neyaz ahmad nizami

Saturday, April 20, 2019

शब-ए-बराअत और उस की नफ्ल नमाज़ें:


नयाज़ अहमद निज़ामी

इस्लामी महीना शाअबान की पंद्रहवीं तारीख की रात का नाम “शब-ए-बराअत„ यानी निजात की रात (छुटकारा की रात) है, इस बरकत वाली रात के चार नाम हैं,
लैलतुल बराअत (ْْلَيْلَةُ الْبَرَاءَة) निजात वाली रात,

लैलतु-उर-रहमा  (لَيْلَةُالرَّحْمَة) रहमत वाली रात,

लैलतु-उल-मुबारका (لَيْلَةُ الْمباركة) बरकत वाली रात,

लैलतु-उल-सक (لَيْلَةُ الصَّک) निजात का चेक मिलने वाली रात,

क़ुरआन मजीद में अल्लाह ने इस मुबारक रात के बारे मे इस तरह फरमाया:
فِـيْـهَا يُفْرَقُ كُلُّ اَمْرٍ حَكِـيْمٍ
तर्जुमा: इस रात में हमारे हुक्म से हर हिकमत वाला काम बांट दिया जाता है। (سورہ دُخّانْ ت 4)
यानी शब-बराअत में बंदों की रोज़ियां, उनकी मौत व जन्म, लङाईयां,ज़लज़ले, हादेसा, साल भर में होने वाले तमाम वाकेयात के हुक्म अलग अलग बांट दिए जाते हैं, और हर काम के फरिश्तों को उन का काम दे दिया जाता है जिस का वह साल भर तक पालन करते हैं,

शफाअत की रात:
तेरहवीं शअबान को होज़ूरने अल्लाह की बारगाह में अपनी उम्मत की शफाअत की कही तो एक तिहाई उम्मत शफाअत क़बूल हुई, फिर चौदहवीं रात में दुआ की तो दो तिहाई बख़्शी गई, फिर पंद्रहवीं रात में मोनाजात (दुआ) की तो उन ना फरमान बंदों के सिवा जो खुदा से मुंह मोङ कर भागते हैं सारी उम्मत के हक़ में शेफाअत कोबूल हो गई,(صاوی)

शब-ए-बराअत के ख़ुश नसीब और बद नसीब:
होज़ूर ﷺ ने फरमाया कि इस रात में अल्लाह तआला तमाम मुसलमानों को बख्श देता है मगर नजूमी, जादूगर, शराबी, ब्लात्कारी, माता पिता का आज्ञाकारी, सूद खाने वाला, बंदों का हक मारने वाला, मुसलमानों में फूट डालने वाला, किसी मुसलमान से जलन रखने वाला, बे गैर किसी धर्मिक वजह के रिश्तेदारी छोङ देने वाला, इस रात में नही बख्शा जाता,
होज़ूर ﷺ ने फरमाया कि अल्लाह तआला पंद्रहवीं शअबान की रात में आसमान दुनिया (सब से नीचे वाले आसमान) पर तजल्ली फरमाता है, और बनी कल्ब कबीला की तमाम बकरियों के बालों से भी ज़्यादा बंदों को बख्श देता है,
हजरत आइशा رضی اللہ عنہا फरमाती हैं कि मैं ने देखा कि होज़ूर ﷺ मदीना की क़ब्रिस्तान (بقيع الغرقد ) में तशरीफ ले गए और मुसलमान मर्दों औरतों और शहीदों के लिए दुआ फरमाई, फिर क़ब्रिस्तान से वापस होकर नमाज़ में व्यस्त हो गए  और सजदे में बङी देर तक आप यह दुआ करते रहे।
أَعُوذُ بِرِضَاكَ مِنْ سَخَطِكَ، وَأَعُوذُ بِعَفْوِكَ مِنْ عِقَابِكَ، وَأَعُوذُبِكَ مِنْكَ، لَا أُحْصِي ثَنَاءً عَلَيْكَ، أَنْتَ كَمَا أَثْنَيْتَ عَلَى نَفْسِكَ اَقُولُ کَمَا قَالَ اَخِی دَاوُدُ اُعَفِّرُ وَجْھِی فِی التُّرَابِ لِسَیَّدِی وَ حُقَّ لَہُ اَنْ یُسْجَدَ،
तर्जुमा: (ऐ अल्लाह!) पनाह (श्रण) मांगता हूं मैं तेरी रज़ा (मरजी) के साथ तेरे गजब (गुस्सा) से और पनाह मांगता हूं मैं तेरी माफी के साथ तेरे अ़ज़ाब से, और तुझ से तेरी ही पनाह लेता हूं, मैं तेरी तारीफ की ताकत (शक्ती) नही रखता हूं जितना तेरा हक है, तेरी ज़ात वैसी ही है जैसी तुने खुद अपनी तारीफ की है,  मैं वही कहता हूं जो मेरे भाई दाऊद अलैहिस्सलाम ने कहा है, मैं अपने चेहरे को धूल में मिलाता हूं अपने मौला के लिए, और वह उसी लाएक़ है कि उस को सजदा किया जावे, फिर होज़ूर ने सजदे से सर उठा कर देर तक यह दुआ पढी,

· اللَّهُمَّ ارزقني قَلْباً تَقِيَّاً نَقِيَّاً ، مِنَ الشِّرْكِ نقيا ، لاَ فِاجراًوَلاَ شَقِيَّا،
तर्जुमा: ऐ अल्लाह! मुझ को परहेज़गार दिल अता कर जो शिर्क से पाक व साफ हो जो ना बदकार हो ना बदनसीब,

आधे शअबान की दुआ:
«اللَّهُمَّ يَا ذَا الْمَنِّ وَلَا يُمَنُّ عَلَيْهِ، يَا ذَا الْجَلَالِ وَالإِكْرَامِ، يَا ذَا الطَّوْلِ وَالإِنْعَامِ. لَا إِلَهَ إِلَّا أَنْتَ ظَهْرَ اللَّاجِئينَ، وَجَارَ الْمُسْتَجِرِينَ، وَأَمَانَ الْخَائِفِينَ. اللَّهُمَّ إِنْ كُنْتَ كَتَبْتَنِي عِنْدَكَ فِي أُمِّ الْكِتَابِ شَقِيًّا أَوْ مَحْرُومًا أَوْ مَطْرُودًا أَوْ مُقَتَّرًا عَلَيَّ فِي الرِّزْقِ، فَامْحُ اللَّهُمَّ بِفَضْلِكَ شَقَاوَتِي وَحِرْمَانِي وَطَرْدِي وَإِقْتَارَ رِزْقِي، وَأَثْبِتْنِي عِنْدَكَ فِي أُمِّ الْكِتَابِ سَعِيدًا مَرْزُوقًا مُوَفَّقًا لِلْخَيْرَاتِ، فَإِنَّكَ قُلْتَ وَقَوْلُكَ الْحَقُّ فِي كِتَابِكَ الْمُنْزَلِ عَلَى لِسَانِ نَبِيِّكَ الْمُرْسَلِ: ﴿يَمْحُو اللهُ مَا يَشَاءُ وَيُثْبِتُ وَعِنْدَهُ أُمُّ الْكِتَابِ﴾، إِلهِي بِالتَّجَلِّي الْأَعْظَمِ فِي لَيْلَةِ النِّصْفِ مِنْ شَهْرِ شَعْبَانَ الْمُكَرَّمِ، الَّتِي يُفْرَقُ فِيهَا كُلُّ أَمْرٍ حَكِيمٍ وَيُبْرَمُ، أَنْ تَكْشِفَ عَنَّا مِنَ الْبَلَاءِ وَالْبَلْوَآءِ مَا نَعْلَمُ وَمَا لَا نَعْلَمُ وَمَا أَنْتَ بِهِ أَعْلَمُ، إِنَّكَ أَنْتَ الْأَعَزُّ الْأَكْرَمُ. وَصَلَّى اللهُ تَعَالٰی عَلَى سَيِّدِنَا مُحَمَّدٍوَّ عَلٰی آلِهِ وَصَحْبِهِ وَسَلَّمَ والْحَمْدُ لِلّٰہ رَبِّ العٰلَمِینَ،
तर्जुमा: ऐ मेरे अल्लाह! तू ही सब पर एहसान करने वाला है और तुझ पर कोई एहसान नही कर सकता है, ऐ बूज़ुर्गी और मेहरबानी रखने वाले और ऐ बख़्शिश और इनआम वाले तेरे सिवा कोई पूज्यनीय नही तू ही गिर्तों को थामने वाला है, बे पनाहों को पनाह (श्रण) देने वाला, और डरने वालों का सहारा है,
ऐ अल्लाह! अगर तूने मुझे  अपने पास किताब कुरआन में भटका हूआ ,महरूम, कम नसीब, लिख दिया है तो ऐ अल्लाह! अपने फज़्ल से बद बख्ती रांदी और रोज़ी की कमी को मिटा दे,
और अपने पास कुरआन मजीद में खुश नसीब ज़्यादा रिज़्क़ वाला , और  नेक कर दे, बे शक तेरा यह कहना  तेरी किताब में  जो नबी-ए-मुर्सल  पर उतारी गई वह सच है, कि अल्लाह जो चाहता है मिटाता है, और जो चाहता है बना देता है, और उसी के पास कुरआन है,
ऐ खुदा! सब से बङी तजल्ली का वास्ता! इस आधे शअबान की रात में जिस में हर हिकमत वाले कामों का बटवारा और लागू होता है, मेरी बलाओं को दूर फरमा, चाहे मैं उन को जानता हूं या ना जानता हूं और जिन को तू पहले  से जानता है, बे शक तू ही सब से बर तर (बङ कर) और बढ कर एहसान करने वाला है, अल्लाह की रहमत और सलामती हो, हमारे आक़ा मुहम्मद ﷺ पर और उन की आल और सहाबा पर, आमीन सुम्मा आमीन,

शब-ए-बराअत की नफ्ल नमाज़ें:

(1) इशा के बाद 12रकात नफ्ल पढे हर रकात में अल-हम्दो के बाद 10 बार कुल हुअल्लाहू पढे और नमाज़ के बाद 10मरतबा कलमा तौहीद 10मरतबा कलमा तमजीद और एक सौ (100) बार दोरूद शरीफ पढें।

(2) जो इस रात 100रकात नमाज़े नफ्ल पढेगा अल्लाह उस के पास एक सौ फरिश्तों को भेजेगा 30 फरिश्ते उस को जन्नत की खुश्खबरी देंगे, और 30 फरिश्ते उस को जहन्नम से निडर होने की खुश्खबरी सुनाएंगे, और 30फरिश्ते दुनिया की आफतों को उस से टालते रहेंगे, और 10 फरिश्ते उस को शैतान के मकर और फरेब से बचाते रहेंगे।

(3) मगरीब के बाद 2-2 रकात कर के 6 रकात नमाज़ पढे और हर दो रकात के बाद सूरह यासीन एक बार या क़ुल हुअल्लाह 21 बार पढे पहली बार सूरह यासीन लम्बी उम्र, दुसरी बार रोज़ी की तरक्की के लिए और तीसरी बार मूसीबत के दफा के लिए,

(4) 14 रकात हर रकात में अलहम्दो के बाद जो सूरह चाहे पढे, जो भी दुआ मांगे क़ोबूल होगी ,

(5) 4रकात एक सलाम से हर रकात में अलहम्दो के बाद 50 बार क़ुल हुअल्लाहु अहद, गुनाहों से ऐसे पाक हो जाएगा जैसे मां को पेट से अभी निकला हो,
{موسم رحمت شب براءت کا بیان/سنی جنتری20

19}

हिंदी अनुवादक:
 नेयाज़ अहमद निज़ामी

Friday, April 12, 2019

الفقہ


فقہ کا کھیت عبداللّٰه بن مسعود نے بویا، اور  علقمہ  بن قیس نے اس کو سینچا، اور ابراھیم نخعی نے اس کو کاٹا، اور حماد بن مسلم اس کو مانڈا یعنی بھوسی سے اناج جُدا کیا، اور ابو_حنیفہ نے اس کو پیسا، اور ابو_یوسف نے اس کو گوندھا، اور محمد_بن_حسن نے اس کی روٹیاں پکائیں،
اور

[ باقی اس کے کھانے والے ہیں ]


حدائق الحنفیہ ص39



Friday, February 22, 2019

क़ूतुब मदार की शिक्षा [नेयाज़ अहमद]





ज़िंदा शाह मदार رَحمَةُ اللّٰه عَلَيه ऐसे फकीरों में से हैं कि पूरी दुनिया में आप की कोई मिस़ाल नही मिलती है, और ना ही आप के जीवन की कोई मिस़ाल मिल सकती है क्युंकि आप ऐसा समुंदर थे जिस का कोई किनारा नही था, और इंसानी ताकत से बाहर है कि आप की 600 वर्ष के जीवन को लीखित ला सके,मगर कुछ यहा लिख देता हूं ताकि जन मानस फायदा प्राप्त करते रहें।

• हर इंसान के पास एक ही दिल है फिर उस में दुनिया और आख़ेरत की एक ही तरह मुहब्बत कैसे संभव है।

History of baba madar

• अल्लाह से तौबा (क्षमा) मांगिए और उसी पर डटे रहिए क्युंकि शान तौबा (क्षमा) करने में नहीं तौबा (क्षमा) पर डटे रहने में है।

• ईमान (ایمان/Faith) की जङ तौहीद (एक खुदा) और एखलास पर क़ायम है  तौहीद एखलास के ज़रिए अपने अमल की बुनियाद को मज़बूत कीजिए।

•आप के अमल (कर्म) आप के अकीदे (Beliefs) को ज़ाहिर करते हैं और आप के ज़ाहिर आप के बातिन (अंतरात्मा) की निशानी है।

• आप अपने तमाम मामलों में होजूर ُصَلَّی اللّٰه عَلَيْهِ وَسَلَّم के समीप खङे हो जाएं और आदेश व पैरवी के लिए तयार रहें।
                   [Madar Baba]

• अगर दिल सादर सत्कार वाला बन जाए तो जिस्म के सभी हिस्से सादर सत्कार वाले हो जाएंगे।

• बे गैर अमल इल्म (ज्ञान) की कोई हैसियत नही है वह आखेरत में कोई फायदा नही दे सकता।

• सूफी वह है जो अपने पसंदीदी चीज़ को छोङ दे और अल्लाह के अलावा किसी के साथ  भी सुकून से ना रहे।
            
       [History Of Madar]

• आप ने कहा कि
  الفقر نور من انوار الله والغناء غضب من اغضاب الله
यानी गरीबी अल्लाह के नूर में से एक नूर है और अमीरी (मालदारी) अल्लाह के गज़ब में से एक ग़ज़ब है।
(नोट: अमीरी से मतलब दुनिया के माल दौलत की मुहब्बत है)
(تاريخ سلاطين و صوفياء جونپور1439/1440)


Neyaz Ahmad Nizami


ओहुद पहाङ से ज़्यादा सवाब {(पुन्य} नेयाज़ अहमद निज़ामी




ताजदार-ए-मदीना ﷺ ने एक बार इर्शाद फरमाया क्या तुम में से कोई ऐसा नही है जो रोज़ाना ओहुद पहाङ के बराबर नेकी (पुन्य) कर लिया करे?
सहाबा ने कहा: आकाﷺ इस की ताक़त कौन रखता है?
फरमाया: हर एक इस की ताक़त रखता है,
अर्ज़ किया: सरकार ﷺ कैसे?
फरमाया सुब्हानल्लाह (سُبْحَانَ اللّٰه) का स़वाब (पुन्य) ओह़ुद से बढ कर है 
ला इलाहा इल्लल्लाह (ُلَااِلٰه اِلَّا اللّٰه ) का स़वाब (पुन्य) ओह़ुद से बढ कर है। 
अल्लाहु अकबर (اللّٰهُ اَکْبَر) का स़वाब (पुन्य) ओह़ुद से बढ कर है। 
अल्हम्दुलिल्लाह (الْحَمْدُلِللّٰهُ ) का स़वाब (पुन्य) ओह़ुद से बढ कर है।

ohud pahad


::ओह़ुद पहाङ एक परिचय::
ओह़ुद पहाङ  मदीना शरीफ के पास है,इसी जगह जंग-ए-ओहुद भी हुइ थी, यह पहाङ जन्नत (स्वर्ग) में भी जाएगा, इस की चौङाई लगभग पौने चार मील है,

हो सके तो रोज़ाना यह तीन वाक़्य ज़रूर कह लिया करें,
(1)अल्लाहु अकबर (اللّٰهُ اَکْبَر)  10 बार, (2) सुब्हानल्लाह سُبْحَانَ اللّٰه) 10) बार (3)अल्लाहुम्मग़्फिरली اَلّٰھُمَّ الغْفِرْلِی) 10बार।
(فیضان سنت ذکر کی فضیلت ص120 اسلامک پبلشر)

नेयाज़ अहमद निज़ामी




Tuesday, February 19, 2019

हज़रत सय्यद बदीउद्दीन (ज़िन्दा शाह मदार): नेयाज़ अहमद निज़ामी


सय्यद बदीउद्दीन क़ूतुब मदार (शाह मदार)  رحمۃ اللّٰه عليه


सय्यद बदीउद्दीन क़ूतुब मदार (ज़िंदा शाह मदार) رحمۃ اللّٰه عليه सूफी बजुर्ग हैं जिन्हे भारत नेपाल में मदार बाबा के नाम से जानते हैं,
कुछ लोगों से इन के बारे में पूछने पर बताने से स्मर्थ रहे तो सोचा कि क्यूं ना इन के बारे में एक संक्षिप्त परिचय लिखा जाए जिस से जन मानस को इन के बारे में जानकारी मिले।

:: जन्म एंव खानदान ::

तज़केरतुल मुत्तकीन किबात में है कि,
پس حضرت شاہ کونین حسنی و حسینی از سادات جعفریہ اند  و در شہر حلب ملک شام بروز دو شنبہ بوقت صبح صادق یکم شوال سنہ چہارصد وچہل و دو ہجرۃالنبیﷺ خانہ حضرت قدوۃالدین سید علی حلبی را از فیض مقدم منور و پرنور فرمودند (تذکرۃالمتَّقِین ص 4


खुलासा: हज़रत सय्यद बदीउद्दीन क़ूतुब मदार (ज़िंदा शाह मदार) رحمۃ اللّٰه عليه मुल्के शाम (सीरिया/syriya) के शहर हलब में 1 शव्वाल (इस्लामी महीना का नाम) 242ھ को सुब्ह के समय पैदा हुए,आप के पीता श्री का नाम क़ाज़ी सय्यद अली हल्बी था, आप बनी फातेमा के सादात (सय्यदों) में से थे,

आप के पीता की तरफ से खानदानी सिलसिला यूं है,
सय्यद बदीउद्दीन बिन सय्यद अली हल्बी बिन सय्यद बहाउद्दीन बिन सय्यद ज़हूरुद्दीन बिन सय्यद अहमद बिन सय्यद इस्माईल बिन सय्यद मुहम्मद बिन सय्यद  इस्माईल सानी बिन सय्यद इमाम जाफर सादिक़ बिन सय्यद मुहम्मद बाक़र बिन सय्यद इमाम ज़ैनुलआबेदीन बिन सय्यद इमाम हुसैन शहीदे करबला बिन अ़ली رضي اللّٰه عنھم اجمعين

आप की माता की तरफ से खानदानी सिलसिला यूं है,
हज़रत सय्यद बदीउद्दीन क़ूतुब मदार رحمۃاللّٰه عليه की माता,फातेमा सानी बिन्त सय्यद अब्दुल्ला बिन सय्यद ज़ाहिद बिन सय्यद मुहम्मद बिन सय्यद आ़बिद बिन सय्यद सॉलेह बिन सय्यद अबू यूसुफ बिन सय्यद अबुल क़ासिम मुहम्मद बिन सय्यद अब्दुल्लाह बिन हसन मुसन्ना बिन सय्यदना इमाम हसन बिन सय्यदना इमाम अली मुर्तुज़ा बिन अबी तालिब,
(تاریخ سلاطین و صوفیاء جونپور ص 1377/1378)

MADAR BABA

:: पीरी एंव मुरीदी ::
हज़रत सय्यद बदीउद्दीन ज़िन्दा शाह मदार को ज़ाहिर में पीरी एंव मुरीदी हज़रत तैफूर शामी उर्फ बायज़ीद बुस्तामी से प्राप्त हुयी। और यह सिलसिला यूं है,

“सय्यद बदीउद्दीन क़ूतुब मदार (ज़िंदा शाह मदार) رحمۃ اللّٰه عليه, हज़रत शैख़ बा यज़ीद बुस्तामी, हज़रत ख़्वाजा हबीब अ़जमी, हज़रत ख़्वाजा हसन बसरी, हज़रत सय्येदुना अली  رضی اللّٰه عنہ، हज़रत मुहम्मद ﷺ„
हज़रत क़ूतुब मदार (ज़िंदा शाह मदार) رحمۃ اللّٰه عليه को बेगैर किसी वास्ता के होज़ूर ﷺ से फैज (फायेदा) पहुंचा है, एक बार हज़रत क़ाजी महमूद कंतूरी ने हज़रत ज़िंदा शाह मदार رحمۃ االلّٰه عليه से कहा कि अपना सिलसिला मुझे तहरीर करा दीजिए, तो आप ने कहा:
اُكْتُبْ اِسْمَكَ ثُمَّ اِسْمِي ثُمَّ اِسْمَ رَسُوْلِ اللّٰه ﷺ
तर्जुमा: अपना नाम लिख फिर मेरा फिर होज़ूर ﷺ का (اخبارالاصفیاء ص54)

ख़ूबी:
तमाम इतिहासकार आप के बारे मे लिखते हैं कि आप कुछ खाते पीते ना थे और आप का कपङा ही मैला ना होता था, और ना ही मख्यिां उन पर बैठती थीं,और चेहरे पर नूर (प्रकाश) इतना कि हमेशा चेहरा ढांप कर रखते थे,जैसा कि “मदार-ए-आज़म„ नामी किताब में है कि हज़रत शाह मदार जब “हज़रत बा यज़ीद बुस्तामी„ की सेवा मे पहुंचे तो हज़रत ने «हब्स-ए-दम» का ज्ञान दिया जिस से आप सालों साल तक खाने पीने की इच्छा ना होती थी, (مدار اعظم اردو 34-34)


:: हज़रत स0 बदीउद्दीन शाह मदार رحمۃ اللّٰه عليه का मक़ाम व मर्तबा::
आप ने तमाम दुनिया का पैदल यात्रा किया और बङे बङे फक़ीरों और संतों से मुलाक़ात की और बहुत से लोगों ने आप से रूहानी (अंतरात्मिक) फायदा प्राप्त किया, क्यूंकि आप अपने वक़्त के क़ूतुब-उल-मदार थे इसी लिए आप को आज भी “ज़िन्दा शाह मदार„ कहते हैं,

:: क़ूतुब-उल-मदार,शाह मदार,या मदारिया बाबा 
क्यूं कहते हैं?::
जब विलायत का मर्तबा (पोस्ट) प्राप्त होता है तो उस को “वली„ कहते हैं, फिर जब तरक्की होती है तो “अब्दाल„ का मर्तबा हासिल (प्राप्त) होता है, फिर “औताद„ का फिर “क़ूतुब-उल-अक़्ताब„ का फिर “क़ूतुब-उल-मदार„ का यह सब सरकार दोआलम ﷺ की उस खास इनायत और तवज्जो का नतीजा (प्रिणाम) था जो हज़रत शाह मदार के साथ थी।
क़ूतुब-उल-मदार नबी ﷺ के बरकत वाले दिल से फायेदा प्राप्त करता है और उस का फैज (साया/असर) तमाम “अलवी और सिफली„ दुनिया पर होता है, और 12क़ूतुब उन के हुक्म के ताबेअ़ (अंडर) में होते हैं, क़ूतुब-ए-मदार का नाम “अब्दुल्लाह„ होता है और सातों आसमान के उपर से लेकर सातों ज़मीन के निचे तक की दुनिय उस की नज़र में रहती है, (مدار اعظم ص53)
«आप के मदार नाम के बारे में जो मशहूर है कि मदार का दूध पीने की वजह से मदार नाम जुङा यह गलत है نیاز احمد»

हज़रत शाह सय्यद ग़ुलाम अली मुजद्दीदी नक़्श बंदी ने फरमाया है कि:
حضرت سید بدیع الدین قطب مدار قُدِّس سِرَّہ قطب مدار بودند و شان عظیم دارند و ایشاں دعائے کردہ بودند کہ الٰہی مُرا گُرسَنگی نہ شود و لباسِ من کُہنہ نہ گَردند و لباسِ ایشاں کہنہ نگشت ہمو وے یک لباس تا بہ ممات کفایت کرد.
तर्जुमा: हज़रत हज़रत स0 बदीउद्दीन ज़िन्दा शाह मदार رحمۃ اللّٰه عليه अपने समय में क़ूतुब-ए-मदार थे और बहुत उंचा मर्तबा रखते थे और उन्होने अपने लिए दोआ फरमाई थी कि “ऐ अल्लाह! मुझे भूक और प्यास ना लगे और मेरा कपङा कभी मैला और पूराना ना हो और ना फटे„  और ऐसा ही हुआ कि इस दुआ के बाद तमाम जीवन खाना नही खाया और कपङा पूराना नही हुआ और एक ही कपङा मौत के वक्त तक बदन मुबारक पर पङा रहा। (مدارالامعارف ص 253)
मज़ार ज़िंदा शाह मदार

:: भारत में आगमन ::
अपने भाई सय्यद “अब्दुल्लाह„ के तीनों बेटों 🕕हज़रत ख़्वाजा सय्यद मुहम्मद अर्ग़ोन हज़रत ख़्वाजा सय्यद अबू तोराब कन्सूरी और हज़रत ख़्वाजा सय्यद अबुल हसन को सरकार क़ूतुब-उल-मदार अपने साथ हिन्दुस्तान और फिर मकन पूर तशरीफ लाए और वेसाल (देहांत) से पहले इन्ही तीनों जिगर गोशों को कूतुब-ए-मदार ने अपने खलीफा और चेलों के भरे भीङ में अपना सहायक और खलीफा (उत्तराधिकारी) बनाया और उसी समय से इन्ही तीनों ख्वाजों के बीच खलीफा होते चले आ रहे हैं।
दूसरी बार नबी ﷺ की दरबार में हाजरी के बाद हज़रत शाह मदार को स्थाई भारत मे रहने का आदेश मिल गया, और दीन -ए- इस्लाम के पर्चार पर्सार में लग गए,
आप समुंदर से होते हुए एक जंगल में पहुंचे जहां नबी मुहतर जनाब मुहम्मद ﷺ से मुलाकात हुई आप ने बैअत की और होजूर ﷺ ने अपने हाथों से 9 लुक़्मे खिलाए और वह जन्नती कपङा पहना  जो जीवन भर के लिए काफी हो गया।और आप ने तमाम दुनिया का दौरा किया आप जहां भी पहुंचे आप की निशानियां यादगारें मौजूद हैं, जो आप के आने और धर्म पर्चार पर्सार की निशानियां ब्यान कर रही हैं, कहीं मदार चिल्ला„ मदार दरवाज़ा„ मदार टिकरी„ मदार पहाङी„ मदार गेट„ मदार ढाल„ मदार गंज„ मदार पूर और रौज़ा मदार वगैरह वगैरह हैं। (تاریخ سلاطین و صوفیاء جونپور ص 1431/1432)
MADAR BABA KI JIVANI
:करामत:
1-इसी सिलसिले में आप कंतूर फिर घाटमपूर पहुंचे यहां का राजा ला वल्द (बे औलाद) था आप की दुआ से साहब-ए-औलाद हुआ और इस्लाम लाया।

2- शहर दर शहर दावत-ए-दीन देते हुए “सूरत„ में पहुंचे यहां पर एक नाबीना (अंधा) भीक मांग रहा था हज़रत शाह मदार को रहम आ गया आप ने दुआ किया वह अंधा अंखियारा हो गया ,यहां बहुत से लोग ईमान लाए ।

3- एक दिन आप ने सेवक मुहम्मद यासीन से पानी वजू के लिए मांगा मगर पानी नही मिला फिर आप की करामत से पानी का चश्मा (सोता) नज़र आया जो अब तक ऐसन(ایسن) के नाम सो मश्हूर है। (کتب عامہ)

4- एक जोङा रोता हुआ मदार शाह की बारगाह में पहुंचा कि मेरा एक बच्चा था जो मर गया है अल्लाह से दुआ करिए कि वह जी जाए क्युंकि उस के जीवन में हमारा भी जीवन है इस में कोई संदेह नही कि अल्लाह ने आप को वह ताकत दी है जो चाहें वही हो जाए,हजरत क़ूतुब-ए-मदार उन से बहुत प्रेम का परिचय दिया और बच्चे की लाश के पास पहुंच कर फरमाया (कहा) قُمْ بِاِذنِ اللّٰه यानी अल्लाह के आदेश से उठ वह लङका ला इलाहा इल्लल्ाह  पढता हुआ उठा और कहा कि दुनिया की ज़िन्दगी में कोयी भलाई नहीं, आप आखेरत में भेज दें आप ने फरमाया कि ऐश-ए-दुनिया नेकी व परहेज़गारी के साथ बेहतर है उस मौत से जो बे गैर अमल (कर्म) है ।تاریخ سلاطین و صوفیاء جونپور ص) 1434)

HISTORY OF MADAR BABA

:: इंतेक़ाल (देहांत) ::
हज़रत शाह बदीउद्दीन कूतुब मदार ने फरमाया कि मेरे जनाज़ा की नमाज़ “मौलाना होसामुद्दीन सलामती„ पढेंगे, यह उस समय मौजूद ना थे जौनपूर थे कि यकाएक हज़रत के देहांत का हाल मालूम हुआ, और वहा से चलदिए और यहां हज़रत शाह  मदार साहब ने कमरे का दरवाज़ा बंद कर लिया मौलाना होसामुद्दीन जिस समय मकनपूर हाज़िर हुए हां देखते हैं कि मकान का दरवाज़ा बंद है, उनहोने दस्तक दी तो दरवाज़ा खुल गया देखा तो हज़रत शाह मदार साहब नहलाए और कफनाए हुए मौजूद हैं (यह काम अदृश्य लोगों नें कर दिया था) उस के बाद खादिमों (सेवकों) नें और चारों तरफ से जो लोग हज़रत के इंतेक़ाल की ख़बर सुन के आए थे जनाज़ा उठाया मौलाना होसामुद्दीन सलामती साहब ने जनाज़ा की नमाज़ पढाई उस के बाद पवित्र जिस्म को दफन कर दिया गया।  यह गम मे डूबा हुआ हादेसा 17जमादिल अव्वल 838 हिजरी को हुआ साकिन-ए-बहिश्त (ساکن بہشت) देहांत की तारीख है। (مدار اعظم ص 87-88)

dam madar beda paar


तर्जुमा व तस्हील
Neyaz Ahmad Nizami




Friday, November 2, 2018

शराब और शराबी: लेखक" नेयाज़ अहमद निज़ामी



नशा  पिला के  गिराना तो सब को आता है 
मज़ा तो तब है कि गिरतों को थाम ले साक़ी
                                  अल्लामा इक़बाल

किसी भी तरह का नशा जिस तरह घरेलू जीवन के लिए अभिशाप है, उसी तरह सामाजिक  जीवन को भी श्रापित कर देता है, इस लत से ना केवल एक इन्सान की आर्थिक, व्यवहारिक, व्यापारिक, आदि स्थिती खराब होती है बल्कि घर गृहस्थी पर भी इस का असर पङता दिखाई देता है, जब नशे की लत अपनी चर्म सीमा पर होती है तो उसे इस लत को पुर्ण करने के बदले हर क़ीमत देने को तैयार रहता है, यहां तक कि अपनी ज़मीन, जायदाद, धन, वगैरह के एलावा अपनी अर्धांगिनी,एंव बच्चों को भी लुटाने में हिचकिचाहट महसूस नही करता, जब इस में इतनी बुराईयां हैं तो आइए धार्मिक दृष्टीकोंङ से इस के सत्य असत्य होने में खोज करते हैं, ताकि हम इस बुरी लत से  जहां तक हो सके बचें। [नेयाज़ अहमद]

अल्लाह तआला कुरआन में फरमाता है:

يَآ اَيُّـهَا الَّـذِيْنَ اٰمَنُـوٓا اِنَّمَا الْخَمْرُ وَالْمَيْسِـرُ وَالْاَنْصَابُ وَالْاَزْلَامُ رِجْسٌ مِّنْ عَمَلِ الشَّيْطَانِ فَاجْتَنِبُوْهُ لَعَلَّكُمْ تُفْلِحُوْنَ (90)
اِنَّمَا يُرِيْدُ الشَّيْطَانُ اَنْ يُّوْقِــعَ بَيْنَكُمُ الْعَدَاوَةَ وَالْبَغْضَآءَ فِى الْخَمْرِ وَالْمَيْسِـرِ وَيَصُدَّكُمْ عَنْ ذِكْرِ اللّـٰهِ وَعَنِ الصَّلَاةِ ۖ فَهَلْ اَنْتُـمْ مُّنْتَـهُوْنَ (91)
وَاَطِيْعُوا اللّـٰهَ وَاَطِيْعُوا الرَّسُوْلَ وَاحْذَرُوْا ۚ فَاِنْ تَوَلَّيْتُـمْ فَاعْلَمُوٓا اَنَّمَا عَلٰى رَسُوْلِنَا الْبَلَاغُ الْمُبِيْنُ (92
(سورہ مائدہ آیت نمبر 90-92)

तर्जुमा: ऐ इमान वालो! शराब और जुआ और बुत (मूर्ती) और तीरों से फाल निकालना यह सब नापाकी (अपवित्रता) हैं, शैतान के कामों मे से हैं, इन से बचो ताकि कामयाबी पाओ, शैतान तो यही चाहता है कि शराब और जुएं की वजह से तुम्हारे अन्दर दुश्मनी और बुग़्ज डाल दे और तुम को अल्लाह की याद और नमाज़ से रोक दे तो क्या तुम हो उन से रुकने वाले,
और अताअत (पैरवी) करो अल्लाह की और रसूल की अताअत (पैरवी) करो और परहेज़ (बचो) करो और अगर तुम ने रूगर्दानी (फिरोगे) की तो जान लो कि हमारे रसूल पर सिर्फ साफ तौर पहुंचा देना है(हमारे अहकाम को),
शराब पीना हराम है और इस की वजह से बहुत से गुनाह (पाप) जन्म लेते हैं, अत: इसे पापों और बे हयाईयों की अस्ल (जङ) कहा जाए तो ठीक है,
(بہار شریعت جلد 2 حصہ 9 صفحہ 384)
शराब जो अन गिनत जिस्मानी रूहानी बिमारियों की वजह है भाई चारा और मआशी (आर्थिक) खराबियों की जङ और फितना फसाद की निशानी है इस्लाम के पवित्र कानून में इस की गुंजाइश कैसे हो सकती है  अल्लाह ने इसे सिरे से हराम कर दिया मगर हराम होने का आदेश आहिस्ता  आहिस्ता दऔर भाग भाग कर के दिया ताकि लोगों को इस की पैरवी करना आसान हो जाए, चुनांचे सुरह बकरा में सिर्फ इतना कहा गया,
قُلْ فِيهِمَا إِثْمٌ كَبِيرٌ وَمَنَافِعُ لِلنَّاسِ (سوره البقره 219)
तर्जुमा: इन दोनो (जुआ,शराब) में बङा गुनाह (पाप) है, और लोगों के दुनियवी नफा भी, 

इस के कुछ दिन बाद यह आयत उतरी,
لَا تَقْرَبُوا الصَّلَاةَ وَأَنْتُمْ سُكٰرٰى (النساء آیت 43)
तर्जुमा: नशा की हालत में नमाज़ के पास ना जाओ,
भले शराब के हराम होने का विस्तार से इस में बयान (वर्ण) नही था मगर कई संजीदा तबियत के लोगों नें उसी वक्त ही से शराब छोङ दी थी।
(حاشیہ تفسیر ضیاءالقرآن جلد اول صفحہ 507 )

हदीसों में इस के पीने पर बहुत ही सख्ती से वईदें आई हैं ,कुछ हदीसें यहां लिखी जाती हैं

❶ हदीस-: होजूर ﷺ ने फरमाया (कहा) जो चिज़ ज्यादा मात्रा में नशा लाए, वह थोङी भी हराम (अवैध) है, (جامع الترمذی 1872 )

❷ हदीस-: सही मुस्लिम में जाबिर رضی اللّٰہ عنہ से मरवी कि रसूलुल्लाह ﷺ ने फरमाया (कहा) हर नशा वाली चीज़ हराम है।(صحیح مسلم کتاب الاشربہ)

❸ हदीस-: तारिक़ बिन सोवैद رضی اللّٰہ عنہ ने शराब के बारे में सवाल किया होजूर ﷺ ने मना किया, उन्होने कहा हम तो उसे दवा के लिए बनाते हैं आप ने कहा यह दवा नहीं यह तो खुद एक बिमारी है।
(صحیح مسلم کتاب الاشربہ)


عَنْ أَنَسِ بْنِ مَالِكٍ قَالَ : ( لَعَنَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ فِي الْخَمْرِ عَشْرَةً عَاصِرَهَا وَمُعْتَصِرَهَا وَشَارِبَهَا وَحَامِلَهَا وَالْمَحْمُولَةُ إِلَيْهِ وَسَاقِيَهَا وَبَائِعَهَا وَآكِلَ ثَمَنِهَا وَالْمُشْتَرِي لَهَا وَالْمُشْتَرَاةُ لَهُ ).
❹ हदीस-: अनस बिन मालिक से मरवी कि जो शख्स (आदमी) शराब के लिए शीरा निकाले और जो निकलवाए और जो पिए और जो उठा कर लाए और जिस के पास लाई जाए और जो पिलाए और जो बेचे और जो इस के दाम खाए और जो खरीदे और जिस के लिए खरीदी जाए इन सब पर रसूल ﷺ ने लानत फरमाई।
(فتاوی رضویہ جلددھم صفحہ 47)

❺ हदीस-: रसूल ﷺ ने फरमाया कि शराब से बचो कि वह हर बुराई की कुंजी (चाबी) है।
(المستدرک الحاکم)

::हुक्म::
मुसलमान बालिग अक्लमंद बे गैर मजबूरी शराब की एक बूंद भी पिए तो उस पर हद (सज़ा) है, 
(بہار شریعت جلد 2 حصہ 9 صفحہ389)

उस की सज़ा में 80 कोङे मारे जाएंगे गुलाम को 40 और बदन के अलग अलग हिस्से में मारेंगे,
(بہار شریعت جلد 2 حصہ 9 صفحہ 392)

शराब हराम और पेशाब की तरह नापाक (अपवित्र) और उस का पीना गुनाह-ए-कबीरा (बङा पाप) है पीने वाला फासिक़ फाजिर नापाक बेबाक (निडर) मरदूद है 
सभी नशा लाने वाली चीज़ हराम है:
जितनी चिजे़ं बारीक और सेयाल होकर नशा लाती हैं चाहे वह महुवा से बनाई जाएं या गुङ (भेली) या अनाज या लकङी या किसी बला से वह सब शराब हैं,उन का हर कतरा (बूंद)हराम भी और पेशाब की तरह नजिस व  नापाक (अपवित्र) है
 (فتاوی رضویہ جلد دھم ص 85)

[।।समाप्त।।]

मुरत्तिब,तर्जुमा: व तस्हील
 Neyaz Ahmad Nizami

Monday, October 8, 2018

सूफी सय्यद फख़रूद्दीनرحمةاللّٰه عليه परसौनी बाज़ार : नेयाज़ अहमद निज़ामी,



किसी भी वस्तु का विस्तार, उस की सत्य / असत्य का परिचय होता है, बिना इस के उस का वजूद सम्भव नहीं, जब हम किसी का सम्पूर्ण रूप से परिचय पा लेते हैं तो उस की हैसियत का आंकङा लगाने मे आसानी हो जाती है,
हमारे जिला महाराजगंज यू.पी. के एक गांव, परसौनी बाज़ार में एक महान हस्ती अपनी क़ब्र में विश्राम कर रहे हैं, जिन को उन के मानने (अनुयाईय) वाले फख़रूल औलिया के नाम से जानते हैं,
जिन का उर्स इस्लामी महीना सफर-उल-मुज़फ्फर की 21 तारीख को परसौनी बाज़ार में मनाया जाता है, उन के जीवन के  संक्षिप्त हालात निम्न हैं।(نیاز احمد نظامی)

::वेलादत (जन्म दिन)::
27रजब-उल-मोरज्जब, 1262ھ को सुब्ह सादिक़ के समय ख़लीलपूर उर्फ मियां का पुरवा, अल्लाहाबाद शहर से पश्चिम गंगा के दूसरे पार आप का जन्म हुआ,
पिता श्री मखदूम सुफी सय्यद शाह अब्द-उस-शकूर सोहरवर्दी अपने कमरे में क़ुरआन पढने  में व्यस्त थे, खबर दी गई , आप तशीरफ लाए, अपने पूत्र को गोद में लिया, दाएं कान में अज़ान और बाएं कान मे तकबीर कही, फिर शहादत की उंगली (अनामिका,अंगूठा के बगल वाली उंगली) के जरिए अपना थूक साहबजादे (पूत्र) के मुंह में डाला,

::नामकरण::
और उसी समय “मुहम्मद अहमद„ नाम रखा और इसी नाम पर सातवें दिन अक़ीक़ा भी किया, और बाद में उर्फी नाम “फखरूद्दीन„ रखा और दुनिया इन्हे  “फख्र-उल-औलिया/क़ूतुब-उल-औलिया„ के नाम से जानती है।

::शिक्षा दिक्षा::
पिता श्री सय्यद शाह अब्द-उस-शकूर ने अपने पुत्र फखरूद्दीन की शिक्षा का शुभारंभ कराया, कायदा बगदादी, अम्मा पारा, नाज़रा-ए-कुरआन, और फारसी की शुरूआती किताबों के बाद  नहो(अरबी ग्रामर) सर्फ, फिक्ह, और ओसूल-ए-फिक्ह, की बुनियादी किताबें मिश्कात, जलालैन, हेदाया, शरह अकायद, फल्सफा, हिकमत, मंतिक़, आदि की शिक्षा पूरी कराई, इस के बाद फख्र-उल-औलिया दुनियावी पढाई की तरफ ध्यान दिए, मकामी स्कूल में एडमीसन  लिया मीडिल क्लास तक पढाई करते रहे, क्लास में फस्ट पोज़ीशन पर रहे, अच्छे नम्बर से इम्तेहान में पास हुए और 22 वर्ष की आयू में धार्मिक और दुनियावी पढाइ पूरी कर ली।

::बैअ़त (मूरीदी) व खेलाफत::
आप के पिता सय्यद शाह अब्द-उस-शकूर ने आप को सय्यद शाह सुल्तान हसन क़ादरी की बारगाह में मिन्डारा शरीफ जिला ईलाहाबाद भेज दिया,
सय्यद शाह सुल्तान हसन क़ादरी एक पहुंची हुई हस्ती और बा करामत पीर थे फखरुल औलिया उन के पास जाकर अलौकिक शक्तियों की प्राप्ती के लिए जप तप कर  के उसे हासिल कीं और कई साल तक उन से शिक्षा लेते रहे,जब आप जाहिरी बातीनी ज्ञान प्राप्त कर लिए  तो सय्यद शाह सुल्तान हसन क़ादरी ने कादरी  सिलसिला में बैअत (गुरमुख) ली और इस की इजाज़त भी दी,

::शादी मुबारक::
मिन्डारा शरीफ मे रहने के जमाना ही में आप काफी मशहूर हो गए थे,इसी वजह से आप की शादी का रिश्ता दूर दूर से आने लगा, मगर पीर के हुक्म के मुताबिक सन 1294ھ को पिता ने फखर-उल-औलिया के लिए सय्यद शाह “सज्जाद अली„ की लड़की से रिश्ता मंजूर कर लिया और  निकाह हो गया और सय्यद शाह सुल्तान हसन क़ादरी علیہ الرحمہ ने निकाह पढाई।

::औलादें::
आप की तीन औलादें हुईं, तीनों लड़के, लड़कियां एक भी नहीं,
(1) हजरत शैख-ए-क़ादरियत अ़ल्लामा शाह सूफी सय्यद “अब्द-उल-क़ुद्दूस„ क़ादरी علیہ الرحمہ मज़ार पाक शहडोल MP

(2) हजरत मखदूम शाह सुफी सय्यद वसीयुद्दन अहमद क़ादरी علیہ الرحمہ नैनीचक अल्लाहाबाद

(3) हजरत मखदूम शाह सुफी सय्यद वलीउद्दीन अहमद क़ादरी علیہ الرحمہ मज़ार पाक जहांगीर नगर, फतहपूर (यूपी)

हजरत  अ़ल्लामा सूफी सय्यद “अब्द-उल-क़ुद्दूस„ क़ादरी علیہ الرحمہ के लड़के हज़रत सूफी सय्यद शाह अब्द-उर-रब साहब علیہ الرحمہ हैं, जो कालरी (कोईलरी)में सरकारी सर्विस कर रहे थे फरवरी 2013 मे रिटायर हुए,  इस के अलावा खानक़ाहे क़ादरिया, फखरिया (क़ादरी आस्ताना) के सज्जादा नशीन (उत्तराधिकारी) और दारुल उलूम क़ुद्दूसिया अहल-ए-सून्नत फखरुल उलूम परसौनी बाज़ार महाराजगंज (यूपी) के सरपरस्त (संगरक्षक) भी थे, जिन का इंतेक़ाल (देहांत) 5 मुहर्रम 1439 ھ मुताबिक़ 25 सितम्बर 2017 में हुआ,

हजरत मखदूम शाह सुफी सय्यद वसीयुद्दन अहमद क़ादरी علیہ الرحہ जिन के बारे में इन के पिता ने फरमाया था कि मेरा दुसरा बेटा हकीम सूफी होगा, इन के दो पुत्र हैं (1) सय्यद शाह वजीहुद्दीन उर्फ बन्दे मियां (2) सय्यद शाह मुहम्मद फोज़ैल साहब दोनो साहबज़ादे हयात से (जीवित) हैं और धर्म प्रचार प्रसार में व्यस्त हैं,

हजरत सुफी सय्यद वलीउद्दीन अहमद क़ादरी علیہ الرحمہ जिन के बारे में उन के पिता ने फरमाया कि यह आखरी शैख  होगा,
इन की दो शादी हुई, लगभग 30 साल की उम्र में पहली पत्नी सय्यदा आलिया जो बेटी हैं सय्यद मुज्तबा खलीलपूरी की का पैगाम आने पर हा कह दिया गया और निकाह कर दिया गया इन से दो औलादें हुईं एक लड़का और एक लड़की बाल अवस्था ही में दोनो का देहांत हो गया और आप की पत्नी भी इस दुनिया को अलविदा कह के बाकी रहने वाली दुनिया में चली गईं यानी इन का भी देहांत हो गया,पहली बीवी के इन्तेकाल के छ: सात वर्ष गुजर जाने के बाद घर वालों व कुछ लोगों के बार बार कहने के बाद मिनहाज पूर कोशाम्बी में आप का दुसरा निकाह हुआ,सय्यदा कनीज़ फातेमा मखदूम सय्यद मिनहाजुद्दीन हाजियुल हरमैन बिहारी के खानदान से थीं जो बहुत ही पाक सीफत परहेजगारी, वगैरह की मालकिन थीं,
दूसरी पत्नी सय्यदा कनीज़ फातेमा से छ: लड़के और 3 लड़कियां हुईं छ:में से 5 का बालावस्था ही में इन्तेकाल (देहांत) हो गया आखरी साहबजादे मखदूम शैख शोएब अहमद जो मश्हूर हैं सय्यद गुलाम ग़ौस़ मियां कादरी के नाम से हैं, जो आप के खलीफा और उत्तराधिकारी बने,
तीन लड़कियों के नाम यह हैं
(1) सय्यदा सितारा खातून
(2) सय्यदा नजमा खातून
(3) सय्यदा अंजुम खातून


::परसौनी बाज़ार में आगमन::
घरेलू  अवश्यकताओं को पूरा करने के बाद धर्म प्रचार की तरफ ध्यान केन्द्रित किया,
सुफी सय्यद शाह अब्द-उस-शकूर सोहरवर्दी के मूरीदीन (चेले) की अच्छी खासी संख्या बिहार बलिया के कुछ एलाक़ों में थी पहले आप ने वहां की यात्रा किया फिर बंगाल, अंडमान, तक गए वापसी में मखदूम-ए-बिहार के दरबार में हाज़री दी पटना आने के बाद मालूम हुआ कि बरेली शरीफ के बड़े हज़रत यहां आए हैं आप अल्लामा ज़फरुद्दीन बिहारी के पास गए वहीं सदरुश्शरिया और आला हज़रत رضی اللہ عنھما से मुलाक़ात की फिर कुछ दिनो तक उत्तर प्रदेश में टांडा के अलाक़ों में ठहरे धर्म प्रचार किया फिर नेपाल के सरहदी क्षेत्रों की तरफ ध्यान दिया और शाअ़बान 1338ھ को जुमा की नमाज पढने के लिए गोरखपूर की मस्जिद में हाज़िर हुए नमाज़ के बाद जप तप (औराद व वजीफा) में लीन हो गए, तभी परसौनी बाज़ार के कुछ लोग जैसे अब्दुल करीम उर्फ बंधू शैख, और अली एमाम, वगैरह नमाज़ के बाद मस्जिद के एक कोने में बैठे कुछ बाते कर रहे थे, उन लोगों की नज़र फख़रूल औलिया पर पड़ी इन को देख कर बहुत प्रभावित हुए  और फख़रूल औलिया के पास आकर बैठ गए,और उन्होने कहा होजूर हमारा एलाका बहुत ही पिछड़ा और जहालत का गढ है, इस्लाम बराए नाम है ,अगर हमारे तरफ ध्यान दें तो शायद आप की चर्णो की बरकत से कुछ सूधार बो जाए,
आप ने फरमाया: तुम मुझे जानते हो?
कहने लगे: जानते तो नहीं मगर नूरानी सूरत से पता चल रहा है कि इस्लाम के सच्चे प्रचारक हैं, गुस्ताखी मोआफ करें,
आप ने फरमाया: गुस्ताखी की कोई बात नहीं मेरा काम धर्म प्रचार है  अगर मेरी वहां जरूरत है तो फिर मुझे अपने साथ ले चलो,
उन लोगों ने फखरूल औलिया को अपने साथ परसौनी लाए और इन्ही लोगों के यहां रह कर दीन का प्रचार करना शूरू किया,लोगों नें दिल खोल कर आप की मदद की और हमेशा मदद कौ तत्पर रहे।

::शक्ल व सूरत::
कद: लम्बा,
जिस्म: भरा हुआ पुर गोश्त,
चोहरा: गोल,
रंग: सफेदी लिए हुए गोराई,
आंखें: गोल और जलाल से भरी हुई,
दाढी: काफी घनी सीने तक फैली हुई,
आखरी उम्र में सर और दाढी के बाल सफेद हो गए पैदल ज्यादा यात्रा करते, चलने में तेज़, लेहजा नरम, थकान का असर जाहिर नही होता यानी पता नही चलता,

::खाना पीना::
खिचड़ी, जौ या गेहुं की चपाती, कद्दू की सब्ज़ी साग, मुर्गा बकरा का गोश्त कभी क कभी कभी,

वस्त्र: कपड़े की दो पलिया टोपी, अमामा (पगड़ी), लुंगी, कभी कभी पजामा,चांदी की एक नग वाली अंगूठी, असा(लाठी), खद्दर की शिर्वानी, और खद्दर का कलिदार कुर्ता, खद्दर की बन्डी।

::वेसाल देहांत::
तब्लीगी दौरे  से वापसी के बाद अब्दुल करीम उर्फ बंधू शैख के घर रुके अब्दुर्रहीम (जिनकी बैलगाड़ी से सफर करते थे) को बुलाया और कहा:
अब तब्लीग (धर्म प्रचार) में नही जाना है तुम आज़ाद होकर अपने घरेलू काम में लग सकते हो, फिर अपनी मुरीदा (मुरीदनी) मरयम को बुलाया अपनी अंगूठी, अमामा (पगड़ी) दिया और फरमाया मेरा बड़ा लड़का “अब्द-उल-क़ुद्दूस„ जब परसौनी आए तो उसे दे देना उस के बाद नहाया कपड़ा बदले ज़ोहर की नमाज़ पढी, फिर चारपाई पर लेट गए मुरीदों से कहा कि ना मेरा बदन छूना, और ना ही चारपाई यहां से हटाना उस के बाद लीन होकर अल्लाह की याद में डूब गए।
लगातार कई दिनों तक उसी तरह धूप में बेगैर कुछ खाए पिए लीन रहे, इस से पहले भी ऐसे ही मोराकेबा में बैठते मगर इतना लम्बा नहीं, दो दिन गुजरने के बाद लोगों कू परिशानी बढी,धूप,शबनम(ओस), बारिश से बचने के लिए कुछ लोगों ने चारपाई उठा कर कमरा में कर दिया, और फखरूल औलिया को चारपाई पर लेटा दिया यह वाकेया “21 सफर 1348ھ मोताबिक 1928ई.„ का है,
लोगों ने देखा आंखें बंद है सांस रुकी है डॉक्टर बुलाए गए उन्होंन जांच किया और कहा जुबान का हिलना और और दिल की धड़कन अल्लाह का जिक्र करने की वजह से है वरना हकीकत में आप का इंतेकाल (देहांत) हो गया है, हालांकि बात यह नही थी,
यह बात जंगल की आग की तरह फैल गई जवार के लोग उमंडते हुए सैलाब की तरह आने लगे, कुछ लोगों के जरिए, नहला धुला कर नमाज़-ए-जनाज़ा पढी गई गांव के उत्तर दिशा में दफन किया गया।
और एक अजीम हस्ती दुनिया की नजर से ओझल हो गई।

::करामत:
“किसी के वली होने के लिए करामत जरूरी नही ,
फखरूल औलिया करामत के बाब में फरमाते हैं कि तुम ने अकाबेरीन (बड़े विद्वान) की किताबों में नही पढा? एमाम ग़ेजाली के अकवाल(वाणी) नही सुना? कि आप फरमाते हैं, कि किसी को हवा में उड़ते देख कर यह ना समझो कि वह वली है जब तक कि उस के अन्दर अल्लाह का डर ना देख लो„ (سیرت فخرالاولیاء ص52)

करामत 1–: मुहम्मदपूर टांडा ज़िला फैज़ाबाद का वाक्या है एक बार फखरूल औलिया मुहम्मदपूर गांव में मौजूद थे इशा की नमाज़ के बाद आप मुरीदीन को ज्ञान की बातें बता रहे थे  उसी बीच जनाब लाल मुहम्मद साहब उर्फ कालू शैख (जिन के यहां फखरूल औलिया ठहरे हुए थे) कहा कि अमुक ने यह करिश्मा दिखाया अमुक ने यह करिश्मा दिखाया,कुतबुल औलिया को जोश आ गया क्या कमाल किया अगर मैं यह कहूं कि (इशारा करते हुए) यह पेड़ यहां से वहां चला जाए तो क्या कमाल किया कमाल तो यह है कि मुहम्मद की शरीयत पर डटा रहे ,आप का यह फरमाना था कि पेड़ उसी जगह जा लगा जिस जगह के लिए आप ने इशारा फरमाया था।

करामत 2–: हजरत कुतबुल औलिया के देहांत के एक साल बाद का वाकेया है, एक बार मास्टर अब्दुर्रशीद साहब बलियावी के पैर में बहुत बड़ा फोड़ा निकल आया था  डॉक्टरो नें जवाब दे दिया था उन के भाई अब्दुस्सुब्हान कल्कत्ता में कम्पाउंडर थे अब्दुर्रशीद अपने भाई अब्दुस्सुब्हान के साथ कलकत्ता ऑप्रेशन की नियत से गए घर से हस्पताल अपने भाई के साथ जा रहे थे अचानक सिन्दुरिया पट्टी के पश्चिम सड़क पर होजूर कुतबुल औलिया से मुलाकात हो गई आप ने फरमाया कि “कहां की तयारी है„ अब्दुर्रशीद ने बताया कि फोड़े का ऑप्रेशन कराने जा रहा हुं डॉक्टरों ने जवाब दे दिया है, आप ने कह फोड़ा दिखाओ अब्दुर्रशीद ने फोड़े को दिखाया आप ने हाथ फेरा और कहा “कहां फोड़ा है„ फोड़ा फौरन (तुरंत) गायब हो गया।
(از منہ شیخ المشائخص 70)

 (और विस्तार से जानने के लिए किताब “सीरत-ए-फखरूल औलिया„ को पढें)

(ماخذ و مراجع:)
(سیرت فخرالاولیاء، اجالوں کا سفیر، از منہ شیخ المشائخ )

نوٹ: کہیں کہیں اصل کتاب کے جملوں کو چھوڑ کر صرف مفہوم جملہ لیا گیا ہیے تاکہ قاری کو سمجھنے میں آسانی ہںو٬ نیاز احمد نظامی)

तालीफ: नेयाज अहमद निज़ामी