज़र पङे तो तीन बार,"ला इलाहा इल्लल्लाहो वल्लाहो अकबर,, कहे 
(لاَ إِلَهَ إِلاَّ اللَّهُ وَاللَّهُ أَكْبَرُ)
और दरूद शरीफ और यह दुआ पढे "रब्बना आतेना फिद्दुनिया हसनतौं व फिल आख़िरते हसनतौं वक़िना अ़ज़ाबन्नार,,
(رَبَّنَا آتِنَا فِي الدُّنْيَا حَسَنَةً وَفِي الْآخِرَةِ حَسَنَةً وَقِنَا عَذَابَ النَّارِ)
अब अल्लाह का नाम लेकर तवाफ (प्रिक्रमा)करे, तवाफ मताफ में हज्र-ए-अस्वद (काला पत्थर) के पास से शुरू होगा इस तरह कि हज्र-ए-अस्वद (काला पत्थर) के करीब पहुंच कर यह दुआ पढे,
لاَ إِلَهَ إِلاَّ اللَّهُ وَ حْدَہُ صَدَقَ وَعْدَہُ وَ نَصَرَ عَبْدَہ وَ ھَزَمَ الاَحْزَابَ وَحْدَهُ لا شَرِيكَ لَهُ، لَهُ المُلْكُ ؛ وَلَهُ الحَمْدُ ، وَهُوَ عَلَى كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ،
साइलाहा इल्लल्लाहो वहदहू सदका वादहू व नसरा अब्दहू व ह़ज़मल अहज़ाबा वहदहू ला शरीक लहू, लहुल मुल्को व लहुल हम्दो वहुवा अ़ला कुल्ले शइन क़दीर।
तर्जुमा: अल्लाह के सिवा कोई माबूद नही वह तन्हा है उस का कोई शरीक नही उसी के लिए मुल्क है और उसी के लिए हम्द है और वह हर चीज़ पर कादिर है।
तवाफ शुरू करने से पहले मर्द चादर को दाहिना बगल के नीचे से निकाल कर बाएं कंधे पर डाल ले दाहिना मुंढा खुला रहे,
अब काबा की तरफ मुंह कर के  हज्र-ए-अस्वद की दहीनी तरफ रुक्न-ए-यमानी की जानिब संग-ए-अस्वद के क़रीब यूं खङा हो कि तमाम पत्थर दाहिनी तरफ रहे फिर तवाफ की नियत करे,
अल्लाहुम्मा इन्नी ओरीदो तवाफ बैतेकल मुहर्रमे फयस्सिर्हो ली व तक़ब्बल हो मिन्नी,
اَللّٰھُمَّ اِنِّیْ اُرِیْدُ طَوَافَ بَیْتِکَ الْمُحَرَّامِ فَیَسِّرْہُ لِیْ وَ تَقَبَّلْہُ مِنِّیْ، 
तर्जमा: ऐ अल्लाह मैं तेरे इज़्ज़त वाले घर का तवाफ करना चाहता हुं इस को तू मेरे लिए आसान कर और इस को मुझ से क़बूल कर,
फिर काबा को मुंह किए अपनी दाहिनी तरफ चले जब हज्र-ए-अस्वद (काला पत्थर) के सामने हो जाए तो कानो तक इस तरह हाथ उठाए कि हथेलिया हज्र-ए-अस्वद (काला पत्थर) की तरफ रहें और कहे,
بِسْمِ اللّٰہِ وَالْحَمْدُِﷲِ وَاﷲُ أَکْبَرُ وَالْحَمْدُِﷲِ واَلصَّلاةُ وَالسَّلَامُ عَلٰی رَسُولِ اللّٰه 
बिस्मिल्लाहे वलहम्दुल्ल्लाह वल्लाहु अकबर वलहम्दुल्ल्लाह वस्सलात व वस्सलाम अ़ला रसूलिल्लाह,
तर्जुमा: अब हो सके तो हज्र-ए-अस्वद (काला पत्थर) पर दोनो हथेलियां और उन के बीच में मुंह रख कर यूं चूमो कि आवाज़ ना पैदा हो तीन बार ऐसा करो यह नसीब हो तो बङी भाग्य की बात हो ,और अगर भीङ की वजह से  चूम ना सके तो धक्का मुक्की ना करे बल्कि हाथ से छू कर हाथ को चूम ले,यह भी ना हो सके तो हाथों को उस की तरफ करके हाथो को चूम ले,
 इन तरीक़ों से चुमने का नाम इस्तेलाम है,
इस्तेलाम के समय यह दुआ पढे,
 اللَّهُمَّ اغْفِرْلِی ذُنُوْبِیْ وَ طَھًِّرْلِیْ قَلَبِی وَاشْرَح لِی صَدَرِی وَ یسِّرْلِیْ اَمٔرِیْ وَ عَافٍنِی فِیْمَن عَافَیْتَ फिर اللَّهُمَّ  إِيمَانًا بِكَ , وَتَصْدِيقًا بِكِتَابِكَ ,وَوَفَاءً بِعَھْدِکَ وَاِتِّبَاعًا لِسُنَّةِ نَبِيِّكَ مُحَمَّدٍ صَلَّى اللّٰه تَعَالٰي عَلَيْهِ وَسَلَّمَ أَشْهَدُ أَنَّ لاَ إِلٰهَ إِلاَّ اللّٰه وَحْدَهُ لاَ شَرِيكَ لَهُ، وَاَشْهَدُأَنَّ مُحَمَّدا عَبْدُهُ وَرَسُولُهُ، آمَنْتُ يِا اللّٰه و كَفَرْتُ بِالْجِيْتِ وَالطَّاغُوْتِ.
 अल्लाहुम्मग्फिर्ली ज़ोनूबी व तह्हिरली क़लबी वश्रहली सदरी व यस्सिरली अमरी  व आफिनी फीमन आ़फैता
‘‘फिर‚‚ अल्लाहुम्म ईमानन बेका व तस्दीक़न बे किताबेका व वफाअ़न बे अ़हदेका व इत्तेबाअन ले सुन्नते नबिय्येका मुहम्मदिन ﷺ अश्हदो अन्ना ला इलाहा इल्लल्लाहो वह्दहू ला शरीका लहू,व अश्हदो अन्ना मुहम्मदन अ़ब्दूहू व रसूलोहू, आमनतो बिल्लाहे व कफरतो बिलजीते वत्तागूते।

तर्जुमा: ऐ अल्लाह तू मेरे गुनाह बख़्श दे और मेरे दिल के पाक कर और मेरे सीना को खोल दे, और मेरे काम को आसान कर और मुझे आफियत दे उन लोगों में जिन को तू ने आ़फियत दी,
ऐ अल्लाह तुझ पर  ईमान लाते हुए और तेरी किताब की तस्दीक़ करते हुए और तेरे अहद (वादा) को पूरा करते हुए और तेरे नबी मुहम्मद ﷺ की इत्तेबा (अनुश्रण ) करते हुए मैं गवाही देता हूं कि अल्लाह के सिवा (अलावा) कोई माबूद (पुज्यनिय) नही जो अकेला है उस का कोई शरीक नहीं और गवाही देता हूं कि मुहम्मद ﷺ उस को बन्दे और रसूल हैं  अल्लाह पर मैं ईमान लाया और बुत और शैतान से मैने इन्कार किया।

कहते हुए काबा के दर्वाज़े की तरफ बढे जब  हज्र-ए-अस्वद के सामने से बढ जाए तो सीधा हो जाए और ऐसे चले की काबा बांए हाथ की तरफ पड़े,
चलने में किसी को तकलीप ना दे,
और काबा से जितना नज़दीक रहे बेहतर है मगर इतना नहीं कि बदन या कपड़ा दिवार से लगे,

1⃣ जब मुल्तज़िम (مُلتَزِم)(पूरब दीवार का वह हिस्सा जो रूक्न-ए-अस्वद से काबा के दरवाज़े तक है) को सामने आए यह दुआ पढे,
اَللّٰھُمَّ ھٰذَ الْبَیْتُ بَیْتُکَ وَالْحَرَمُ حَرَمُکَ وَالْاَمْنُ اَمَنُکَ وَھٰذَا مَقَامُ الْعَائِذِبِکَ مِنَ النَّارَ فَاَجِرْنِیْ مِنَ النَّارِ اَللّٰھُمَّ قَنِّعْنِیْ بِمَارَزَقْتُنِیْ وَبَارِکْ لِیْ فِیْہِ وَاخْلُفْ عَلٰی کُلِّ غَائِبَۃٍ م بِخَیْرٍ لَآ اِلٰہَ اِلَّا اللّٰہُ وَحْدَہُ لَا شَرِیْکَ لَہٗ لَہٗ الْمُلْکُ وَلَہُ الْحَمْدُ وَھُوَ عَلٰی کُلِّ شَیْیٍٔ قَدِیْرٌ
अल्लाहुम्मा हाज़ल बैतो बैतोका वलहरमो  हरमोका वलअमनो अमनोका व हाज़ा मक़ाम-उल-आ़एज़ेबेका मिनन्नारे फाजिर्नी मिनन्नारे अल्लाहुम्मा क़न्नेअनी, बेमा रज़क़तोनी व बारिक ली फीहे वख्लुफ अला कुलेलो गायेबतिन बेखैरिन लाइलाहा इल्लल्लाहो वहदहू ला शरीक लहू लहुलमुल्को वलहुल हम्दो व हुआ अ़ला कुल्ले शैइन क़दीर।
तर्जुमा: ऐ अल्लाह यह घर तेरा घर है, और हरम तेरा हरम है और अमन तेरी ही अमन है, और जहन्नम से तेरी पमाह मांगने वाले की यह जगह है तू मुझको जहन्नम से पनाह (श्रण) दे ऐ अल्लाह जो तूने मुझको दिया मुझे उस पर क़ानेए कर दे और मेरे लिए उस में बरकत दे और हर ग़ायब पर भलाई के साथ तो ख़लीफा हो जा अल्लाह के सिवा कोई माबूद (पुज्यनीय) नहीं, जो अकेला है उस का कोई शरीक नही और उसी के लिए मुल्क है और उसी के लिए हम्द और वह हर चीज़ पर क़ादिर है।

2⃣ और जब रुक्न-ए-इराक़ी (पूरब और उत्तर के कोने में) के सामने आए तो यह दुआ पढे,
اَللّٰھُمَّ اِنِّیْ اَعُوْذُبِکَ مِنَ الشَّکِّ وَالشِّرْک وَالشِّقَاقِ وَالنِّفَاقِ وَسُوْئِ الْاَخْلَاقِ وَسُوْئِ الْمُنْقَلَبِ فِی الْمَالِ وَالْاَھْلِ وَالْوَلَدِ
अल्लाहुम्मा इन्नी अउज़ोबेका मेनश्शक्के वश्शिर्के  वश्शेक़ाके़ वन्नेफाक़े व सुइल अख़लाक़े व सुइल मुन्क़लबे फिल माले वलअहले वलवलदे, 
तर्जुमा: ऐ अल्लाह मैं तेरी पनाह मांगता हूं शक और शिर्क और इख्तेलाफ और नफाक़ से और माल और अहल और औलाद में वापस होकर बुरी बात देखने से।
और जब मिज़ाब-ए-रहमत(सोने का परनाला:जो रुक्न-ए-इराक़ी व रुक्न-ए-शामी के बीच की उत्तरी दिवार पर छत मे लगा है।) के सामने आए तो यह पढे,
اَللّٰھُمَّ اَظِلَّنِیْ تَحْتَ ظِلِّ عَرْشِکَ یَومَ لَاظِلِّ اِلَّا ظِلُّکَ وَلَا بَاقِیَ اِلَّا وَجْھُکَ وَاسْقِنِیْ مِنْ حَوْضِ نَبِیِّکَ مُحَمَّدٍ صَلَّی اللّٰہُ تَعَالٰی عَلَیْہِ وَسَلَّمْ شَرْبَۃً ھَنِیْئَۃٌ لَّا اَظْمَاُبَعْدَ ھَا اَبَدًا
अल्लाहुम्मा अज़िल्लनी तहता ज़िल्ले अ़र्शेका यौमा ला ज़िल्ला इल्ला ज़िल्लोका व ला बाकेया इल्ला वज्होका वस्क़ेनी मिन हौज़े नबिय्येका मुहम्मदिन ﷺ शर्बतन हनीयतन ला अज़माओ बाअ़दहा अ़बदन। 
तर्जुमा: इलाही तू मुझको अपने अ़र्श के साया (छांवों) में रख जिस दिन तेरो साया के निचे कोई साया नही और तेरी जा़त के सिवा कोई बाक़ी नही और तेरे नबी मुहम्मद ﷺ के हौज़ से मुझे खुश गवार पानी पिला कि इस के बाद कभी प्यास ना लगे।

3⃣ और जब रुक्न-ए-शामी (उत्तर पश्चिम कोने में) के पास पहुंचे तो यह पढे,
اَللّٰھُمَّ اجْعَلْہُ حَجّاً مَّبْرُوْرًاوَّسَعْیًامَّشْکُوْرًا وَّذَنْباًمَّغْفُوْرًاوَّتِجَارَۃً لَّنْ تَبُورَیَاعَالِمَ مَافِیْ الصُّدُوْرِ اَخْرِجْنِیْ مِنَ الظُّلُمٰتِ اِلٰی النُّورِ 
अल्लाहुम्म अजअ़लहो हज्जन मबरूरन व सअ़यन मश्कूरा व ज़म्बन मग़फूरा व तेजारतन लन तबूरा या आलेमा मा फि स्सोदूरे अख़्रिजनी मेनज्ज़ोलोमाते एलन नूर
तर्जुमा: ऐ अल्लाह तू इसे हज्ज-ए-मबरूर कर और सई़ मशकूर कर और गुनाह को बख्श दे और उस को वह तेजारत करदे जो हलाक (बरबाद) ना हो, ऐ! सीनों की बातें जानने वाले मुझ को तारीकियों (अंधेरों) से नूर (रोशनी/किरण) की तरफ निकाल।

4⃣ और जब रुक्न-ए-यमानी  (पश्चिम और दक्षिण का कोना) के पास आए तो उसे दोनो हाथों या दाहिने हाथ से छूए और चाहे तो चूम भी ले और यह दुआ पढे,
، اللَّهُمَّ إِنِّي أَسْأَلُكَ الْعَفْوَ وَالْعَافِيَةَ فِي الدِّيْنِ وَ الدُّنْيَا وَالْاٰخِرَةِ.
अल्लाहुम्मा इन्नी असआलोकल अफ्व वलआ़फियता फिद्दीने व द्दनिया वल आखेरते,
तर्जुमा:
रुक्न-ए-यमानी से आगे बढते ही मुस्तजाब (रुक्न-ए-यमानी और रूक्न-ए-अस्वद के बीच की दीवार,यहां 70,000फरिश्ते दुआ में आमीन कहने के लिए तैनात हैं)
यहां उपर वाली या यह दुआ पढे
رَبَّنَا آتِنَا فِي الدُّنْيَا حَسَنَةً وَفِي الْآخِرَةِ حَسَنَةً وَقِنَا عَذَابَ النَّارِ,
रब्बना आतेना फिद्दुनिया हसनतौं व फिल आख़िरते हसनतौं वक़िना अ़ज़ाबन्नार,
तर्जुमा: ऐ रब तू दुनिया में हमें भलाई दे और आखेरत में भलाई दे और जहन्नम के अ़ज़ाब से हमें बचा,
या सिर्फ दोरूद शरीफ पढे दुआ दरूद चिल्ला कर ना पढे, अब चारो तरफ घूमता हुआ हज्र-ए-अस्वद पर लौट आया तो यह एक फेरा हुआ  इस वक्त भी हज्र-ए-अस्वद का इस्तेलाम करे अब ऐसे ही 6फेरे और करे यानी कुल 7 फेरे करे पहले तीन फेरों में रमल (सीना उभार कर शाना हिलाते हुए ज़रा तेज़ चलना) भी करे अब जब यह 7 फेरे पूरे हो चुके तो एक तवाफ हुआ इसे तवाफ-ए-क़ोदूम कहते हैं, तवाफ के बाद मक़ाम-ए-इब्राहीम पर आए और यहां यह आयत पढे, 
وَاتَّخِذُوا مِن مَّقَامِ إِبْرَاهِيمَ مُصَلًّى ۖ 
वत्तखेज़ू मिम्मक़ामे इब्राहीमा मुसल्ला।
तर्जुंमा: और मक़ाम इब्राहीम से नमाज़ की जगह बनाअो,

::तवाफ की नमाज़::
फिर दो रकात नमाज़े तवाफ पढे यह नमाज़ वाजिब  इस की पहली रकाअत में सूरह काफेरून दूसरी में क़ुल हुअल्लाह पढे, यह नमाज़ पढ कर दुआ मांगे हदीस में यह दुआ है،
اللَّهُمَّ إِنَّكَ تَعْلَمُ سِرِّي وَعَلانِيَتِي فَاقْبَلْ مَعْذِرَتِي ، وَتَعْلَمُ حَاجَتِي فَأَعْطِنِي سُؤْلِي ، وَتَعْلَمُ مَا فِي نَفْسِي فَاغْفِرْ لِي ذُنُوبِي ، اللَّهُمَّ إِنِّي أَسْأَلُكَ إِيمَانًا يُبَاشِرُ قَلْبِي , وَيَقِينًا صَادِقًا حَتَّى أَعْلَمَ أَنَّهُ لا يُصِيبُنِي إِلَّا مَا كَتَبْتَ لِي وَرِضًي مِنَ الْمَعِيْشَةِ بِمَا قَسَمْتَ لِي يَا ارْحَمَ الرَّحِمِينَ،
अल्लाहुम्मा इन्नका तअ्लमो सिर्री व अलानियती फाकबल माज़ेरती व तअलमो हाजती फआअ़तीनी सुअली, व तअलमो मा फी नफसी फगफिरली ज़ोनूबी अल्लाहुम्मा इन्नी असआलोका  इमानन योबाशेरो क़लबी, व यक़ीनन सादेकन हत्ता आअलमो अन्नहू ला योसीबोनी इल्ला मा कतबता ली व रेजाअन मेनल मइशते बेमा क़समता ली या अरहमर्राहेमीन।
तर्जुमा: ऐ अल्लाह तू मेरे पोशीदा (छुपा हुआ) ज़ाहिर को जानता है तू  मेरी माज़रत को कबूल कर और तू मेरी  जरूरत को जानता है  मेरा सवाल मुझ को अता कर (दे) और जो कुछ मेरे नफ्समें है तू उसे जानता है तू मेरो गुनाहों को बख्श दे ऐ अल्लाह मैं तुझ से उस ईमान का सवाल करता हूं जा मेरे दिल में चला जाए और सच्चा यकीन मांगता हूं ताकि मैं जान लूं कि मुझे वही पहुंचेगा जो तुने मेरे लिए लिखा है और जो कुछ तुने मेरी क़िस्मत में किया है उस पर राज़ी रहूं ऐ सब मेहरबानों से ज़्यादा मेहरबान।
मुल्तज़िम से लिपटना::
नमाज़ और दुआ से फारिग़ होकर मुल्तज़िम के पास जाए और हज्र-ए-असवद के क़रीब मुल्तज़िम से लिपटे सीना दाहिना बायां चेहरा उस पर रखे और दोनो हाथ सर से उंचा कर के दिवार पर फैलाए और यह दुआ पढे،
يَا وَاجِدُ يَا مَاجِدُ  لَا تُزِلْ عَنِّي نِعْمَةً اَنْعَمْتَهَا عَلَيَّ.
या वाजेदो या माजेदो ला तोज़िल अन्नी नेअमतन अनअ़मतहा अलय्या।
तर्जुमा: ऐ क़ुदरत वाले, ऐ बुज़ुर्ग तुने मुझे जो नेअमत दी उस को मुझ से खत्म ना कर ।

ज़मज़म::
फिर ज़मज़म पर आओ और काबा को मुंह कर के तीन सांसों में पेट भर कर जितना पिया जाए  खड़े होकर पियो, हर बार बिस्मिल्लाह से शुरू करो और अल्हम्दु लिल्लाह पर खत्म और हर बार काबा मोअज़्ज़मा की तरफ निगाह उठा कर देख लो , बाकी बदन पर डाल लो या मुंह सर और बदन पर मसह कर लो और पीते वक्त दुआ करो कि क़बूल है, रसूल ﷺ फरमाते हैं ‘‘ज़मज़म जिस मुराद से पिया जाए उसी के लिए है‚‚ 
( سنن ابن ماجہ کتاب الناسک حدیث ۳۰۶۲)
ज़मज़म पीेने की दुआ यह है,
اَللّٰھُمَّ اِنِّیْ اَسْأَلَكَ عِلْمًا نَافِعًا وَ رِزقًا وَاْسِعًا وَشِفَآء مِنْ کُلِّ دَآءٍ.
अल्लाहुम्मा इन्नी असआलोका इल्मन नाफेअन व रिज़्क़न वासेअन व शिफाअ मिन कुल्ले दाअ।
तर्जुमा: ऐ अल्लाह! मैं तुझ से इल्मे नाफेअ (मुनाफा) और कुशादा रिज़्क़ और हर बिमारी से शेफा का सवाल करता हूं।

सफा मरवा की सई़ ::
फिर बाब-ए-सफा (सफा का दरवाज़ा)  से सफा पहाड़ी की तरफ चले ज़िक्र व दरूद पढते हुए सफा की पहली सीढी पर चढे और चढने से पहले यह दुआ पढे,

اَبْدَأُ بِمَا بَدَأَ اللّٰهُ بِهٖ إِنَّ الصَّفَا وَالْمَرْوَةَ مِن شَعَائِرِ اللَّهِ ۖ فَمَنْ حَجَّ الْبَيْتَ أَوِ اعْتَمَرَ فَلَا جُنَاحَ عَلَيْهِ أَن يَطَّوَّفَ بِهِمَا ۚ وَمَن تَطَوَّعَ خَيْرًا فَإِنَّ اللَّهَ شَاكِرٌ عَلِيمٌ,
(ملا علی قاری،مرقاة المفاتيح،الفصل الاول، 7: 6)
मैं इस को शुरू करता हूं जिस को अल्लाह ने पहले ज़िक्र किया, बेशक सफ़ा और मरवा अल्लाह की निशानियों से है, जीस ने  हज़ या उमराह किया, उस पर इन के तवाफ करने में कोई गुनाह नहीं है और जो व्यक्ती नेक काम करे तो बेशक अल्लाह बदला लेने वाला जानने वाला है।
फिर काबा की तरफ मुंह करके दोनो हाथ कंधों तक दोआ की तरह फैले हुए उठाओ, और इतनी देर तक ठहरो जितनी देर में सूरह बक़रा की 25 आयतों  की तेलावत की जाए, और तस्बीह तहलील दोरूद पढो अपने और दोस्तों के लिए दुआ करो। 

सई़ की नियत ::
जब दुआ कर चुके तो सई की नियत करे،
اَللّٰـھُمَّ اِنِّـیْ اُرِیْدُ السَّــعْيَ بَــيْنَ الصَّفَــاو الْمَرْوَةَ فَیَسِّــرْہُ لِیْ وَ تَقَبَّلْہُ مِنِّيْ•
अल्लाहुम्मा इन्नी ओरीदुस्सअया बैन स्सफा वलमरवा फयस्सिरहो ली व तक़ब्बलहो मिन्नी।
फिर सफा से उतर कर मरवा को चले ज़िक्र व दरूद पढता रहे, जब पहला मील आए(जो की छत की जानिब एक मील तक हरी रोशनी लगा दी गई है) यहां से मर्द दौड़ना शुरू करे (मगर ना हद से ज़्यादा और ना किसी को तकलीफ देते) फिर दूसरे मील से थोड़ा आगे तक दौड़ता चला जाए, फिर आहिस्ता चले और यह पढता हुआ,
رَبِّ اغْفِرْ وَارْحَمْ وَتَجَاوَزْ عَمَّا تَعْلَمُ وَ تَعْلَمُ مَا لَا نَعْلَمُ، إِنَّکَ أَنْتَ الْأَعَزُّ الْأَکْرَمُ، اَللّٰهُمَّ اجْعَلْه حَجًّا مَّبْرُوْرًا وَّسَعْيًا مَّشْکُورًا وَّذَنْبًا مَّغْفُوْرًا. اَللّٰهُمَّ اغْفِرْ لِي وَلِوَالِدَيَّ وَلِلْمُؤْمِنِيْنَ وَالْمُؤْمِنَاتِ يَا مُجِيْبَ الدَّعْوَاتِ، رَبَّنَا تَقَبَّلْ  مِنَّا اِنّكَ اَنْتَ السَّمِيْع الْعَلِيْمُ وَتُبْ عَلَيْنَا ۖ إِنَّكَ أَنتَ التَّوَّابُ الرَّحِيمُ. رَبَّنَا اٰتِنَا فِی الدُّنْيَا حَسَنَةً وَّفِي الْآخِرَةِ حَسَنةً وَّقِنَا عَذابَ النَّارِ.
रब्बिग्फिर वर्ह़म व तजावज़ अ़म्मन तअ़लम व तअ़लमो मा ला नअ़लमो इन्नका अन्तल आअज्जुल अकरमो अल्लाहुम्मा अजअलहो हज्जन मबरूरा व सअ़यन मश्कूरा व जनबन मगफूरा अल्लाहुम्मा इग्फिर्ली वले वालेदय्या वलमुअमेनीना वल मुअमिनात या मुजीब द्दावात रब्बना तक़ब्बल मिन्ना इन्नका अन्तल समिय्युल अलीम व तुब अलैना इन्नका अन्त त्तव्वाब -उर- रहीम रब्बना आतेना फिद्दनिय हसनतव व फिल आखिरते हसनतंव वकिना अ़जाबन नार।
मरवा तक पहुंचो यहां पहली सीढी पर चढने बल्कि उस के क़रीब होने से मरवा पर चढना हो गया लेहाजा बिल्कुल दिवार से ना मिलै रहे कि यह जाहिलों का तरीक़ा है, यहां से काबा नज़र नही आता मगर काबा की तरफ मुंह करके जैसे सफा पर किया था तस्बीह,तकबीर, हम्द व स़ना दरूद दुआ,यहां भी करो।
यह एक फेरा मुकम्मल यानी पूरा हुआ, 
फिर यहां से सफा को ज़िक्र व दरूद और दुआएं पढते हुए जाओ, जब हरा ट्यूब लाइट के पास पहुंचो तो उसी तरह दौड़ो और फिर आहिस्ता होलो, फिर आओ जाओ यहां तक कि सातवां फेरा मरवा पर खत्म होगा और हर फेरे में उसी तरह करो इस का नाम सईं है ।
अब सई के बाद मक्का में 8वीं तारीख तक ठहरे और लब्बैक कहा करे ,और खाली/सिर्फ तवाफ किया करे और हर सात फेरे पूरे होने पर मक़ाम-ए-इब्राहीम में दो रकात नमाज़ पढा करे 7वीं तारीख ज़ुहर बाद मस्जिद-ए-ह़राम में जो खुत्बा इमाम पढे उसे सुने,

:: मेना को रवानगी ::
फिर जब 8वीं तारीख (يوالتَّرويه) की सुब्ह हो तो सूरज निकलने को बाद मक्का से मेना की तरफ चले रास्ता भर लब्बैक व दुआ व दरूद व स़ना पढता रहे जब मेना दिखाई पड़े यह पढे,
 اَللَّہُمَّ ھَذِہِ مِنَی فَامْنُنْ عَلَیَّ بِمَا مَنَنْتُ بِہِ عَلَی اَوْلِیَائِکَ،
अल्लाहुम्मा हाज़ेही मेनयन  फमनुन अ़लय्या बेमा मननतो बेही।
तर्जुमा: एलाही यह मेना है मुझ पर तु वह एहसान कर जो अपने औलिया पर तूने किया,
मेना पहुंच कर यहां रात को ठहरे आज ज़ोहर से नवीं की सुबह तक पांचो नमाज़ें यहीं मस्जिद-ए-ख़ीफ में पढे।
अरफात::
अरफा की रात यानी नवीं रात को मेना में इबादत में गुज़ारे जब नवीं की सुबह हो तो फज्र पढ कर ज़िक्र व दरूद में लगा रहे जब सूरज बुलन्द हो जाए तो अरफात की तरफ चले रास्ता भर लब्बैक दरूद दुआ  पढता रहे, जब जबल-ए-रहमत दिखाई दे ज़िक्र व दुआ ज़्यादा करे कि यह क़बूलियत का समय है, अरफात में जहां जगह मिले रास्ते से हट कर खड़े हो जाए, जब दोपहर करीब हो तो नहाए कि सुन्नत -ए- मुअक्केदा है और ना हो सके तो सिर्फ वजू करे दोपहर ढलते ही मस्जिद-ए-नमरा पहुंचे सुन्नत पढ कर खुत्बा सुने और इमाम के साछ ज़ोहर पढे उस के बाद ही अस्र की तकबीर होगी साथ ही जमात से अस्र पढे ज़ोहर अस्र के बीच सलाम व कलाम कैसा, सुन्नतें भी ना पढे और अस्र के बाद भी नफ्ल नहीं,

 वक़ूफ-ए-अरफा:
अब अस्र पढते ही मुक़फ में जाए और सुर्यास्त तक ज़िक्र दरूद दुआ में लगा रहे, जब सूरज डूब जाए फौरन मुज़्दल्फा में जाए इमाम के साथ, अगर ईमाम देर करे तो उस का इन्तेज़ार ना करे रास्ता भर लब्बैक,दुआ,दरूद में लगे रहो रास्ता में अगर हो सके तो तेज़ चलें चाहे पैदल या सवारी पर।
जब मुस्तफा दिखाई पड़ी है तो पैदल हो जाना पैदल हो जाना बेहतर है और नहा कर दाखिल होना अच्छा है दाखिल होते वक्त यह दुआ पढ़ें, 

اللَّهُمَّ هٰذاجَمـعُ نَسْئَلُكَ الْعَفْوَ وَالْعَافِيَةَ فِي الدُّنْيَا وَالْآخِرَةِ،
अल्लाहुम्मा हाजा़ जमअा  नसअलोकल अफ्वा वलआफियता फिद्दुनिया वलआखेरते।
यहां पहुंचकर जबल-ए-क़ज़ह (एक पहाड़ी का नाम) के पास रास्ता से बच कर उतरे यह ना हो सके तो जहां जगह मिले, अब यहां मग़रिब व ई़शा साथ पढे चाहे मगरिब का वक्त बाक़ी ही क्यूं ना हो यहां ईशा के समय में मगरीब व इशा दोनो अदा की नीयत से पढी जाएगी, पहले मगरिब के फर्ज़ पढे उस के फौरन बाद इशा की फर्ज़ फिर मगरीब व ईशा की सुन्नतें फिर वित्र, इन नमाज़ों के बाद बाक़ी रात ज़िक्र,दुआ दरूद में गुज़ारना बेहतर है कि यह बहुत अफज़ल (बेहतर) अफज़ल रात है।

मशअर-उल-हराम का वकूफ::
सुबह बहुत अंधेरे फज्र पढी जाए, और फज्र के बाद मशअर-उल-हराम मे यानी खास पहाड़ी पर और ना हो सके तो उस के दामन में और यह भी ना हो सके तो वादि-ए-मुहस्सिर (एक फिल्ड का नाम)  के सिवा जहां जगह मिले वक़ूफ करो यानी ठहर कर जैसे अरफात में किया था लब्बैक दुआ दरूद में लगे रहो,
समय: इस का समय फज्र का वक्त शुरू होने से उजाला होने तक है, इस वक्त यहां ना आया तो वकूफ ना पाया गया।

::10वीं  तारीख की इबादत::
अब जब सूरज निकलने में दो रकात पढने की समय बाकी रह जाए इमाम के साथ मिना को जाए और यहां से 7छोटी छोटी कंकरियां खोजूर की गुठली बराबर की,पाक (पवित्र) जगह से उठा कर तीन बार धो कर साथ रखे रास्ता भर लब्बैक दरूद दुआ में लगा रहे और यह दुआ भी पढे,
اللَّهُمَّ لاَ تَقْتُلْنَا بِغَضَبِكَ وَلاَ تُهْلِكْنَا بِعَذَابِكَ وَعَافِنَا قَبْلَ ذَلِكَ.
अल्लहुम्मा ला तक़तुलना बे ग़ज़बेका वला तुहलिकना बे अज़ाबेका व आ़फिना क़ब्ला ज़ालेका,
तर्जुमा: ऐ अल्लाह अपने गजब (गुस्सा) से हमे क़त्ल ना कर और अपने अज़ाब से हलाक ना कर और इस से पहले हमे आफियत (राहत/आराम) दे।

जब मेना दिखाई दे यह पढे,
اَللَّہُمَّ ھَذِہِ مِنَی فَامْنُنْ عَلَیَّ بِمَا مَنَنْتُ بِہِ عَلَی اَوْلِیَائِکَ،
अल्लाहुम्मा हाज़ेही मेनयन  फमनुन अ़लय्या बेमा मननतो बेही।
तर्जुमा: एलाही यह मेना है मुझ पर तु वह एहसान कर जो अपने औलिया पर तूने किया,
जब मेना को पहुंचे तो सब कामों से पहले जमरत-उल-उक़बा (جمرةالعقبه) जाए जमरा से कम से कम 5 हाथ दूर यूं खड़ा हो कि मक्का मोअज़्ज़मा से पहले नाले के बीच में सवारी पर रहे, मेना दाहिने हाथ पर और काबा शरीफ बांए हाथ को हो, और मुंह जमरा की तरफ हो।

रमी का तरीका::
एक कंकरी चुटकी में ले  और हाथ उठा कर कि बगली दिखाई देने लगे यह पढ कर،
بِسْمِ اللّٰهِ اَللّٰهُ اَكْبَرُ رَجمًا لِلشَّيْطَانِ رِضًا لِلْرَحْمٰنِ اللَّهُمَّ اجْعَلْهُ حَجًّا مَبْرُورًا وَ سَعْيًا مَشْكُوْرَا وَذَنْبًا مَغْفُورًا
बिस्मिल्लाहे अल्लाहु अकबर रजमन लिश्शैतान राजाअन लिर्रहमाने अल्लाहुम्मा अजअलहो हज्जन मबरूरा व सअंयन मश्कूरा व जनबन मग़्फूरा।
तर्जुमा: अल्लाह के नाम से शुरू अल्लाह बहुत बड़ा है शैतान के ज़लील करने के लिए अल्लाह की रेजा के लिए ऐ अल्लैह इस को हज्ज-ए-मबरूर कर और सई मश्कूर कर और गुनाह बख्श दे।
मारो बेहतर है कि कंकरियां जमरा चक पहुंचे नही तो तीन हाथ की दूरी तक रहे इस से ज़्यादा दूर तक जो गिरेगी उस की गिन्ती ना होगी,इसी तरह 7 कंकरी एक एक करके मारे पहले ही कंकरी से लब्बैक बंद कर दे जब सातों कंकरी मार चुके तो वहां ना खड़ा रहे ज़िक्र व दुआ करते हुए लौट आए,

समय: इस रमी का समय 10वीं की फज्र से 11वीं की फज्र तक हैमगर सुन्नत यह है कि सुरज निकलने के बाद से ज़वाल तक कर ले।
(در مختار،ردالمحتاركتاب الحج ج3ص 610)

हज की क़ुर्बानी:
अब रमी को करने के बाद कुर्बानी में लग जाए, कुर्बानी करके अपने और सब मुसलमानो के हज और कुर्बानी क़बूल होने की दुआ मांगे फिर क़ुर्बानी की दुआ मांगे, फिर कुर्बानी के बाद क़िब्ला रुख बैठ कर हलक करें यानी पूरा सर मुंडवाएं या बाल कतरवाएं लेकिन मुंडाना बेहतर है मगर औरतों को बाल मुंडवाना हराम है वह एक पौरा बराबर कतरवा दे  बाल को दफन करदें यहां बाल बनवाने से पहले ना नाखुन कतरवाए ना दाढी मंछ बनवाएं वरना दम लाज़िम आएगा, हां अगर सर मुंडाने के बाद मुंछ बनावे ,नाफ के बाल बनाए तो कोई हर्ज नहीं  बल्ती मुस्तहब है, लेकिन दाढी फिर ऩा बनाए पहले दाहिनी तरफ के बाल मुंडाए फिर बाएं का और मुंडाते वक्त 
اللّٰهُ أكبَرُ اللّٰهُ أكبَرَ لَاْ إِلٰهٰ إِلَّا اللّٰهُ وَ اللّٰهُ أكبَرُ اللّٰه أكبرُ ولِلّٰهِ الْحَمْدُ،
अल्लाहो अकबरो  अल्लाहो अकबरो ला इलाहा इल्लल्लाह वल्लाहो अकबर अल्लाहो अकबर व लिल्लाहिल् हम्द।
यह पढो,शुरू से आखिर तक बार बार यह कहते जाओ और बाद में भी कहो, और मुंडाते वक्त यह भी पढो،
الْحَمْدُلِلّٰهِ عَلٰي مَا هَدانَا وَاَنْعَمَ عَلَيْنَا وَ قَضَا عَنَّا نُسْكَنَا اَللّهُمَّ هَذِهٖ نَا صِيَتِي بَيَدِكَ فَاجْعَلْ لِي بِكُلِّ شَعْرَةٍ نُورا يَّومَ الْقِيَامَةِ وَامْحُ عَنِّي بِهَا سَيِّـئَةً وَارْفَع لِيْ بِهَا دَرَجَةً فِي الْجَنَّةِ الْعَالِيَةِ،
اَللّٰهُمَّ بَاْرِك لِي فِي نَفْسِيْ و َ تَقَبَّلْ مِنِّيْ،
اَللّٰـهُمَّ اغْفِرْلِي و لِلْمُـحَـلِّقِيْنَ وَالْمُقَصِّرِيْنَ يَا وَاسِعَ الْمَـغْفِرَةِ اٰمِيْن

अल्हम्दु लिल्लाह अ़ला मा हदाना व अनअमा अ़लैना व क़ज़ा अ़न्ना नुस्कना,
अल्लाहुम्मा हाजेही नासेयती बेयदेका फजअल्ली बेकुल्ले शअ़रतिन नुरय्यौमाल क़्यामते वम्हो अ़न्नी बेहा सय्येआतिन वर्फअ़ ली बेहा दरजतन फील जन्नतिल आलिया,
अल्लाहुम्मा बारिक ली फी नफ्सी व तक़ब्बल मिन्नी،
अल्लाहुम्मा ग्फिरली व लिलमुहल्लेक़ीना वल मुक़स्सेरीना या वासेयल मगफिरते आमीन।
अब सब मुयलमानो की बख्शिश की दुआ करे।
अब बाल बनवाने के बाद अहराम की वजह से जो बातें हराम थीं अब वह हलाल हो गईं सेवाए औरत से सोहबत (sex) और उसे शहवत की नज़र से हाथ लगाने बोसा (kiss) शर्मगाह देखने के कि यह बीतें अब भी हराम है,
अब बाल बनवाने के बाद बेहतर यह है कि आज 10वीं को मक्का पहुंचो फर्ज़ तवाफ के लिए यह तवाफ हज का दूसरा रूक्न है,य ह तवाफ भी वैसे ही होगा जैसे पहला चवाफ हुआ था मगर इस में इज्तेबाअ़ नही है, उस के बाद भी दो रकात बदस्तूर पढे इस तवाफ के बाद अपनी औरतें हलाल हो जाएंगी अब अस्ल हज पूरा हो गया, लेकिन अभी फिर मेना वापस आए ग्यारहवीं बारहवीं रातें मेना में गुज़ारे कि सुन्नत है जैसा कि दसेवी रात मेना में  रहना सुन्नत है।

::11वीं  तारीख की इबादत::
11वीं  तारीख ज़ोहर के बाद इमाम का ख़ुतबा सुन कर फिर रमी को जाए  इन दिनो में रमी जमरा उला से शुरू करे जो मस्जिद-ए-खीफ के क़रीब है इस रमी के लिए मक्का के रास्ते की तरफ आ कर चढाई पर चढे यां क़िब्ला रू होकर 7 कंकरियां मारे जैसे दस्वीं को रमी की थी सातवीं कंकरी मार कर जमरा से आगे बढ जाए और काबा की तरफ मुंह करके दुआ के लिए यूं हाथ बढाए की हथेलिया किबला की तरफ हो और कम से कम 20 आयतें  पढने के बराबर देर तक हम्द दरूद अस्तगफार व दुआ करता रहे या ज़्यादा देर तक इतना कि सुरह बक़र पढी जा सके फिर जमर-ए-वुस्ती पर जाकर यूं ही रमी और दुआ करे फिर जमरत-उल-उक़बा पर मगर यहां रमी करके ना ठहरे, उसी दम पलट आए पलटते में दुआ करे फिर बारहवीं तारीख बिलेकुल इसी तरह ज़वाल के बाद तीनों जमरों की रमी करे।
बारहवीं की रमी करके सूरज डूबने से पहले मक्का को रवाना हो जाए और चाहे तो रहे तेरहवीं को वापस हो, लेकिन फिर तेरहवीं को दोपहर ढले रमी करके जाना होगा यही बेहतर है, अखीर दिन यानी बारहवीं या तेरहवीं को जब मेना से रुख्सत हो कर मक्का को चले तो वादिये मुहस्सब में जो जन्नत-उल-मुअल्ला के क़रीब है कुछ देर ठहर कर दुआ करे बेहतर यह है कि इशा तक नमाज़ें यहीं पढे, एक निंद लेकर मक्का में प्रवेश करे,अब तेरहवीं के बाद जब तक जी चाहे मक्का में ठहरे रहो उमरे और ज़्यारत करते रहो जब मक्का से जाने का इरादा हो तो बेगैर रमल और सई के तवाफ करो यह तवाफ बाहर वालों पर वाजिब है तवाफ के बाद बदस्तूर दो रकात मक़ाम-ए-इब्राहीम मे पढो,फिर ज़मज़म के पास आकर उसी तरह पानी पिए और बदन पर डाले फिर काबे के दर्वाज़े के सामने खड़ा होकर उस की पाक (पवित्र) चौखट को चुमें और हज व ज़्यारत कबूल होने बारबार हाजिर होने की दुआ मांगे, और यह पढे
 اَلسَّائِلُ بِبَابِكَ يَسْلُكَ مِنْ فَضْلِكَ وَ مَعْرُوْفِكَ وَيَرْجُوْ رَحْمَتِكَ
अस्साएलो बेबाबेका यस अलोका मिन फजलेका व माअरूफेका व यरजू रहमतेका, 
तर्जुमा: तेरे दरवाज़े पर साएल तेरे फज़्ल व एहसान का सवाल करता है और तेरी रहमत का उम्मीदवार है।
फिर मुल्तज़िम पर आकर ग़लाफे काबा थाम कर उसी तरह लिपटो ज़िक्र दरूद व दुआ खूब पढो, उस वक्त यह दुआ पढो,
الْحَمْدُ لِلَّهِ الَّذِي هَدَانَا لِهَٰذَا وَمَا كُنَّا لِنَـهْـتَدِيَ لَوْلَا أَنْ هَدَانَا اللَّهُ اَللّٰهُمَّ فَكَمَا هَدَيْتَنَا لِهَذا فَتَقَبَّلْهُ مِنَّاْ وَ لَا تَجْعَلْ هَذَا اٰخِرَالعَهْدِ مِن بَيْتِ الحَرَامِ وَرْزُكْنِي العَوْدِ اِلَيْهِ حَتّي تَرْضٰي بِرَحْمَتِكَ يَاْ اَرْحَمَ الْرَّاحِمِيْنِ وَ الْحَمْدُ لِلَّهِ رَبِّ الْعَالَمِيْنَ وَصَلَّي اللّٰـهُ عَلَيْ سَيِّدِنَا مُحَمّدِوَّاٰلِهٖ وَصَحْبِهٖ اَجْمَعِيْنَ،
अल्हम्दु लिल्लाहिल्लज़ी हदाना लेहाज़ा व मा कुन्ना ले नहतदेय लौ ला अ़न हदाना अल्लाहु अल्लाहुम्मा फकमा हदैतना लेहाज़ा फतक़ब्बल्हू मिन्ना व ला तजअ़ल हाज़ा आखेरल अ़हदे मिन बैतिल हरामे वर्ज़ुक़निल औदे इलैहे हत्ता तरदा बे रहमतेका या अरहमर्राहेमीन वलहम्दूलिल्लाहे रब्बिल आलमीन व सल्लल्लाहू अला सय्यदेना मुहम्मजिव व आलेही व सहबेही अजमईन,

फिर हज्र-ए-अस्वद (काला पत्थर) को चूमो और रोरो कर यह पढो,
يَا يَمِينَ اللّٰهِ فِي اَرْضِهٖ اِنِّي اُشْهِدُكَ وَ كفٰي بِا اللّٰه شَهِيْداً اِنِّي أَشْهَدُ أَنْ لَّا إِلَٰهَ إِلَّإ اللّٰهُ وَأَشْهَدُ انَّ مُحَمّداً رَّسُوْلُ اللّٰهِ وَ اَنَا اُوَدِّعُكَ هَذِهٖ الشَّهَادَةَ لِتَشْهَدَلِيْ بِهَا عِنْدَ اللّٰهِ تَعَالٰي فِي يَوْمِ الْقِيَامَةِ يَومِ الفَرْعِ الْاَكْبَرِ اَللّٰهُمَّ اِنِّي اُشْهِدُكَ عَلَي ذَالِكَ وَاُشْهِدُمَلٰئِكَتِكَ الْكِرَاْمِ وَصَلَّي اللّٰـهُ عَلَيْ سَيِّدِنَا مُحَمّدِوَّاٰلِهٖ وَصَحْبِهٖ اَجْمَعِيْنَ،
या यमीन ल्लाहेलफी अर्जेका इन्नी उश्हेदोका व कफा बिल्लाहे शहीदन इन्नी अश्हदो अन लाइलाहा इल्लल्लाहू व अश्हदू अन्ना मुहम्मदर्रसूलूल्लाह  व अना ओवद्देओका हाज़ेही श्शहादता ले तश्हदली बेहा इन्द ल्लाहे तआला  फी यौमील क़यामते यौमिल फर्ईल अकबर अल्लाहुम्मा इन्नी उश्हेदुका अ़ला ज़ालेका व उश्हेदू मलाएकतेकल केरामे व सल्लल्लाहू अला सय्यदेना मुहम्मजिव व आलेही व सहबेही अजमईन,

फिर उलटे पांव काबा की तरफ मुंह करके या सीधे चलने में उलट उलट कर हसरत से देखता रहे उस की जुदाई पर रोते रहे और मस्जिद-ए-हराम से बाया पैर पहले निकाले और मस्जिद से निकलने वाली दुआ पढे, फिर मक्का के फकीरों को जो कुछ हो सके दे।
(استفاده از : بہار شریعت و قانون شریعت و کیمیاء سعادت باب بیانِ حج)

मुरत्तिब,तर्जुमा: व तस्हील
 Neyaz Ahmad Nizami






Monday, May 7, 2018

मज़ार पर टूट जाती हैं मज़हब की दिवारें::



आस्ताना शहीद बाबा رحمۃالّلہ علیہ कमेटी व क़ब्रिस्तान कर्बला कमेटी के तत्वाधान में बस स्टेशन परिसर में आयोजित सालाना उर्स-ए-पाक में अक़िदत मंदों की भीङ उमङी रही ।
उत्साह उमंग से सराबोर लोग क़व्वाली के बीच चादर पोशी कर अमन चैन की दुआ मांगी । इस दौरान मुख्य वक्ता सूफी सय्यद गुलाम ग़ैस क़ादरी साहब ने कहा कि यह मज़ार और इस में सोई बज़ुर्गों की देन है कि यहां धर्म की सारी दिवारें टूट जाती हैं तथा हिंदू मुस्लिम एकता भाई चारा की गंगा जमुना बहती हैं। यहां हर धर्म के लोग आते हैं और अपना दुख दर्द सुना कर अपनी बिगङी बनाते हैं।यह लोग अल्लाह के क़रीब होते हैं। शिक्षा पर बोलते हुए उन्होने कहा कि अच्छा शहरी, अच्छा इंसान व अच्छा देशभक्त वही है जो शिक्षा ग्रहण करे, उन्होने मुस्लिम समाज की कुरीतियों पर भी विचार वयक्त किया। मुख्य अतिथ. विजय बहादुर सिंह प्रधानाचार्य गणेश शंकर स्मार्क इंटर कॉलेज  ने कहा कि आज समाज में फैली हुई बुराईयों को रोकने की अवश्यकता है, तभी समाज में सुधार होगा और समाज आगे बढेगा, देश की अखंडता ऐसे ही कार्यक्रमों के ज़रिए बरक़रार रखी जा सकती है, समाज में एकता और अमन शांती के लिए ऐसे आयोजनों की निरंतरता आवश्यक है।
नेयाज़ अहमद निज़ामी

Thursday, April 5, 2018

गुनाहो का तआरुफ यानी पापों का परिचय, नेयाज़ अहमद निज़ामी


गुनाह यानी पाप की दो क़िस्में हैं
1- गुनाहे सगीरा (छोटे छोटे गुनाह),
2- गुनाहे कबीरा (बङे बङे गुनाह),
गुनाहे सगीरा नेकियों (पुन्य) और एबादतों (पुजा पाट) की बरकत से मोआफ हो जाते हैं, जबकि गुनाहे कबीरा उस समय तक मोआफ नही होते जब तक कि आदमी सच्ची तौबा (पश्चाताप) करके लोगों के हक़ को मोआफ ना करा ले,
गुनाहे कबीरा(बङे गुनाह)किसे कहते हैं?
गुनाहे कबीरा हर उस गुनाह को कहते हैं, जिस से बचने पर अल्लाह तआला ने मग़फिरत (बख्शिश) का वादा फरमाया है।(حاشیہ بخاری ص 36)
और कुछ आ़लिमों ने कहा है कि हर वह गुनाह जिस के करने वाले पर अल्लाह व रसूल ने अज़ाब (दण्ड) सुनाई,या लानत फरमाई या अ़ज़ाब की ज़िक्र फरमाया।

गुनाहे कबीरा(बङे गुनाह) कौन कौन हैं?
गुनाहे कबीरा की तादाद (गिन्ती/मात्रा) बहुत ज़्यादा है मगर उन में से कुछ मश्हूर गुनाह यह हैं,
(1)शिर्क करना (2)जादू करना (3)हत्या करना (4)सूद खाना (5)यतीम का माल खाना (6)काफिरो से जिहाद के समय भाग जाना (7)किसी औरत पर ब्लात्कार का इल्ज़ाम लगाना (8)ज़िना (ब्लात्कार) करना (9)अग़लाम बाज़ी (मर्द मर्द से सेक्स) करना (10)चोरी करना (11)शराब पीना (12)झूट बोलना (13)झूटी गवाही देना (14)ज़ुल्म(अत्याचार) करना (15)डाका डालना (16) माता पिता को तकलीफ देना (17)हैज (मासिक खून) के समय और नेफास(बच्चा के पैदा होने के बाद का खून) के समय पत्नी से सोहबत (सेक्स) करना (18)जुआ खेलना (19)गुनाहे सगीरा (छोटे गुनाह) बार बार करना, (20)अल्लाह की रहमत से ना उम्मीद हो जाना, (21)अल्लाह के अज़ाब से निडर हो जाना, (22)नाच देखना (23)औरतो का बेपर्दा घूमना, (24)नापतौल में कमी करना (25)चुग्लीखाना (26)गीबत करना (27)दो मुस्लिमों को आपस में लङाना, (28)अमानत को हङपना, (29)किसी का माल ज़मीन आदि हङपना, (30)नमाज़ रोज़ा हज ज़कात जैसे फराएज़ को छोङना, (31)मुसलमानों को गाली देना,उनसे बेला वजह मार पीट करना वगैरह वगैरह सैंकङो गुनाहे कबीरा हैं,
और साथ में दूसरों को भी इन पापों से रोकना ज़रूरी है।
हदीस शरीफ में है कि अगर किसी मुसलमान को कोई गुनाह (पाप) करते देखे तो ज़रूरी है अपना हाथ बढा कर उस को पाप के करने से रोक दे, और अगर हाथ से रोकने की शक्ती ना हो तो कम से कम अपने दिल से उस पाप को बुरा समझ कर उस से नफरत ज़ाहिर करे और यह इमान का बहुत ही कमज़ोर दर्जा है, (مشکٰوۃ شریف ج2ص 437)
हदीस मे है कि कोई आदमी किसी क़ौम (क़बीला) में रहकर गुनाह का काम करे और वह कबूला शक्ती होने के बावजूद उस आदमी को गुनाह करने सो ना रोके तो अल्लाह तआला उस एक आदमी की वजह से पूरे क़बीले को उन के मरने से पहले अज़ाब मे डालेगा, (مشکٰوۃ جلد 2 صفحہ 437)
गुनाहों से दुनिया मे नुक्सान
गुनाहों के  प्रकोप से दुनिया में भी नुक्सान पहुंचते रहते हैं जिन में से कुछ यह हैं।
(1)रोज़ी कम होना, (2)मुसीबतों का ज़्यादा होना, (3)उम्र कम होना, (4)दिल में और कभी कभी तमाम बदन में अचानक कमज़ोरी होकर सेहत खराब हो जाना, (5)इबादत से महरूम हो जाना, (6)लोगों में ज़लील और रुस्वा हो जाना, (7)दिमाग में उल्टी सीधी बात का आना, (8)खेतों और बागों की पैदावार में कमी होना, (9)नेमतों का छिन जाना, (10)हर समय दिल का परिशान होना, (11)अचानक ला इलाज बिमारी मे पङ जाना, (12)अल्लाह और फरिश्ते और बन्दों की लानत का होना, (13)चेहरे का बे नूर या रौनक का ना होना, (14)बेशर्म हो जाना, (15)मरते समय मुंह से कलमा ता ना निकलना, गुनाहों (पापों) से दुनियावी बङे बङे नुकसाना होते हैं,।
{जन्नती ज़ेवर पेज107से109 तक}
मुरत्तिब,तर्जुमा: व तस्हील
 Neyaz Ahmad Nizami


मुझे आलिमों से प्रेम है:: नेयाज़ अहमद निज़ामी



हज़रत ख़्वाजा फरीदुद्दीन गंजशकर चिश्ती रहमतुल्लाह अलैह ने फरमाया(कहा) कि रसूल-ए-खुदा ﷺ ने फरमाया कि,
مَن اَحب العِلم وَالعلماء لَا یکتب خطیۃ
तर्जुमा: यानी जो व्यक्ती इल्म और ओलमा (ज्ञान और ज्ञानी) से प्रेम करता है उस का कोई गुनाह (पाप) नही लिखा जाता, सच्चा प्रेम ऊन का अनुसण करना है जब कोई उन से मुहब्बत करेगा तो ज़रूर उन का अनुसण करेगा और ना पसंदीदा बातों से रूका रहेगा और जब यह हालत होगू तो गुनाह (पाप) नही लिखा जाएगा ।
ओलमा और संतों की दोस्ती रसूल-ए-खुदा ﷺ की दोस्ती है,
 पस ऐ दर्वेश (फक़ीर) ! जो इन्सान 7 दिन साफ दिल से आलिमों कि सेवा सत्कार करता है,गोया सात हज़ार साल अल्लाह की इबादत करता है,
इबेलीस लईन सब को धोका दे जाता है, लेकिन आलिमों और संतों को नहीं दे सकता, इस लिए कि आलिमों और संतों की दोस्ती से बढकर कोई चीज़ नही,जिस दिल में आलिमों और सूफियों का प्रेम हो उन के पापों का खलिहान उन की मुहब्बत का एक ज़र्रा जलाकर नाचीज़ कर देता है। फिर फरमाया कि आलिम हैं जो रात को जागे और दिन को रोज़ा रखें, आलिम की एक दिन की इबादत (पूजा) उस आबिदों (एबादत करने वाले) की 40 साल इबादत (पूजा) के बराबर है जो आलिम ना हो,
जब बलाएं मुसीबतें आसमान से उतरती हैं तो उस शहर पर कम उतरती होती हैं जिस में ओलमा और मशाईख हों। {ھشت بھشت /اسرارالاولیاء ص 129}
मुरत्तिब,तर्जुमा: व तस्हील
 Neyaz Ahmad Nizami


Tuesday, April 3, 2018

शौच का सही (इस्लामी) तरीक़ा:नेयाज़ अहमद निज़ामी,




فِيهِ رِجَالٌ يُحِبُّونَ أَن يَتَطَهَّرُواْ وَاللّهُ يُحِبُّ الْمُطَّهِّرِينَ{سورہ توبہ108 پ11}
तर्जुमा: इस मस्जिद यानी मस्जिद-ए-क़ोबा में ऐसे लोग हैं जो पाक (पवित्र) होने को पसंद रखते हैं,और अल्लाह दोस्त रखता है पाक (पवित्र) होने वालों को,
तफ्सीर {विस्तार}: होज़ूर सरवर-ए-आलम ﷺ ने क़ोबा वालों से पूछा कि अल्लाह ﷻ ने तुम्हारी सफाई और पवित्रता की तारीफ {प्रशंसा} की है, तुम में कौन सी खोसूसियत {अच्छाई} है ? उन्होने कहा कि हम क़ज़ा-ए-हाजत {शौच} के बाद पानी से इस्तिंजा {शौच के बाद पानी लेना} करते हैं, यह उन के क़ुदरती सफाई का सबूत है,कि जब वह इस मोआमले में इतने सतर्क हैं,तो उन के बदन और कपङे के बारे में  ख़ुद ही अंदाज़ा लगा सकते हैं, इस से मालूम हुआ कि जो इन्सान बदन की सफाई और पवित्रता का ख़ेयाल रखता है, वह भी परवरदिगार-ए-आलम के समक्ष प्रशंसा के क़ाबिल होता है।{تفسیر ضیاء القرآن ج دوم ص254}
:: शौच करने से पहले और बाद की दुआ::
हदीस:1
अबू दाऊद इब्न माजा ज़ैद बिन अर्क़म रज़ीयल्लाहो अन्हु से रावी, रसुल ﷺ फरमाते हैं : यह शौचालय जिन्न और शैतानों के रहने की जगह है तो जब कोई बैतुलख़ला {शौचालय} को जाए तो यह पढ ले,  
ْ اَعُوْذُبِ اللَّهِ مِنَ الْخُبُثِ وَالْخَبَآئثِ
अऊज़ो बिल्लाहे मेनल ख़ुब्स़े वल खबाइस़,
तर्जुमा: मैं अल्लाह की पनाह मांगता हूं नापाकी (अपवित्रता) और नापाकों {अपवित्र लोगों} से,,
सही बुखारी व मुस्लिम में यह दुआ यूं है,
اَللّٰہُمَّ اِنِّیْ اَعُوْذُبِکَ مِنَ الْخُبُثِ وَالْخَبَآئثِ
अल्लाहुम्मा इन्नी अऊज़ो बिका मिनल खुब्से वल खबाइसे,
तर्जुमा: ऐ अल्लाह मैं तेरी पनाह मांगता हूं पलीदी और शैतानों से,
हदीस:2
उम्मुल मुमेनीन आइशा सिद्दीक़ा رضی اللَّهُ عنہا से रावी कि रसूल ﷺ जब शौचालय से बाहर आते तो यूं फरमाते     غُفرَانَکَ   गुफरानका,
इब्न माजा की रेवायत अनस رضی اللَّهِ عنہ से यूं है,
اَلْحَمْدُ لِلّٰہِ الَّذِیْ اَذھَبَ عَنِی اْلاَ ذٰی وَ عَافَانِیْ،
अल्हम्दुलिल्लाहिल्लज़ी अज़हबा अ़निल अज़ा व आअ़फानी,
तर्जुमा: तमाम तारीफ है अल्लाह के लिए जिस नें नुकसान की चीज़ मुझ से दूर कर दी और मुझे आराम दी,
हदीस:3
रसूल ﷺ ने फरमाया कि '' जब शौच को जाओ तो काबा शरीफ को ना मुंह करो, ना पीठ और वह खास जगह को दाहिने हाथ से छूने और इस्तिंजा करने से मना फरमाया,
हदीस:4
हज़रत अनस रज़ियल्लाहू अन्हू रिवायत करते हैं  जब शौच का इरादा फरमाते तो कपङा ना हटाते जब तक कि ज़मीन से क़रीब ना हो जाएं,
हदीस:5
अबू सईद रज़ियल्लाहु अन्हू से रेवायत है कि रसूल ﷺ फरमाते हैं: दो लोग शौच को जाएं और दोनो द्वार से कपङा हटा कर बातें करें  तो अल्लाह ﷻ उस पर गज़ब फरमाता है।
::शौच करने का तरीक़ा::
जब शौच को जाए तो शौचालय से बाहर यह दुआ पढे,
اَللّٰہُمَّ اِنِّیْ اَعُوْذُبِکَ مِنَ الْخُبُثِ وَالْخَبَآئثِ
अल्लाहुम्मा इन्नी अऊज़ो बिका मिनल खुब्से वल खबाइसे,
तर्जुमा: ऐ अल्लाह मैं तेरी पनाह मांगता हूं पलीदी और शैतानों से,
फिर बायां पैर पहले प्रवेश करे और निकलते समय पहले दाहिना पैर बाहर निकाले और यह दुआ पढे,
اَلْحَمْدُ لِلّٰہِ الَّذِیْ اَذھَبَ عَنِی اْلاَ ذٰی وَ عَافَانِیْ،
अल्हम्दुलिल्लाहिल्लज़ी अज़हबा अ़निल अज़ा व आअ़फानी, कहे।
तर्जुमा: तमाम तारीफ है अल्लाह के लिए जिस नें नुकसान की चीज़ मुझ से दूर कर दी और मुझे आराम दी,
जब तक बैठने के क़रीब ना हो कपङा बदन से ना हटाए ना ज़रूरत से ज़्यादा बदन खोले, फिर दोनो पैर फैलाकर बांए पैर पर भार देकर बैठे,छींक या सलाम या अज़ान का जवाब ज़बान से ना दे, और अगर छींके तो ज़ुबान से अल्हम्दुलिल्लाह اَلْحَمْدُ لِلّٰهِ ना कहे दिल में कह ले और बे गैर अवश्यकता अपने गुप्तांग की तरफ ना देखे और ना ही उस के बदन से निकली हुई वस्तू को देखे,देर तक ना बैठे कि इस से बवासीर का डर है, और पेशाब तरने की जगह में ना थूके ,ना नाक साफ करे, ना बार बार इधर उधर  देखे , ना आसमान की तरफ देखे, बल्कि शर्म के साथ सर झुकाए रहे,
जब शौच हो लेवे तो दाहिने हाथ से पानी बहाए और बांए हाथ से धोए और पानी का लोटा ऊंचा रखे कि छींटा ना पङे और पहले पेशाब की जगह धोए फिर पाखाना की जगह,खूब अच्छी तरह धोए, कि धोने के बाद हाथ में बू बाक़ी ना रह जाए, फिर किसी पाक कपङे से पोछ डाले और अगर कपङा पास ना हो तो बार बार हाथ से पोंछे  कि बराए नाम तरी रह जाए  फिर उस जगह से बाहर आए  और यह दुआ पढे :
اَلْحَمْدُ لِلّٰہِ الَّذِی جَعَلَ الْمَاءَ طَھُوْرًا وَالْاِسْلَامَ نُورًا وَقَائِدًا وَدَلِیْلًا اِلَی اللّٰہِ وَاِلٰی جَنَّاتِ النَّعِمِ اللّٰھُمَّ حَصِّنْ فَرْجِیْ وَ طَھِّرْ قَلْبِیْ وَ مَحِّصْ ذُنُوْبِیْ،
तर्जुमा: हम्द (तारीफ) है अल्लाह के लिए जिस ने पानी को पाक करने वाला और इस्लाम को नूर और खुदा तक पहुंचाने वाला और जन्नत का रास्ता बताने वाला किया ऐ अल्लाह तु मेरी शर्मगाह (गुप्तांग) को महफूज़ रख  और मेरे दिल को पाक कर और मेरे गुनाह (पाप) दूर कर।
मसअला: शौच {लघुशंका/दिर्घशंका} करते समय या धोते में ना ही काबा शरीफ की तरफ मुंह हो ना पीठ,चाहे मकान में हो या मैदान में और अगर भूल कर काबा शरीफ की तरफ मुंह या पुश्त करके बैठ गया तो याद आते ही तुरन्त दिशा बदल दे इस में उम्मीद है कि फौरन उस के लिए मग़्फेरत फरमा दी जाए,
::फेक़्ही मसला::
मसअला:1 शौच {लघुशंका/दिर्घशंका} करते समय सुरज,चांद,की तरफ ना मुंह हो ना पीठ यूंही हवा की जानिब पेशाब करना मना है,
मसअला: 2 कुंए या हौज़ या चश्मा के किनारे या पानी में भले ही बहता हुआ हो या घाट पर या फल्दार वृक्ष के नीचे या उस खेत में जिस में खेती मौजूद हो या साया{छांव} में जहां लोग उठते बैठते हों  या मस्जिद ईदगाह के बग़ल में या क़ब्रिस्तान या रास्ता में या जिस जगह पालतू जानवर बन्धे हों, इन सब जगहों  में पेशाब पाखाना मकरूह {इस्लाम को ना पसंद है मगर इस के करने पर कोई अ़ज़ाब नही} है„ इसी तरह जिस जगह वज़ू या गुस्ल {स्नान} किया जाता है वहां भी पेशाब करने मकरूह है।
मसअला:3 खुद नीची जगह  बैठना और पेशाब की धार उंची जगह गिरे यह मना है।
मसअला: 4 ऐसी सख्त {कङी} ज़मीन पर जिस से पेशाब की छींटे उङ कर आएं पेशाब करना मना है।
मसअला: 5 खङे होकर या लेट कर या नंगे होकर  पेशाब करना मकरूह है।
मसअला: 6 नंगे सर पाखाना या पेशाब को जाना मना है।
मसअला: 7 दाहिने हाथ से इस्तिंजा करना मकरूह है , अगर किसी का बायां हाथ बेकार हो गया हो तो दाहिने  हाथ से जायज़ है।
मसअला: 8 तहारत (पानी लेने ) के बाद हाथ पाक (पवित्र) हो गए मगर फिर धो लेना बल्कि मिट्टी लगाकर धो लेना मुस्तहब है,
मसअला: 9 तहारत (पानी लेने ) के  बचे हुए पानी से वज़ू कर सकते हैं कुछ लोग जो इस को फेक देते हैं यह नहीं चाहिए असराफ (फोज़ूल खरची) मे आता है। (फक़त)
{استفادہ از بہار شریعت جلد1 حصہ دوم استنجے کا بیان / تفسیر ضیاءالقرآن جلد دوم}

मुरत्तिब,तर्जुमा: व तस्हील
 Neyaz Ahmad Nizami

Tuesday, January 9, 2018

ग्यारहवीं शरीफ की हक़ीक़त: नेयाज़ अहमद निज़ामी




हर साल रबीउल अव्वल (इस्लामी महीना) की ग्यारहवीं तारीख को पूरी दुनिया में हज़रत शैख़ अब्दुल क़ादिर जिलानी رحمۃ اللہ علیہ के इन्तेक़ाल के दिन पर धार्मिक काम करने के पक्क्ष में बङे धूम धाम से मनाया जाता है, इस तारीख को सय्यदोना शैख़ अब्दुल क़ादिर जिलानी رحمۃ اللہ علیہ की रूह को सवाब पहुंचाने की नियत से गरीबों मस्कीनों खाना खिलाने,कपङा बांटने, और अपनी पुंजी को हिसाब से  लोगों पर खर्च करने का एहतमाम करते हैं,
दुआ, सदका, खैरात के सवाब का फायेदा मुर्दो को और पहुंचाने वालों को मिलता है,
हदीस: हज़रत अनस رضی اللہ عنہ  से रिवायत है कि
 उन्होने सरकारे दोआलम ﷺ से पूछा या रसूलल्लाह हम अपने मुर्दों की तरफ से सदक़ा और हज करते हैं और उन के लिए दुआ करते हैं,तो क्या यह उन को पहुंचता है?
 सरकार ﷺ ने फरमाया हां बेला शुब्हा वह पहुंचता है और इस से वह ख़ुश होते हैं।

हज़रत शैख अब्दुल हक मुहद्दिसे देहलवी हर साल ग्यारहवीं बङे अदब और एहतराम से मनाते थे,

रहा यह सवाल कि उसी ख़ास दिन को निर्धारित करना कैसा?
इस बारे में शैख अब्दुल हक मुहद्दिसे देहलवी फरमाते हैं किसी दिन के निर्धारित करने से कोई फर्क़ नही पङता ,किसी भी उर्स में एक तरह की दावत और ज़ेयाफत (मेहमान नवाज़ी) होती है,और यह ज़ेयाफत (मेहमान नवाज़ी) सुन्नत है अत: (लेहाजा़) एक दिन ख़ास कर के दावत का इन्तेज़ाम करना उस आम सुन्नत से बाहर नही कहलाएगा,,
और किसी  अच्छे कार्य के लिए दिनो को निर्धारित करना तो रसूल ﷺ से साबित है जैसा कि
हदीस: मुहम्मद बिन नोअमान  رضی اللہ عنہ  से मरवी है वह नबी ﷺ  मरफूअन बेयान करते हैं कि: जो अपने मां बाप या इन दोनो में से किसी एक की क़ब्र की हर जुमा को ज़्यारत करे उस को बख़्श दिया जाता है और उसे नेंक और फरमांबरदार लिख दिया जाता है,
दिनो के निर्धारित करने हेतू हबहुत सारे सोबूच मौजुद हैं जैसा कि हजरत ईसा علیہ السلام के बारे मे सुरह मर्यम आयत 33 में है
وَالسَّلَامُ عَلَىَّ يَوْمَ وُلِـدْتُّ وَيَوْمَ اَمُوْتُ وَيَوْمَ اُبْعَثُ حَيًّا

तर्जुमा: और सलामती मुझ पर जिस दिन मैं पैदा हुआ और जिस दिन मैं मरूं और जिस दिन मैं ज़िन्दा उठाया जाऊं,,
इन वाक़ेयात से पता चला कि पैदाईश का दिन और मौत का दिन दोनो मुहतरम (इज़्ज़त वाला) दिन हैं इसी लिए ओलमा (आलीम) ने वेसाल (मृत्यू) के दिन खाने की दावत, तिलावते कुरआन, अल्लाह ती तस्बीह, और उस जिन माली बदनी इबादत का सवाब बज़ुर्गाने दीन में से कीसी बुजूर्ग की रूह को इसाले सवाब करने को ख़ास फरमाया है,

जब ग्यारहवीं शरीफ का खास दिन मनाना जायज़ हुआ तो उस दिन मेहमानें की मेहमान नवाज़ी के लिए मूर्ग़ा बकरा वगैरह जिबह (हलाल) करना भी जायज हुआ,यह ध्यान रहे कि इस मौक़ा से जो जानवर  जिबह (हलाल) किया जाता है उस के जिबह (हलाल) के समय अल्लाह तअाला ही का नाम लिया जाता है और "बिस्मिल्लाहे अल्लाहु अकबर,, (بسم الله الله اكبر) कह कर ही जिबह (हलाल) किया जाता है,उस जानवर को गौसे आज़म का नाम लेकर नही जिबह किया जाता है,
हज़रत मौलाना शाह अब्दुर्रहमान अपनी मलफुज़ात मे फरमाते हैं कि,
"ग्यारहवीं की हकिकत यह है कि हज़रत शैख़ अब्दुल क़ादिर जिलानी رحمۃ اللہ علیہ  हर महीना रबिउल अव्वल की 11 तारीख रसूले अकरम ﷺ का फातेहा चहल्लुम मनाते थे आप के मानने वाले(अनूयाई) भी इन्ही तारीखों में यही फातेहा ग्यारहवीं के नाम से मनाने लगे,धीरे धीरे यह ग्यारहवीं खुद सय्यदोना अब्दुल क़ादिर जिलानी رحمۃ اللہ علیہ  की तरफ मन्सूब हो गई,आज कल जो ग्यारहवीं मनाई जाती है उस में सय्यदोना शैख़ अब्दुल क़ादिर जिलानी رحمۃ اللہ علیہ  का फातेहा होता है और उन के नाम से नेयाज़ दिलाई जाती है,
 (मफहूमे तजकेर-ए-मशाईखे एजाम पेज 175-176-177-178)


मुरत्तिब,तर्जुमा: व तस्हील
 Neyaz Ahmad Nizami


Sunday, January 7, 2018

जीवनी ग़ौस़-ए-आज़म-: नेयाज़ अहमद निज़ामी






:: आप का जन्म मुबारक ::
सय्यदोना गौस-ए-आ़ज़म का जन्म मुबारक 1 रमज़ान शरीफ जुमा (शुक्रवार) के दिन 470ھ मुताबिक़ 1077ء गिलान में हुआ आप के पुर्वज का वतन जियाल या जील या जिलान था इसी निस्बत से आप को जिलानी या गिलानी कहते हैं। (مفھوم مرآۃالاسرار ص562 و تزکرہ مشائخ عظام ص 188)

:: नाम नसब ::
आप का नाम नामी अब्दुल क़ादिर और कुन्नियत अबू मुहम्मद लक़ब मोहियुद्दीन महबूबे सुब्हानी है, और दुनिया इन्हे गौस-ए-आज़म,ग़ौस पाक, बङे पीर, पीरान-ए-पीर ,पीर दस्तगीर, सुल्तानुल अवलिया,दानाए असरारे ग़ैब, गौस़ुस्सकलैन, शेर बेशए मारफत,वगैरह के नाम से भी जानती है।

वालिद माजिद (पिता श्री) की तरफ से खानदानी सिलसिला यूं है::
हज़रत शैख़ अब्दुल क़ादिर जिलानी बिन सय्यद अबू सालेह मूसा जंगी दोस्त बिन सय्यद अबू अब्दुल्लाह बिन सय्यद यहया ज़ाहिद बिन सय्यद मुहम्मद रूमी बिन सय्यद दाऊद बिन सय्यद मुसा जौन बिन सय्यद अब्दुल्लाह स़ानी बिन सय्यद अब्दुल्लाह महज़ बिन सय्यद हसन मुस़न्ना बिन सय्यदोना इमामे हसन बिन अमीरुल मुमेनीन सय्यदोना अ़ली इब्न अबी तालिब رضی اللہ عنھم اجمعین ،

वालिदा माजिदा (माता श्री ) की तरफ से खानदानी सिलसिला यूं है::
हज़रत उम्मुल ख़ैर फातेमा बिन्त सय्यद अब्दुल्लाह सोमई ज़ाहिद बिन सय्यद अबू जमाल बिन सय्यद मुहम्मद बिन सय्यद अबुलअ़ता अब्दुल्लाह बिन सय्यद कमालुद्दीन ईसा बिन सय्यद अबू अ़लाउद्दीन अल जव्वाद बिन इमाम अली रज़ा बिन इमाम मुसा काज़िम बिन इमाम जाअ़फर सादिक़ बिन इमाम मुहम्मद बाक़र बिन इमाम ज़ैनूलआबेदीन बिन इमाम हुसैन बिन अमीरुल मुमेनीन सय्यदोना अ़ली इब्न अबी तालिब رضی اللہ عنھم اجمعین (تزکرہ مشائخ عظام ص188)

पिता की तरफ से हसनी और माता की तरफ से हुसैनी सय्यद होने के नाते आप رحمۃ اللہ عیہ को नजीबुत्तरफैन सय्यद भी कहा जाता है।

:: आप का बचपन ::
शैख़ अब्दुल क़ादिर जिलानी رحمۃ اللہ علیہ की माता श्री कहती हैं कि जब मेरा लङका पैदा हुआ तो रमज़ान शरीफ में दिन भर दूध नहीं पीता था जन्म के दूसरे साल आसमान में बादल होने की वजह से लोगों को रमज़ान का चांद दिखाई ना दिया इस लिए लोगों नें मेरे पास आकर सय्यदोना अब्दुल क़ादिर जिलानी के बारे में पूछा कि इन्होंने दुध पिया है कि नही? तो मैने उन को बताया कि मेरे बेटे ने आज दूध नही पिया है, इस के बाद छानबीन करने पर पता चला कि उस दिन रमज़ान की पहली तारीख थी यानी उस दिन रोज़ा था,(سیرت غوث اعظم- عالم فقری ص26)
शैख़ अब्दुल क़ादिर जिलानी رحمۃ اللہ علیہ फरमाते हैं कि मेैं उस समय अपने घर में बच्चा था जब मैं बच्चों के साथ खेलने का इरादा करता तो मैं कहने वाले को सुनता कि वह मुझसे कहता है ऐ बरकत वाले किधर जाते हो तब मैं डर कर भागता और अपनी मां की गोद में पङ जाता।
शैख़ अब्दुल क़ादिर जिलानी رحمۃ اللہ علیہ जब घर से मदरसा को जाते तो अध्यापक लङकों से कहते थे कि वली अल्लाह के लिए जगह चौङी करो ताकि वह बैठ जाए। (بہجۃالاسرار ص 50)

:: आप का होलिया मुबारक ::
शैख़ अब्दुल क़ादिर जिलानी رحمۃ اللہ علیہ ज़ईफ-उल-बदन, दरमियाना क़द, चौङा सीना, चौङी दाङी, लम्बी गरदन, गन्दुमी रंग, मिले हुए भंव, काली आंखें, बुलंद आवाज़,के मालिक थे।(غوث پاک کے حالات ص 24)

:: तालीम व तरबियत (शिक्षा व पोषण) ::
ग़ौस पाक رحمۃ اللہ علیہ ने अभी होश भी ना सम्भाला था कि वालीद माजिद (पिता श्री) का साया सर से उठ गया और अाप के नाना हज़रत सय्यद अब्दुल्लाह सोमई ज़ाहिद رحمۃ اللہ علیہ ने ग़ौस पाक के पालन पोशण की ज़िम्मेदारी अपने सर लेली और इस तरह अपनी मां की छत्र छाया तले आप परवान चढते रहे जब मकतब जाने की उम्र हुई तो तालीम का आग़ाज़ हुआ रहमते ख़ुदावन्दी शामिल-ए-हाल रही,(تزکرہ مشائخ عظام ص189)
बग़दाद का सफर ::
आप 18 साल की उम्र यानी 488ھ में अपनी मां की ख़िदमत में जाकर अर्ज़ किया कि मुझे राहे हक़ तआला पर चलने की इजाज़त दें ताकि बद़गाद जाकर इल्म (शिक्षा) प्राप्त करूं आप रोईं और 40 दिनार गौस पाक के कपङे के बगल में सी कर इजाजत दे दिया और उन्होने दुआ के साथ साथ नसीहत भी कीं कि झूट ना बोलना , मैं एक क़ाफिले के साथ बगदाद को रवाना हो गया हमदान से क़ाफिला गुज़र चुका तो 60डाकुओं ने क़ाफिले के उपर हमला कर दिया और सामान को लूटने लगे मगर मेरी तरफ किसी ने भी ध्यान ना दिया अचानक एक डाकू मेरे पास आकर पूछा ऐ फक़ीर तेरे पास क्या है मैने कहा 40 दिनार मेरे कपङों में सिले हुए हैं, लेकिन उसे यक़ीन ना आया और वह चला गया एक और डाकू ने वही सवाल किया मैने वही जवाब दिया वह भी चला गया दोनो ने अपने सरदार के पास जाकर वही माजरा बयान किया सरदार ने भी वही सवाल किया और मैने वही जवाब दिया, मेरा कपङा फाङकर देखा तो 40 दिनार पाकर डाकू के सरदार ने कहा कि तुमने अपने माल को जाहिर क्यु किया? मैने कहा कि मेरी मां ने झूट बोलने से मना किया था,यह सूनकर चोरों के सरदार ने रोना शुरू कर दिया और मेरे हाथ पर अपने साथियों के साथ तौबा कर ली और छीना हुआ सामान वापस दे दिया(مرآۃالاسرار ص563/564)
डाकुओं के सरदार का नाम अहमद बदवी था। (تذکرہ مشائخ عظام ص190)
रेयाज़त और मुजाहिदात::
जब आप बगदाद में 488ھ में शिक्षा के लिए आए तो उसी समय से तसव्वुफ की जानिब ध्यान और तप जारी था सुन सान जगहों में जाकर ज़िक्र व अज़कार में लगे रहते सबक (कलास) के बाद जंगल की तरफ निकल जाते दिन हो या रात आंधी हो या बारिश हर चीज़ से ला परवाह हो कर जंगलों में फिरते रहते सर पे छोटा सा अमामा (पगङी) होता, नंगे पैर कांटो और पथरीली ज़मीन पर चलते रहते दरिया-ए-दजला के किनारे साग या दुसरी तरकारियां खा लेते गरज़ेकि गौस-ए-आज़म के उपर जो भी मुसीबत पङती उसे बरदाश्त कर लेते।
खुद फरमाते हैं कि इल्मे शरीयत (धर्म ज्ञान) पुर्ण करने के बाद पूरे तौर पर सोलूक तसव्वफ की तरफ मुंह मोङ लिया और बगदाद के सब से बङे शैख तरीक़त हज़रत अबुल ख़ैर हम्माद बिन मुस्लिम दब्बास رحمۃاللہ علیہ से तरीक़त व माअरेफत का ज्ञान प्राप्त किया और जब ज़ौक़ बढता गया तो विरानो जंगलों का रुख अपना कर अपने आप को तरह तरह की रियाज़तों और मुशक्कतों में डाला,
आप रहमतुल्लाह अलैह फरमाते हैं कि नफ्स अपने इच्छा अनुसार मुझपे कभी हावी नही हुआ और ना ही दुनिया की सुन्दरता ने मुझे आकरसित किया

:: बैअ़त और ख़ेलाफता ::
नफ्स की सफाई के बाद किसी पीर कामिल की आरज़ू पैदा हुई और शैख अबू सईद मुबारक मख़ज़ूमी رحمۃاللہ علیہ से बैअ़त और खेलाफत लेने के बाद तरीकत व सोलूक के रोसूम सीखीं, इस के अलावा शैख़ मुहम्मद बिन मुस्लिम-उल-अयास से भी तसव्वफ व माअरेफत हासिल की, (تذکرہ مشائخ عظام ص192)

:: मुतफर्रिक़ात ::
आप ने कोई नया मदरसा नहीं खोला बल्कि अपने उस्ताद शैख अबू सईद मुबारक मख़ज़ूमी رحمۃاللہ علیہ के मदरसे ही में लोगों को इल्म के नूर से मनव्वर करते रहे,
हज़रत गौस़-ए-आज़म इर्शाद फरमाते हैं कि शुरू ज़माना में मैंने नबी अलैहिस्सलाम और हज़रत अली रज़ियल्लाहु अन्हु को ख़्वाब (सपने) में देखा कि मुझे वाज़ (पर्वचन) कहने का हुक्म फरमा रहे हैं और मेरे मुंह में अपना लुआबे दहन (मुंह का थूक) डाला , बस उस का असर यह हुआ कि मेरे लिए वाज़ (पर्वचन) कहने की बङी उप्लब्धी मिल गई,
आप की मजलिस (बैठकी) में कुल अवलिया व अम्बिया, हयात व अजसाद और अमवात अरवाह के साथ जिन और फरिश्ते हाज़िर होते थे खिज्र अलैहिस्सलाम तो कभी कभी मजलिस (बैठकी) में शरीक होते थे और वक़्त के मशाएख को मजलिस (बैठकी) में आने की दावत देते थे और कहते कि जिसे कामियाबी चाहिए वह शैख गौसे आज़म की मजलिस की नोकरी को जरूरी जान ले।

:: इन्तेक़ाल  (मृत्यू) ::
आप का वेसाल (मृत्यू) 27 शअबान सोमवार को 513 हिजरी में बद़दाद शरीफ में हुआ, मगर कुछ लोगों नें 4 शअबान, 10 मुहर्रम, 7 शअबान,508हिजरी भी लिखा है,
आप का मज़ार मुबारक बगदाद शरीफ मेंआप के मदरसे के बाबुल अजज़ में है।(سیرت غوث اعظم ص67)

::बीवियां और औलादें ::
गौसे आज़म रजियाल्लाहु अन्हु ने 51 साल की उम्र में शादी की,वह भी अल्लाह की रेज़ा के लिए आप ने फरमाया कि बहुत ज़माना से नबी अलैहिस्सलाम की सुन्नत के लिए निकाह की ख्वाहिश रखता था मगर यह सोच कर हिम्मत नही जुटा पाता कि कहीं शादी मेरी इबादत में रुकावट की वजह ना बन जाए मगर अल्लाह ने हर काम होने का एक समय मुक़र्रर कर रखा है लिहाज़ा जब वह समय आया तो अल्लाह के करम से मेरी शादी हो गई और अल्लाह ने 4बीवियां दीं और उन में से हर एक मुझ से मुहब्बत रखती थी (سیرت غوث اعظم247)
औलाद-:
हजरत शैख अब्दुल क़ादिर जिलानीرحمۃ اللہ علیہ की बहुत औलाद थे चुंकि आप की 4 बीवियां थीं इस लिए उन्ही से बहुत से बेटे और बेटियां पैदा हुईं, कहा जाता है कि आप के कुल 49 औलादें हुईं इतनी औलादें होने के बावजूद उन का पालन पोषण बहुत अच्छे तरीक़े से किए,
गौसे आज़म رضی اللہ تعالی عنہ फरमाते हैं कि जब मेरे घर कोई बच्चा पैदा होता है तो मैं उसे अपने हाथों में लेता हूं और यह कह कर कि वह मुर्दा है, फिर अगर वह मर भी जाता है तो मुझे उस की मौत से कोई रंज गम नही होता,
आप की औलादों में से कई इल्म के समुन्दर निकले। (سیرت غوث اعظم248)
आप के जिन बेटों का नाम सिरत व सवानेह की किताबों मे मिलता है उन के नाम यह हैं,
1-हज़रत सयदोना सैफुद्दीन अब्दुल वहाब जिलानी
2- हज़रत शैख़ शरफुद्दीन ईसा जिलानी
3- हज़रत शैख़ सेराजुद्दीन अब्दुल जब्बार
4- हज़रत शैख़ शमसुद्दीन अब्दुल अज़ीज़
5- हज़रत शैख़ अबू इस्हाक़ इब्राहीम
6- हज़रत शैख़ अबूल फज़्ल सय्यद मुहम्मद
7- हज़रत शैख़ अबू अब्दुर्रहमान सय्यद अब्दुल्लाह
8- हज़रत शैख़ ज़्याउद्दीन अबू नसर मुसा
9- हज़रत अबू ज़कर यहया
10- हज़रत शैख़ अबू अब्दुल्लाह अली
11- हज़रत शैख़ अबू बकर ताजुद्दीन अब्दुर्रज़ाक
मनाक़िबे गौसिया किताब में निम्न नाम और हैं
12- हज़रत शैख़ सय्यद यूसुफ
13- हज़रत शैख़ सय्यद अबू सॉलेह
14- हज़रत शैख़ सय्यद अब्दुल गफ्फार
15- हज़रत शैख़ सय्यद हबीबुल्लाह
16- हज़रत शैख़ सय्यद ज़ाहिद
17- हज़रत शैख़ सय्यद मंसूर
18- हज़रत शैख़ सय्यद अब्दुल ख़ालिक़
19- हज़रत शैख़ सय्यद अब्दुर्रउफ
20- हज़रत शैख़ सय्यद मज़दुद्दीन
तफरीहुल ख़ातिर नामी किताब में दो नाम और है,
21- हज़रत शैख़ सय्यद अब्दुल ग़नी
22- हज़रत शैख़ सय्यद अब्दुल गफूर  رحمھم اللہ تعالی علیھم اجمعین  (تذکرہ مشائخ عظام ص 170)

:: आप की करामात ::
गौसे पाक رحمۃ اللہ علیہ के पास उमर बिन सॉलेह अपनी उंटनी लेकर आया और उस ने कहा कि मेरा हज का इरादा है और मेरी इकलौती उंटनी चल नही सकती पस आप رحمۃ اللہ علیہ ने उस को एक उंगली लगाई और और उस की पेशानी (माथा) पर अपना हाथ रखा वह कहता था कि उस की हालत यह थी कि तमाम सवारियों से आगे चलती थी ।
गौसे पाक رحمۃ اللہ علیہ के पास अबुल मोआली आए और कहने लगे कि मेरे बेटे मुहम्मद को 15 महीने से बोखार आ रहा है, गौसे पाक رحمۃ اللہ علیہ ने फरमाया कि जाओ और उस के कान में कह दो ऐ उम्मे मुल्दुम तुम से अब्दुल क़ादिर फरमाते हैं कि मेरो बेटे से निकल कर हुल्ला की तरफ चले जाओ, यह कहने के बाद फिर कभी बुख़ार उन्हे हुआ ही नहीं। (غوث پاک کے حالات ص 50-51)
و آخر دعوان الحمد لللہ رب العالمین
जमा,तरतीब, तसहील,
 नेयाज़ अहमद निज़ामी