neyaz ahmad nizami

Tuesday, January 9, 2018

ग्यारहवीं शरीफ की हक़ीक़त: नेयाज़ अहमद निज़ामी




हर साल रबीउल अव्वल (इस्लामी महीना) की ग्यारहवीं तारीख को पूरी दुनिया में हज़रत शैख़ अब्दुल क़ादिर जिलानी رحمۃ اللہ علیہ के इन्तेक़ाल के दिन पर धार्मिक काम करने के पक्क्ष में बङे धूम धाम से मनाया जाता है, इस तारीख को सय्यदोना शैख़ अब्दुल क़ादिर जिलानी رحمۃ اللہ علیہ की रूह को सवाब पहुंचाने की नियत से गरीबों मस्कीनों खाना खिलाने,कपङा बांटने, और अपनी पुंजी को हिसाब से  लोगों पर खर्च करने का एहतमाम करते हैं,
दुआ, सदका, खैरात के सवाब का फायेदा मुर्दो को और पहुंचाने वालों को मिलता है,
हदीस: हज़रत अनस رضی اللہ عنہ  से रिवायत है कि
 उन्होने सरकारे दोआलम ﷺ से पूछा या रसूलल्लाह हम अपने मुर्दों की तरफ से सदक़ा और हज करते हैं और उन के लिए दुआ करते हैं,तो क्या यह उन को पहुंचता है?
 सरकार ﷺ ने फरमाया हां बेला शुब्हा वह पहुंचता है और इस से वह ख़ुश होते हैं।

हज़रत शैख अब्दुल हक मुहद्दिसे देहलवी हर साल ग्यारहवीं बङे अदब और एहतराम से मनाते थे,

रहा यह सवाल कि उसी ख़ास दिन को निर्धारित करना कैसा?
इस बारे में शैख अब्दुल हक मुहद्दिसे देहलवी फरमाते हैं किसी दिन के निर्धारित करने से कोई फर्क़ नही पङता ,किसी भी उर्स में एक तरह की दावत और ज़ेयाफत (मेहमान नवाज़ी) होती है,और यह ज़ेयाफत (मेहमान नवाज़ी) सुन्नत है अत: (लेहाजा़) एक दिन ख़ास कर के दावत का इन्तेज़ाम करना उस आम सुन्नत से बाहर नही कहलाएगा,,
और किसी  अच्छे कार्य के लिए दिनो को निर्धारित करना तो रसूल ﷺ से साबित है जैसा कि
हदीस: मुहम्मद बिन नोअमान  رضی اللہ عنہ  से मरवी है वह नबी ﷺ  मरफूअन बेयान करते हैं कि: जो अपने मां बाप या इन दोनो में से किसी एक की क़ब्र की हर जुमा को ज़्यारत करे उस को बख़्श दिया जाता है और उसे नेंक और फरमांबरदार लिख दिया जाता है,
दिनो के निर्धारित करने हेतू हबहुत सारे सोबूच मौजुद हैं जैसा कि हजरत ईसा علیہ السلام के बारे मे सुरह मर्यम आयत 33 में है
وَالسَّلَامُ عَلَىَّ يَوْمَ وُلِـدْتُّ وَيَوْمَ اَمُوْتُ وَيَوْمَ اُبْعَثُ حَيًّا

तर्जुमा: और सलामती मुझ पर जिस दिन मैं पैदा हुआ और जिस दिन मैं मरूं और जिस दिन मैं ज़िन्दा उठाया जाऊं,,
इन वाक़ेयात से पता चला कि पैदाईश का दिन और मौत का दिन दोनो मुहतरम (इज़्ज़त वाला) दिन हैं इसी लिए ओलमा (आलीम) ने वेसाल (मृत्यू) के दिन खाने की दावत, तिलावते कुरआन, अल्लाह ती तस्बीह, और उस जिन माली बदनी इबादत का सवाब बज़ुर्गाने दीन में से कीसी बुजूर्ग की रूह को इसाले सवाब करने को ख़ास फरमाया है,

जब ग्यारहवीं शरीफ का खास दिन मनाना जायज़ हुआ तो उस दिन मेहमानें की मेहमान नवाज़ी के लिए मूर्ग़ा बकरा वगैरह जिबह (हलाल) करना भी जायज हुआ,यह ध्यान रहे कि इस मौक़ा से जो जानवर  जिबह (हलाल) किया जाता है उस के जिबह (हलाल) के समय अल्लाह तअाला ही का नाम लिया जाता है और "बिस्मिल्लाहे अल्लाहु अकबर,, (بسم الله الله اكبر) कह कर ही जिबह (हलाल) किया जाता है,उस जानवर को गौसे आज़म का नाम लेकर नही जिबह किया जाता है,
हज़रत मौलाना शाह अब्दुर्रहमान अपनी मलफुज़ात मे फरमाते हैं कि,
"ग्यारहवीं की हकिकत यह है कि हज़रत शैख़ अब्दुल क़ादिर जिलानी رحمۃ اللہ علیہ  हर महीना रबिउल अव्वल की 11 तारीख रसूले अकरम ﷺ का फातेहा चहल्लुम मनाते थे आप के मानने वाले(अनूयाई) भी इन्ही तारीखों में यही फातेहा ग्यारहवीं के नाम से मनाने लगे,धीरे धीरे यह ग्यारहवीं खुद सय्यदोना अब्दुल क़ादिर जिलानी رحمۃ اللہ علیہ  की तरफ मन्सूब हो गई,आज कल जो ग्यारहवीं मनाई जाती है उस में सय्यदोना शैख़ अब्दुल क़ादिर जिलानी رحمۃ اللہ علیہ  का फातेहा होता है और उन के नाम से नेयाज़ दिलाई जाती है,
 (मफहूमे तजकेर-ए-मशाईखे एजाम पेज 175-176-177-178)


मुरत्तिब,तर्जुमा: व तस्हील
 Neyaz Ahmad Nizami


Sunday, January 7, 2018

जीवनी ग़ौस़-ए-आज़म-: नेयाज़ अहमद निज़ामी






:: आप का जन्म मुबारक ::
सय्यदोना गौस-ए-आ़ज़म का जन्म मुबारक 1 रमज़ान शरीफ जुमा (शुक्रवार) के दिन 470ھ मुताबिक़ 1077ء गिलान में हुआ आप के पुर्वज का वतन जियाल या जील या जिलान था इसी निस्बत से आप को जिलानी या गिलानी कहते हैं। (مفھوم مرآۃالاسرار ص562 و تزکرہ مشائخ عظام ص 188)

:: नाम नसब ::
आप का नाम नामी अब्दुल क़ादिर और कुन्नियत अबू मुहम्मद लक़ब मोहियुद्दीन महबूबे सुब्हानी है, और दुनिया इन्हे गौस-ए-आज़म,ग़ौस पाक, बङे पीर, पीरान-ए-पीर ,पीर दस्तगीर, सुल्तानुल अवलिया,दानाए असरारे ग़ैब, गौस़ुस्सकलैन, शेर बेशए मारफत,वगैरह के नाम से भी जानती है।

वालिद माजिद (पिता श्री) की तरफ से खानदानी सिलसिला यूं है::
हज़रत शैख़ अब्दुल क़ादिर जिलानी बिन सय्यद अबू सालेह मूसा जंगी दोस्त बिन सय्यद अबू अब्दुल्लाह बिन सय्यद यहया ज़ाहिद बिन सय्यद मुहम्मद रूमी बिन सय्यद दाऊद बिन सय्यद मुसा जौन बिन सय्यद अब्दुल्लाह स़ानी बिन सय्यद अब्दुल्लाह महज़ बिन सय्यद हसन मुस़न्ना बिन सय्यदोना इमामे हसन बिन अमीरुल मुमेनीन सय्यदोना अ़ली इब्न अबी तालिब رضی اللہ عنھم اجمعین ،

वालिदा माजिदा (माता श्री ) की तरफ से खानदानी सिलसिला यूं है::
हज़रत उम्मुल ख़ैर फातेमा बिन्त सय्यद अब्दुल्लाह सोमई ज़ाहिद बिन सय्यद अबू जमाल बिन सय्यद मुहम्मद बिन सय्यद अबुलअ़ता अब्दुल्लाह बिन सय्यद कमालुद्दीन ईसा बिन सय्यद अबू अ़लाउद्दीन अल जव्वाद बिन इमाम अली रज़ा बिन इमाम मुसा काज़िम बिन इमाम जाअ़फर सादिक़ बिन इमाम मुहम्मद बाक़र बिन इमाम ज़ैनूलआबेदीन बिन इमाम हुसैन बिन अमीरुल मुमेनीन सय्यदोना अ़ली इब्न अबी तालिब رضی اللہ عنھم اجمعین (تزکرہ مشائخ عظام ص188)

पिता की तरफ से हसनी और माता की तरफ से हुसैनी सय्यद होने के नाते आप رحمۃ اللہ عیہ को नजीबुत्तरफैन सय्यद भी कहा जाता है।

:: आप का बचपन ::
शैख़ अब्दुल क़ादिर जिलानी رحمۃ اللہ علیہ की माता श्री कहती हैं कि जब मेरा लङका पैदा हुआ तो रमज़ान शरीफ में दिन भर दूध नहीं पीता था जन्म के दूसरे साल आसमान में बादल होने की वजह से लोगों को रमज़ान का चांद दिखाई ना दिया इस लिए लोगों नें मेरे पास आकर सय्यदोना अब्दुल क़ादिर जिलानी के बारे में पूछा कि इन्होंने दुध पिया है कि नही? तो मैने उन को बताया कि मेरे बेटे ने आज दूध नही पिया है, इस के बाद छानबीन करने पर पता चला कि उस दिन रमज़ान की पहली तारीख थी यानी उस दिन रोज़ा था,(سیرت غوث اعظم- عالم فقری ص26)
शैख़ अब्दुल क़ादिर जिलानी رحمۃ اللہ علیہ फरमाते हैं कि मेैं उस समय अपने घर में बच्चा था जब मैं बच्चों के साथ खेलने का इरादा करता तो मैं कहने वाले को सुनता कि वह मुझसे कहता है ऐ बरकत वाले किधर जाते हो तब मैं डर कर भागता और अपनी मां की गोद में पङ जाता।
शैख़ अब्दुल क़ादिर जिलानी رحمۃ اللہ علیہ जब घर से मदरसा को जाते तो अध्यापक लङकों से कहते थे कि वली अल्लाह के लिए जगह चौङी करो ताकि वह बैठ जाए। (بہجۃالاسرار ص 50)

:: आप का होलिया मुबारक ::
शैख़ अब्दुल क़ादिर जिलानी رحمۃ اللہ علیہ ज़ईफ-उल-बदन, दरमियाना क़द, चौङा सीना, चौङी दाङी, लम्बी गरदन, गन्दुमी रंग, मिले हुए भंव, काली आंखें, बुलंद आवाज़,के मालिक थे।(غوث پاک کے حالات ص 24)

:: तालीम व तरबियत (शिक्षा व पोषण) ::
ग़ौस पाक رحمۃ اللہ علیہ ने अभी होश भी ना सम्भाला था कि वालीद माजिद (पिता श्री) का साया सर से उठ गया और अाप के नाना हज़रत सय्यद अब्दुल्लाह सोमई ज़ाहिद رحمۃ اللہ علیہ ने ग़ौस पाक के पालन पोशण की ज़िम्मेदारी अपने सर लेली और इस तरह अपनी मां की छत्र छाया तले आप परवान चढते रहे जब मकतब जाने की उम्र हुई तो तालीम का आग़ाज़ हुआ रहमते ख़ुदावन्दी शामिल-ए-हाल रही,(تزکرہ مشائخ عظام ص189)
बग़दाद का सफर ::
आप 18 साल की उम्र यानी 488ھ में अपनी मां की ख़िदमत में जाकर अर्ज़ किया कि मुझे राहे हक़ तआला पर चलने की इजाज़त दें ताकि बद़गाद जाकर इल्म (शिक्षा) प्राप्त करूं आप रोईं और 40 दिनार गौस पाक के कपङे के बगल में सी कर इजाजत दे दिया और उन्होने दुआ के साथ साथ नसीहत भी कीं कि झूट ना बोलना , मैं एक क़ाफिले के साथ बगदाद को रवाना हो गया हमदान से क़ाफिला गुज़र चुका तो 60डाकुओं ने क़ाफिले के उपर हमला कर दिया और सामान को लूटने लगे मगर मेरी तरफ किसी ने भी ध्यान ना दिया अचानक एक डाकू मेरे पास आकर पूछा ऐ फक़ीर तेरे पास क्या है मैने कहा 40 दिनार मेरे कपङों में सिले हुए हैं, लेकिन उसे यक़ीन ना आया और वह चला गया एक और डाकू ने वही सवाल किया मैने वही जवाब दिया वह भी चला गया दोनो ने अपने सरदार के पास जाकर वही माजरा बयान किया सरदार ने भी वही सवाल किया और मैने वही जवाब दिया, मेरा कपङा फाङकर देखा तो 40 दिनार पाकर डाकू के सरदार ने कहा कि तुमने अपने माल को जाहिर क्यु किया? मैने कहा कि मेरी मां ने झूट बोलने से मना किया था,यह सूनकर चोरों के सरदार ने रोना शुरू कर दिया और मेरे हाथ पर अपने साथियों के साथ तौबा कर ली और छीना हुआ सामान वापस दे दिया(مرآۃالاسرار ص563/564)
डाकुओं के सरदार का नाम अहमद बदवी था। (تذکرہ مشائخ عظام ص190)
रेयाज़त और मुजाहिदात::
जब आप बगदाद में 488ھ में शिक्षा के लिए आए तो उसी समय से तसव्वुफ की जानिब ध्यान और तप जारी था सुन सान जगहों में जाकर ज़िक्र व अज़कार में लगे रहते सबक (कलास) के बाद जंगल की तरफ निकल जाते दिन हो या रात आंधी हो या बारिश हर चीज़ से ला परवाह हो कर जंगलों में फिरते रहते सर पे छोटा सा अमामा (पगङी) होता, नंगे पैर कांटो और पथरीली ज़मीन पर चलते रहते दरिया-ए-दजला के किनारे साग या दुसरी तरकारियां खा लेते गरज़ेकि गौस-ए-आज़म के उपर जो भी मुसीबत पङती उसे बरदाश्त कर लेते।
खुद फरमाते हैं कि इल्मे शरीयत (धर्म ज्ञान) पुर्ण करने के बाद पूरे तौर पर सोलूक तसव्वफ की तरफ मुंह मोङ लिया और बगदाद के सब से बङे शैख तरीक़त हज़रत अबुल ख़ैर हम्माद बिन मुस्लिम दब्बास رحمۃاللہ علیہ से तरीक़त व माअरेफत का ज्ञान प्राप्त किया और जब ज़ौक़ बढता गया तो विरानो जंगलों का रुख अपना कर अपने आप को तरह तरह की रियाज़तों और मुशक्कतों में डाला,
आप रहमतुल्लाह अलैह फरमाते हैं कि नफ्स अपने इच्छा अनुसार मुझपे कभी हावी नही हुआ और ना ही दुनिया की सुन्दरता ने मुझे आकरसित किया

:: बैअ़त और ख़ेलाफता ::
नफ्स की सफाई के बाद किसी पीर कामिल की आरज़ू पैदा हुई और शैख अबू सईद मुबारक मख़ज़ूमी رحمۃاللہ علیہ से बैअ़त और खेलाफत लेने के बाद तरीकत व सोलूक के रोसूम सीखीं, इस के अलावा शैख़ मुहम्मद बिन मुस्लिम-उल-अयास से भी तसव्वफ व माअरेफत हासिल की, (تذکرہ مشائخ عظام ص192)

:: मुतफर्रिक़ात ::
आप ने कोई नया मदरसा नहीं खोला बल्कि अपने उस्ताद शैख अबू सईद मुबारक मख़ज़ूमी رحمۃاللہ علیہ के मदरसे ही में लोगों को इल्म के नूर से मनव्वर करते रहे,
हज़रत गौस़-ए-आज़म इर्शाद फरमाते हैं कि शुरू ज़माना में मैंने नबी अलैहिस्सलाम और हज़रत अली रज़ियल्लाहु अन्हु को ख़्वाब (सपने) में देखा कि मुझे वाज़ (पर्वचन) कहने का हुक्म फरमा रहे हैं और मेरे मुंह में अपना लुआबे दहन (मुंह का थूक) डाला , बस उस का असर यह हुआ कि मेरे लिए वाज़ (पर्वचन) कहने की बङी उप्लब्धी मिल गई,
आप की मजलिस (बैठकी) में कुल अवलिया व अम्बिया, हयात व अजसाद और अमवात अरवाह के साथ जिन और फरिश्ते हाज़िर होते थे खिज्र अलैहिस्सलाम तो कभी कभी मजलिस (बैठकी) में शरीक होते थे और वक़्त के मशाएख को मजलिस (बैठकी) में आने की दावत देते थे और कहते कि जिसे कामियाबी चाहिए वह शैख गौसे आज़म की मजलिस की नोकरी को जरूरी जान ले।

:: इन्तेक़ाल  (मृत्यू) ::
आप का वेसाल (मृत्यू) 27 शअबान सोमवार को 513 हिजरी में बद़दाद शरीफ में हुआ, मगर कुछ लोगों नें 4 शअबान, 10 मुहर्रम, 7 शअबान,508हिजरी भी लिखा है,
आप का मज़ार मुबारक बगदाद शरीफ मेंआप के मदरसे के बाबुल अजज़ में है।(سیرت غوث اعظم ص67)

::बीवियां और औलादें ::
गौसे आज़म रजियाल्लाहु अन्हु ने 51 साल की उम्र में शादी की,वह भी अल्लाह की रेज़ा के लिए आप ने फरमाया कि बहुत ज़माना से नबी अलैहिस्सलाम की सुन्नत के लिए निकाह की ख्वाहिश रखता था मगर यह सोच कर हिम्मत नही जुटा पाता कि कहीं शादी मेरी इबादत में रुकावट की वजह ना बन जाए मगर अल्लाह ने हर काम होने का एक समय मुक़र्रर कर रखा है लिहाज़ा जब वह समय आया तो अल्लाह के करम से मेरी शादी हो गई और अल्लाह ने 4बीवियां दीं और उन में से हर एक मुझ से मुहब्बत रखती थी (سیرت غوث اعظم247)
औलाद-:
हजरत शैख अब्दुल क़ादिर जिलानीرحمۃ اللہ علیہ की बहुत औलाद थे चुंकि आप की 4 बीवियां थीं इस लिए उन्ही से बहुत से बेटे और बेटियां पैदा हुईं, कहा जाता है कि आप के कुल 49 औलादें हुईं इतनी औलादें होने के बावजूद उन का पालन पोषण बहुत अच्छे तरीक़े से किए,
गौसे आज़म رضی اللہ تعالی عنہ फरमाते हैं कि जब मेरे घर कोई बच्चा पैदा होता है तो मैं उसे अपने हाथों में लेता हूं और यह कह कर कि वह मुर्दा है, फिर अगर वह मर भी जाता है तो मुझे उस की मौत से कोई रंज गम नही होता,
आप की औलादों में से कई इल्म के समुन्दर निकले। (سیرت غوث اعظم248)
आप के जिन बेटों का नाम सिरत व सवानेह की किताबों मे मिलता है उन के नाम यह हैं,
1-हज़रत सयदोना सैफुद्दीन अब्दुल वहाब जिलानी
2- हज़रत शैख़ शरफुद्दीन ईसा जिलानी
3- हज़रत शैख़ सेराजुद्दीन अब्दुल जब्बार
4- हज़रत शैख़ शमसुद्दीन अब्दुल अज़ीज़
5- हज़रत शैख़ अबू इस्हाक़ इब्राहीम
6- हज़रत शैख़ अबूल फज़्ल सय्यद मुहम्मद
7- हज़रत शैख़ अबू अब्दुर्रहमान सय्यद अब्दुल्लाह
8- हज़रत शैख़ ज़्याउद्दीन अबू नसर मुसा
9- हज़रत अबू ज़कर यहया
10- हज़रत शैख़ अबू अब्दुल्लाह अली
11- हज़रत शैख़ अबू बकर ताजुद्दीन अब्दुर्रज़ाक
मनाक़िबे गौसिया किताब में निम्न नाम और हैं
12- हज़रत शैख़ सय्यद यूसुफ
13- हज़रत शैख़ सय्यद अबू सॉलेह
14- हज़रत शैख़ सय्यद अब्दुल गफ्फार
15- हज़रत शैख़ सय्यद हबीबुल्लाह
16- हज़रत शैख़ सय्यद ज़ाहिद
17- हज़रत शैख़ सय्यद मंसूर
18- हज़रत शैख़ सय्यद अब्दुल ख़ालिक़
19- हज़रत शैख़ सय्यद अब्दुर्रउफ
20- हज़रत शैख़ सय्यद मज़दुद्दीन
तफरीहुल ख़ातिर नामी किताब में दो नाम और है,
21- हज़रत शैख़ सय्यद अब्दुल ग़नी
22- हज़रत शैख़ सय्यद अब्दुल गफूर  رحمھم اللہ تعالی علیھم اجمعین  (تذکرہ مشائخ عظام ص 170)

:: आप की करामात ::
गौसे पाक رحمۃ اللہ علیہ के पास उमर बिन सॉलेह अपनी उंटनी लेकर आया और उस ने कहा कि मेरा हज का इरादा है और मेरी इकलौती उंटनी चल नही सकती पस आप رحمۃ اللہ علیہ ने उस को एक उंगली लगाई और और उस की पेशानी (माथा) पर अपना हाथ रखा वह कहता था कि उस की हालत यह थी कि तमाम सवारियों से आगे चलती थी ।
गौसे पाक رحمۃ اللہ علیہ के पास अबुल मोआली आए और कहने लगे कि मेरे बेटे मुहम्मद को 15 महीने से बोखार आ रहा है, गौसे पाक رحمۃ اللہ علیہ ने फरमाया कि जाओ और उस के कान में कह दो ऐ उम्मे मुल्दुम तुम से अब्दुल क़ादिर फरमाते हैं कि मेरो बेटे से निकल कर हुल्ला की तरफ चले जाओ, यह कहने के बाद फिर कभी बुख़ार उन्हे हुआ ही नहीं। (غوث پاک کے حالات ص 50-51)
و آخر دعوان الحمد لللہ رب العالمین
जमा,तरतीब, तसहील,
 नेयाज़ अहमद निज़ामी 

Monday, June 26, 2017

::शव्वाल के छ:(6) रोज़े:: अज़: नेयाज़ अहमद निज़ामी



हदीस::
عَنْ أَبِي أَيُّوبَ الْأَنْصَارِيِّ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ قَالَ: "مَنْ صَامَ رَمَضَانَ ثُمَّ أَتْبَعَهُ سِتًّا مِنْ شَوَّالٍ كَانَ كَصِيَامِ الدَّهْرِ"

तर्जुमा: हज़रत अबू अय्यूब رضی اللہ عنہसे रेवायत है कि रसूलुल्लाह ﷺ ने फरमाया: "जिसने रमज़ान के रोज़े रखे फिर उस के बाद छ: रोज़े शव्वाल के रख लिए तो उस ने गोया हमेशा रोज़े रखे (मुस्लिम) ।
(ریاض الصالحین جلد دوم ص 120)

हदीस:: रसूलुल्लाह ﷺ ने फरमाया: जिस ने ईद उस फित्र के बाद छ:रोजे़ रख लिए  तो उसने पूरे साल का रोज़ा रखा , वह इस तरह कि "जो एक नेकी लाएगा उसे दस मिलेंगी तो रमज़ान के महीने का रोज़ा 10महीने के बराबर है और इन छ: दिनों के बदले में दो महीने„ तो पूरे साल  के के रोज़े हो गए।

हदीस:: अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ियल्लाहु अन्हुमा रावी कि रसूलुल्लाह ﷺ फरमाते हैं: जिस ने रमज़ान के रोज़े रखे फिर उस के बाद छ:दिन शव्वाल में रखे तो गुनाहों से ऐसे निकल गया, जैसे आज मां के पेट से पैदा हुआ है।
(بہار شریعت ج اول ص 1010)

नोट: बेहतर यह है कि यह रोज़े अलग अलग रखे जाएं ,और अगर ईद के बाद लगातार छ: दिन में एक साथ रख लिए तब भी कोई बात नही (حاشیہ بہار شریعت ج اول ص 1010)


तालीफ        
 Neyaz Ahmad Nizami



Tuesday, June 13, 2017

एअ़तेकाफ का बयान: नेयाज़ अहमद निज़ामी




::एअ़तेकाफ का कुरआन से सोबूत::
अल्लाह तआला फरमाता है:
وَلا تُباشِروهُنَّ وَأَنتُم عاكِفونَ فِي المَساجِدِ (پ2، س البقرۃ:187)

तर्जुमा: औरतों को हाथ ना लगाओ जब तुम मस्जिदों में एअतेकाफ से हो। (कन्ज़ुल ईमान)

::एअ़तेकाफ का हदीस से सोबूत::
हदीस: हज़रते आईशा सिद्दीक़ा رضی اللہ عنھاसे मरवी है कि नबी करीम ﷺ रमज़ान के आखरी अशरा (अन्तिम 10दिन) का एअतेकाफ फरमाया करते थे।
 (صراط الجنان و بہار شریعت بحوالہ بخاری و مسلم)

हदीस: हज़रत अनस रज़ियल्लाहु अन्हु फरमाते हैं कि मुहम्मदे अरबी ﷺ रमज़ान के आख़री अशरा (अन्तिम 10दिन) में एअतेकाफ करते थे, एक साल एअतेकाफ ना कर सके, जब अगला साल आया तो होजूर अनवर ﷺ ने 20 दिन एअतेकाफ किया।
 (ترمذی، کتاب الصوم، حدیث 803)


::एअतेकाफ की फज़ीलत::

दो हज और दो उमरों का सवाब:
हदीस: हज़रत अली رضی اللہ عنہ से रिवायत है कि सय्यदुल मुर्सलीन ﷺ ने इर्शाद फरमाया "जिस ने रमज़ान में 10 दिन का एअतेकाफ कर लिया तो ऐसा है जैसे दो हज और दो उमरे किए„।
(صراط الجنان جلد اول ص 301)
नोट: यही हदीस हज़रत इमाम हुसैन رضی اللہ عنہ से भी मरवी है (बहारे शरीयत जिल्द1 हिस्सा5 पेज 1020)
【दो हज और दो उमरों का सवाब】


ना कर सकने वाले नेकियों का सवाब:
हदीस: हज़रत अ़ब्दुल्लाह इब्न अ़ब्बास रज़ियल्लाहु अन्हु फरमाते हैं कि नबी करीम रउफो रहीम ﷺ ने एअतेकाफ करने वाले के बारे में फरमाया कि "वह गुनाहों से बाज़ (बचा) रहता है और नेकियों से उसे इस क़दर स़वाब मिलता है जैसे उसने तमाम नेकियां कीं।
यानी जो नेकियां वह एअतेकाफ की वजह से नहीं कर पाता है जैसे मरीज़ को देखने जाना, जनाज़े में शरीक़ होना, आदि उस का भी सवाब उसे मिलता है: नेयाज़ अहमद निज़ामी
(صراطالجنان ج اول ص 301 بحولہ ابن ماجہ)

जहन्नम से 3ख़न्दक़ें दूर:
हदीस: हज़रत अ़ब्दुल्लाह इब्न अ़ब्बास रज़ियल्लाहु अन्हु फरमाते हैं कि  प्यारे आक़ा ﷺ ने फरमाया: जिस ने अल्लाह ﷻ की रज़ा हासिल करने के लिए एक दिन का एअतेकाफ किया तो आल्लाह ﷻ उस के और जहन्नम के बीच तीन खन्दक़ें ला देगा और हर खन्दक़ पूरब और पश्चिम के इतनी दूरी होगी।
(صراطالجنان ج اول ص 301 بحولہ ابن ماجہ)

हर दिन हज का सवाब::
सईद बिन अब्दुल अ़ज़ीज़ फरमाते हैं कि मुझ तक हज़रत हसन बसरी رضی اللہ عنہ से  यह रिवायत पहुंची है कि मुअतकिफ (एअतेकाफ करने वाला) के लिए हर दिन में हज का सवाब है,
 (احکام تراویح و اعتکاف118)
हर दिन हज का सवाब::

::एअतेकाफ का शाब्दिक व धार्मिक मतलब(अर्थ)::

एअतेकाफ अरबी शब्द है जिस का अर्थ है ख़ुद को रोक लेना, बन्द कर देना, किसी की तरफ इतना ध्यान देना की चेहरा उस तरफ से ना हटे, (لسان العرب)
जबकि शरियत में "मस्जिद  में  अल्लाह ﷻ के लिए नियत के साथ ठहरना" एअतेकाफ कहलाता है,
(بہار شریعت پنجم ص 1020)

::एअतेकाफ के मसाईल::

मसअला: एअतेकाफ के लिए मुसलमान, आक़िल (अक़लवाला) और नापाकी,हैज़ (माहवारी) नेफास से पाक होना शर्त है,
बालिग़ होना शर्त नहीं बल्कि नाबालिग जिसे तमीज़ हो वह भी एअतेकाफ की नियत से मस्जिद में रुके तो सही है, (आलम गीरी)

मसअला: जामा मस्जिद होना एअ़तेकाफ के लिए ज़रूरी नही बल्कि  मस्जिदे जमाअत में भी हो सकता है,
मस्जिदे जमाअत वह है: जिस में इमाम और अज़ान देने वाले मुकर्रर हों,भले ही पांचो समय जमाअत ना होती हो, और आसानी इस में है कि हर मस्जिद में एअतेकाफ सही है अगरचे वह मस्जिदे जमाअत न हो,

मसअला:  सब से अफज़ल (अच्छा) मस्जिदे हरम में एअतकाफ है, फिर मस्जिदे नबवी में फिर मस्जिदे ला:अक्सा में फिर उस में जहां बङी जमाअत होती हो।

एअतेकाफ की तीन क़िस्में हैं:
(1) वाजिब , कि एअतेकाफ की मन्नत मानी यानी  ज़ुबान से कहा,महज़ दिल के एरादा से नही होगा।

(2) सुन्नते मुअक्केदा, कि रमज़ान के पूरे आखरी 10दिन में एअतेकाफ किया जाए यानी बीसवीं रमज़ान को सूरज डूबते समय एअतेकाफ की नियत से मस्जिद में हो और तीसवीं रमज़ान को सूरज के डूबने के बाद या उन्तीसवीं को चांद होने के बाद निकले, अगर बीसवीं तारीख को मगरीब की नमाज के बाद एअतेकाफ की नियत की तो सुन्नते मुअक्केदा अदा ना हूई, और यह एअतेकाफ "सुन्नते केफाया„ है कि अगर अगर सब छोङ देंगे तो सबसे पूछ होगी और अगर शहर में एक ने भी कर लिया तो सबकी ज़िम्मादारी ख़त्म हो जाएगी।

(3) इन दो के अलावा जो एअतेकाफ किया जाए मुस्तहब और सुन्नते ग़ैर मुअक्केदा है।।

मसअला: एअतेकाफे मुस्तहब और सुन्नत के लिए रोज़ा शर्त नही है और ना ही कोई खास समय रखा गया है ,बल्कि जब भी मस्जिद में एअतेकाफ की नियत की, जब तक मस्जिद में है मुअतकिफ है,मस्जिद से बाहर निकल आया एअतेकाफ ख़त्म हो गया (आलमगीरी)।

मसअला: रमज़ान शरीफ के आखरी 10दिनें में जो एअतेकाफ रखा जाता है उस में रोज़ा शर्त यानी ज़रूरी है,

मसअला: यह ज़रूरी नहीं कि खास एअतेकाफ ही के लिए रोज़ा हो बल्कि रमज़ान के रोज़े भी मुअतकिफ के लिए काफी हैं।

मसअला: मुअतकिफ का बेगैर किसी वजह के मस्जिद से निकलने पर एअतेकाफ जाता रहता है,

मसअला: मुअतकिफ ना चुप रहे , ना बात करे तो क्या करे,कुरआन मजीद की तिलावत करे हदीस फढे,दोरूद पढे, इल्में दीन का सीखना सिखाना, इस्लामी किताबों को पढे,या किताबत (कम्पोज़िंग) करे।

मसअला: मुअतकिफ (एअतेकाफ करने वाला) को मस्जिद से निकलने की दो वजहें हैं
(1) हाजते तबई' कि मस्जिद में पूरी ना हो सके जैसे, पाखाना, पेशाब, इस्तिंजा, वज़ू और ग़ुस्ल की ज़रूरत हो तो  गुस्ल (स्नान), मगर गुस्ल और वज़ू में शर्त यह है कि मस्जिद में ना हो सकें, और अगर मस्जिद में वज़ू और ग़ुस्ल के लिए जगह बनी है तो अब बाहर जाने की इजाज़त नही,

(2) हाजते शरई ईद या जुमा के लिए जाना,

मसअला: क़ज़ाए हाजत (शौच) के लिए गया तो तहारत (स्वछ) कर के तुरंत चला आए रुकने की इजाज़त नही,

मसअला: मुअतकिफ का मकान मस्जिद से दूर है और दोस्त का मकान क़रीब तो यह ज़रूरी नही कि दोस्त के मकान पे  क़ज़ाए हाजत (शौच) को जाए,बल्कि अपने मकान पर भी जा सकता है,

मसअला: अगर वह मस्जिद गिर गई  या किसी ने मजबूर करके वहां से निकाल दिया  और फौरन दूसरी मस्जिद में चला गया तो एअतेकाफ फासिद (टूटा) नहीं हुआ,

मसअला: डूबने या जलने वाले के बचाने के लिए मस्जिद से बाहर निकला या गवाही देने के लिए या जेहाद में सब लोगों का बुलावा आया और यह भी निकल गया, या मरीज़ की एआदत या नमाजे जनाज़ा के लिए गया, अगर्चे कोई दूसरा पढने वाला ना हो तो इन सब वजहों की हालत में एअतेकाफ टूट जाता है।

मसअला: पाखाना, पेशाब के लिए गया था  क़र्ज़ ख्वाह ने रोक लिया एअंतेकाफ टूट गया।

मसअला: औरत को छूना बोसा लेना वती (हमबिस्तरी) करना मुअतकीफीन के लिए हराम है।

मसअला: एहतेलाम (स्वप्नदोष) होने से एअतेकाफ टूट गया,

मसअला:  मुअतकिफ के गाली गलूच बकने या झगङा करने से एअतेकाफ टूटता नही।

मसअला:  मुअतकिफ मसजिद ही में खाए पीए सोए,अगर इस काम के लिए मस्जिद से  बाहर गया तो एअतेकाफ जाता रहा।

मसअला:  मुअतकिफ के अलावा और किसी को भी मस्जिद में खाने पीने सोने की इजाज़त नही, और अगर यह काम करना चाहे तो  एअतेकाफ की नियत करके मस्जिद में जाए और नमाज़ पढे या ज़िकरे इलाही करे,फिर यह काम कर सकता है।
(ماخوز از: بہار شریعت)

 तालीफ        
 Neyaz Ahmad Nizami

Tuesday, June 6, 2017

गर्मी की दुआ व इस का जन्म



जिस तरह हर चीज़ का पैदा करने वाला अल्लाह है,जैसा कि क़ूरआन में कहा गया है
  خَالِقُ كُلِّ شَيْءٍ तर्जुमा: हर चीज़ का पैदा करने वाला (س:الانعام، ت:102، پ7)
 यानी रब हर चीज़ का बनाने वाला है,ज़ाहिर सी बात है इस हर चीज़ में गर्मी,और ठंडी भी आ गई,लेहाज़ा रब की किसी चीज़ पर एतराज़ करना रब ही पर एतराज़ करना है जो एक मोमिन का शेवा हो ही नही सकता, इस लिए कभी जिन्दगी के ऐसे मोङ पे खङे हों तो ज़ुबान से ऐसे शब्दो का प्रयोग ना करें जिस से अल्लाह की शान में ज़र्रा बराबर भी तौहिन,गुस्ताखी,नज़र आए। बल्कि हर हाल में रब का शुक्र ही अदा करनी चाहिए
 وَاشْكُرُوا لِي وَلَا تَكْفُرُونِ
तर्जुमा: मेरा हक़ मानो और ना फरमानी ना करो,(سورہ بقرہ152)

इसी लिए खुशी हो या ग़म हर हाल में अल्लाह को याद करने का हुक्म है,और इस्लाम ने हमें हर मोङ पे रहनुमाई (मार्गदर्शन) की है।।

::गरमी व सर्दी की पैदाइश (जन्म)::
गरमी जो हम दुनिया में महसूस करते हैं इसकी एक खास वजह है हदीस शरीफ में है कि

عن أَبی هُرَيْرَةَ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ يَقُولُ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ اشْتَكَتْ النَّارُ إِلَى رَبِّهَا فَقَالَتْ رَبِّ أَكَلَ بَعْضِي بَعْضًا فَأَذِنَ لَهَا بِنَفَسَيْنِ نَفَسٍ فِي الشِّتَاءِ وَنَفَسٍ فِي الصَّيْفِ فَأَشَدُّ مَا تَجِدُونَ مِنْ الْحَرِّ وَأَشَدُّ مَا تَجِدُونَ مِنْ الزَّمْهَرِيرِ ( صحيح بخاری: 3260)
तर्जुमा: अबू हुरैरा رضی اللہ عنہ से रिवायत है कि अल्लाह के रसूल ﷺ ने फरमाया"जहन्नम ने अपने रब से शिकायत करते हुए कहा ऐ मेरे रब ! मेरे एक हिस्से ने दूसरे हिस्से को खा लिया तो अल्लाह ने उस के लिए दो सांसें लेने की इजाज़त दे दी ,एक सांस सर्दी के मौसम में और दूसरी सांस गर्मी के मौसम में,यही वजह है जो तुम तेज़ गरमी महसूस करते हो,और यही वजह है जिस से तेज़ सर्दी महसूस करते हो,

::गर्मी महसूस होने पर दुआ::
जिस नबी ﷺ ने हमें क़दम क़दम पे जीना सिखाया तो ऐसा कैसे हो सकता है कि गर्मी के तेज़ मौसम के बारे में कुछ ना कहा हो चुनांन्चे हदीस शरीफ में फरमाया गया,

 إِذَا كَانَ يَوْمٌ حَارٌّ فَقَالَ الرَّجُلُ : لَا إِلَهَ إِلَّا اللَّهُ ، مَا أَشَدَّ حَرَّ هَذَا الْيَوْمِ ، اللَّهُمَّ أَجِرْنِي مِنْ حَرِّ جَهَنَّمَ ، قَالَ اللَّهُ عَزَّ وَجَلَّ لِجَهَنَّمَ : إِنَّ عَبْدًا مِنْ عِبَادِي اسْتَجَارَ بِي مِنْ حَرِّكِ ، فَاشْهَدِي أَنِّي أَجَرْتُهُ .

तर्जुमा: जिस दिन गर्मी तेज़ होती है तो बन्दा कहता है "ला इलाहा इल्लल्लाहु मा अशद्दा हर्रा हाज़ल यौमे,आल्लाहुम्मा अजिर्नी मिन हर्रे जहन्नम„ अल्लाह दोज़ख से फरमाता है मेरा बन्दा मुझ से तेरी गर्मी से पनाह मांग रहा  है  पस मैं तुझे गवाह बनाता हूं कि मैने इसे तेरी गर्मी से पनाह दी।(البدور السافرۃ ص418 حدیث 1495)

दुआ एंव तर्जुमा: "ला इलाहा इल्लल्लाहु मा अशद्दा हर्रा हाज़ल यौमे,आल्लाहुम्मा अजिर्नी मिन हर्रे जहन्नम„
नहीं है कोई पुज्यनीय सेवाए अल्लाह के आज बङी गर्मी है  ऐ अल्लाह मुझे जहन्नम की गर्मी से पनाह दे।।

गर्मी का मौसम भी अल्लाह की नेमत है और ईस में बहुत सारी हिकमतें हैं जो हमारी समझ से बहुत उपर  हैं इस लिए गर्मी तेज़ हो जाए तो सब्र से काम लेना चाहिए.      ( फक़त ) [गर्मी से हिफाज़त के मदनी फूल]

मुरत्तिब,तर्जुमा: व तस्हील
 Neyaz Ahmad Nizami


Tuesday, May 30, 2017

रमज़ान



मुरत्तिब,तरजुमा व तस्हील नेयाज़ अहमद निज़ामी 

::रमज़ान के मसाइल व  फ़ज़ाइल::

रमज़ान का माना,व फर्ज़ होना::
रमज़ान-उल-मुबारक- इस्लामी साल का 9वां महीना है,
बगवी का क़ौल है कि रमज़ान "रमज़ा„ से निकला जिस के माना गरम पत्थर के हैं क्युंकि ऩबी ﷺ से पहले मुसलमान तेज़ गरमी में रोज़ा रखा करते थे अरब क़बीलों नें जब महीनों के नाम रखना चाहे तो उन दिनों में यह महीना बहुत ही गरमी के मौसम में आया इसी लिए इस का नाम रमज़ान रखा गया,
 कुछ लोग यह भी कहते हैं कि यह महीना गुनाहों को जला देता है इस लिए इस लिए इसे रमज़ान कहते हैं।
इस की हर घङी रहमत भरी है,
शरिअत में रोज़ा के माना हैं  अल्लाह की इबादत की नियत से सुबहे सादिक से लेकर सूरज डुबने तक खाने पीने और जेमा (बीवी से हमबिस्तरी)से अपने आप को रोके रखना
अल्लाह तआ़ला इर्शाद फरमाता है::
 " يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا كُتِبَ عَلَيْكُمُ الصِّيَامُ كَمَا كُتِبَ عَلَى الَّذِينَ مِن قَبْلِكُمْ لَعَلَّكُمْ تَتَّقُونَ ,,
तर्जुमा: ऐ लोगों जो ईमान लाए हो तुम पर रोज़े फर्ज़ किए गए हैं जैसे तुम से पहले वाले लोगों पर फर्ज़ किए गए थे। (सूरह,बक़रा.आयत,283. पारा-2)
हज़रत सईद बिन जुबैर رضی اللہ عنہ का क़ौल है कि हम से पहले वाले लोगों पर ई़शा से लेकर दूसरी रात के ईशा तक रोज़ा होता था जैसा कि इस्लाम के शुरू में भी ऐसा ही दस्तूर था।
कहा जाता है कि कोई उम्मत ऐसी नही मगर अल्लाह ने उन पर माहे रमज़ान के रोज़े फर्ज़ किए थे मगर वह उन से फिर गए।
रमज़ान के रोज़े हिजरत के दूसरे साल फर्ज़ किए गए यह दीन का एक बहुत ही अहम रुक्न है,इस का वाजिब होने का इन्कार करने वाला काफिर कहलाएगा,

रमज़ान की फज़ीलत::
होज़ूर ﷺफरमाते हैं  कि जब रमज़ान की पहली रात आती है तो जन्नत के तमाम दरवाज़े खोल दिए जाते हैं,और पूरा रमज़ान के महीना कोई भी दरवाज़ा बन्द नही किया जाता,और अल्लाह तआला पुकारने वाले को हुक्म देता है जो नेदा (आवाज़) देता है ऐ नेकी के मांगने वालों ध्यान दो और ऐ गुनाहों के मांगने वाले रुक जा। (1643 ابن ماجہ)
फिर वह कहता है : कोई बखशिश मांगने वाला है जिसे बख्श दिया जाए ?
 कोई सवाल करने वाला है जिसे दिया जाए?
कोई तौबा करने वाला है जिसकि तौबा क़ोबूल की जाए,?
और सुब्ह होने तक यह आवाज़ (नेदा) आती रहती है। और अल्लाह ﷻ हर ईद -उल- फित्र के दिन दस लाख (10,00000.) ऐसे बन्दों को बख़्शता है जिन पर अ़ज़ाब वाजिब हो चुका होता है। (ابن ماجہ،کتاب الصیام حدیث 1643)

बहुत लम्बे ख़ुत्बा का कुछ हिस्सा मुलाहेज़ा हों कि नबी ﷺ फरमाते हैं जिस शख्स ने इस महीने में किसी रोज़ा दार का रोज़ा इफ्तार कराया उसे ग़ुलाम आज़ाद करने का स़वाब  मिलता है और उस के गुनाह बख्श दिए जाते हैं,
एक सहाबी नें अर्ज़ किया या रसूलल्लाह ﷺ हम में से हर शख़्स ऐसी चीज़  नही पाता जिस से वह रोज़ादार का रोज़ा इफ्तार कराए, आप ﷺ ने फरमाया: अल्लाह तआला यह सवाब हर उस शख़्स को देता है जो किसी रोज़ादार का रोज़ा दुध के घुंट या पानी के घूंट या खोजूर से इफ्तार कराता है,
और जिस ने किसी रोज़ादार को सैर (भर पेट) कराया तो यह उस के गुनाहों की बख़्शिश होगी, और अल्लाह तआला मेरे हौज़ से उसे ऐसा  सैर (भर पेट)  करेगा कि वह कभी प्यासा नही होगा ऐर उसे भी रोज़ादार के बराबर अज्र मिलेगा लेकिन रोज़ादार के सवाब से कुछ कम नही किया जाएगा (مکاشفۃ القلوب638)


सरवरे कौनेन ﷺ. फरमाते हैं कि रमज़ान के महीना में मेरी उम्मत को पांच चीज़ें दि गई हैं जो इस से पहले किसी उम्मत को नही दी गई,
1 रोज़ादार के मुंह की महक अल्लाह ﷻ मुश्क से ज़्यादा उम्दा है

2 रोज़ादार के इफ्तार तक फरिश्ते उन के लिए बख़्शिश तलब (मांगते) करते रहते है,

3 शैतान क़ैद कर दिए जाते हैं,

4 अल्लाह ﷻ हर दिन जन्नत को संवारता है और फरमाता है बहुत जल्द इस में मेरे नेक बन्दे दाखिल होंगे उन से तकलीफ दुर कर दी जाएगी,

5 औऱ इस महीना की आखरी रात में उन्हे बख़्शा जाएगा, पूछा गया : या रसूलल्लाह ﷺ क्या इस से मुराद लैलतुल कद्र है? आप ﷺ ने फरमाया नहीं लेकिन काम करने वाला काम पूरा करके अपना अज्र (बदला) पाता है।(مسند احمد 7922)

नसीहत

::रमज़ान के ज़रूरी मसअले::

रोज़े की नियत का समय::
रमज़ान के अदा रोज़े की नियत का समय सूरज डूबने से लेकर ज़हवाए कुबरा यानी पौ फटने तक है,
इस वक्त जब नियत करले यह रोज़े हो जाएंगे लेकिन रात ही में कर लेना बेहतर है,

नियत के माना::
जिस तरह और इबादतों में बताया गया है कि नियत दिल के एरादे का नाम है ज़ुबान से कुछ कहना ज़रूरी नही इसी तरह रोज़ा में भी वही मुराद है,हां ज़ुबान से कह लेना बेहतर है ,अगर रात में या सुबह फज्र की अज़ान से पहले पहले नियत करे तो यह कहे "नियत की मैने कि अल्लाह ﷻ के लिए फर्ज़ रोज़ा कल रखुंगा„ और अगर दिन में रोज़ा की नियत  करे तो यूं कहे  "नियत की मैने कि अल्लाह ﷻ के लिए आज फर्ज़ रोज़ा रखुंगा„




मसअला: दिन में नियत करे तो ज़रूरी है कि यह नियत करे कि "मैं सुबहे सादिक़ से रोज़ादार हुं„ और अगर यह नियत की कि अब से रोज़ा दार हूं सूबह सादिक (अज़ाने फज्र से पहले) से पहले नहूं तो रोज़ी ना हुआ।(جوہرہ ردالمختار و بہار)

नोट: कुछ लोग फज्र की अज़ान खत्म होने तक खाते पीते हैं उनका रोज़ा नही होगा,क्युंकि सहरी का आखरी वक्त अज़ान से पहले पहले खत्म हो जाता है, नेयाज़ अहमद निज़ामी

ईद के दिन का रोज़ा::
मसअला: ईद के दिन का रोज़ा मकरूहे तहरीमी यानी हराम के बराबर इसी तरह बक़रईद के दिन का और उस के बाद 11-12-13 तारीख तक का,

::रोज़ा तोङने वाली चीज़ों का बयान::

मसअला: खाने या पीने या जेमाअ(बीवी के साथ हम्बिस्तरी) करने से रोज़ा टूट जाता है जबकि रोज़ादार होना याद हो,मसअला: मर्द ने औरत का बोसा (kiss)लिया या छूआ या या गले लगाया और इन्ज़ाल (विर्य) हो गया तो रोज़ा टूट गया और अगर औरत ने मर्द को छूआ और मर्द कोइन्ज़ाल (विर्य) हो गया तो रोज़ा ना टूटा, मसअला: हुक़्क़ा,सिगरेट,बीङी,सिगार,पीने से रोज़ा टूट जाता है, 
मसअला: पान,या तम्बाकू,या सुर्ती खाने से भी रोज़ा टूट जाता है अगरचे पीक थूक दी हो
मसअला: चीनी,गुङ या वगैरह या ऐसी चीज़ जो मुंह में रखने से घुल जाती है मुंह मे रखी और और थूक निगल गया तो रोज़ा टूट गया।
मसअला: दांतो में कोयी चीज़ चने बराबर या उस से ज़्यादा थी उसे खा गया या कम ही थी उसे मुंह से निकाल कर दोबारा खा गया तो रोज़ा टूट गया,
 मसअला: कान में तेल डाला या किसी तरह चला गया तो रोज़ा टूट गया, और अगर पानी कीन में चला गया या डाला तो रोज़ा नही टूटा,
 मसअल: औरत ने शर्मगाह की जगह पानी या तेल डाला तो रोज़ा टूट गया, जबकी मर्द ने डाला तो नही टूटा,
 मसअला: जानबूझ कर भरमुंह क़ै (उल्टी,बोमेटी) की और रोज़ादार होना याद है तो रोज़ा टूट गया और अगर इस से कम की तो रोज़ा ना गया,
मसअला: बे अख्तेया ऐसे ही क़ै (उल्टी,बोमेटी)  हुई  और अपने आप अन्दर चली गई तो रोज़ा ना टूटा चाहे थोङी हो या ज़्यादा रोज़ा याद हो या ना हो,
मसअला: रमज़ान में बेगार किसी वजह के ख़ुलेआम जो शख्स खाए पीए तो हुक्म है कि उसे क़त्ल कर दिया जाए।। (ردالمختار)

::उन चीज़ों का बयान जिन से रोज़ा नही टूटता::

मसअला: भूल कर खाया पिया या जेमाअ (बीवी के साथ हम्बिस्तरी) किया तो रोज़ा ना टूटा,
मसअला: मक्खी या धूआं या या ग़ोबार (धूल) हलक़ में जाने से रोज़ा नही टूटता,
मसअला: तेल या सुर्मा लगाया तो रोज़ी ना गया,
मसअला: दांत से खून निकल कर हलक से निचे अगर नही गया तो रोज़ा ना गया,
मसअला: भूले से खाना खा रहा था याद आते ही फौरन नवाला थूक दिया तो रोज़ा ना गया और अगर निगल लिया तो रोज़ा टूट गया,
मसअला: कान में पानी चला गया तो रोज़ा ना टूटा, मसअला: बऔरत का बोसा (kiss)लिया या छूआ या या गले लगाया और इन्ज़ाल (विर्य) ना हुआ तो रोज़ा ना टूटा,
मसअला: एहतलाम (स्वपनदोष) हो गया तो रोज़ा ना टूटा, मसअला: नापाकी की हालत में सुबह की बल्कि सारे दिन नापाक रहा रोज़ा तो हो जाएगा मगर इतनी देर तक जानबूझ कर नापाक रहना और नमाज़ का ना पढना हराम है।।

::किन किन हालतो में रोज़ा ना रखने की इजाज़त है::

मसअला: सफर, हमल (प्रेग्नेन्ट), बच्चा को दुध पिलाना, बिमारी, बुढापा, और मर जाने का डर,यह सब रोज़ा ना रखने के लिए ऊज्र है यानी छूट है,इन सब बातों की बजह से रोज़ा ना रखना गूनाह नही,हां जब वह वजह जाती रहे तो बाद में रोज़ा रखना फर्ज है,
मसअला: सफर से मुराद सफरे शरई है यानी इतना दूर निकले की यहां से वहां तक तीन दिन का रास्ता हो,
मसअला:खुद मुसाफिर को और उस के साथ वाले को रोज़ा रखने में नुक्सान ना हो तो रोज़ा रखना सफर में बेहतर है और अगर नुकसान का खौफ हो तो ना रखना बेहतर है,
मसअला: हमल वाली या दूध पिलाने वाली को अगर अपनी जान या बच्चा का डर हो तो तो उस वक्त रोज़ा ना रहे,
मसअला: मरीज़ को बिमारी बढ जाने या देर में अच्छा हो जाने का या सेहतमंद को बिमार पङ जाने का यकीन हो तो उस दिन रोज़ा न रखे

इन तमाम सुरतों में गालिब गुमान यानी सौफीसद यक़ीन हो कि हां ऐसा होगा,तब रोज़ा ना रखने की इजाज़त है,

गालिब गुमान यानी मुकम्मल यकीन की तीन वजहे हैं
1 उस की ज़ाहिरी निशानी पाई जाती हो,
2 उस शख्सकी अपना तजरबा हो,
3 कोई मुसलमान डॉक्टर जो फासिक़ ना हो उस ने खबर दी हो,

और अगर कोई निशानी ना हो ,कोई तजरबा भी ना हो और डॉक्टर ने भी ना कहा हो  तो रोज़ा छोङना जायज़ नही,बल्कि सिर्फ वहम या काफिर व फासिक डॉक्टर के कहने पर रोज़ा छोङ दिया तो कफ्फारा भी देना पङेगा।।

::कफ्फारा की तारीफ::
एक रोज़ा छोङने के बदले लगातार 60 रोज़ा रखे यह ना हो सके तो 60मसेकीनो को दोनो टाइम भरभर पेट खाना खिलाए,
अगर रोज़ा रखने को बीच में एक भी रोज़ा छूट गया तो फिर से गिन्ती शूरू करे,

(استفادہ از قانون شریعت" روزہ حصہ اول)


मुरत्तिब,तरजुमा व तस्हील
 Neyaz Ahmad Nizami



Tuesday, May 9, 2017

शअबान का महीना




शअबान का मतलब::
शअबान इस्लामी महीनों में से 8वीं महीना है, अरब के लोग शअबान के महीने में अपने घरों और ख़ेमों से निकल कर पानी की तलाश में दूर दूर तक निकल जाते थे और अक्सर लोग अपने क़बीलों से जूदा हो जाते थे इस लिए इस महीने का नाम शअबान पङ गया। (لسان العرب 8/87، داراصادر بیروت)

शअबान में अल्लाह तआला अपने बन्दों के लिए बहुत ज़्यादा ख़ैर (भलाई) व बरकत नाज़ील फरमाता  (उतारता)  है और साल भर होने वाला काम और बन्दों को मिलने वाला रिज़्क़ इसी महीना में बांटा जाता है। इस लिए इस महीना को शअबान कहा जाता है।
रजब के महीने की पहली तारीख को प्यारे  नबी ﷺ की नज़र चांद पर पङती तो अपना हाथ उठा कर यह दुआ करते
( اللَّهُمَّ بَارِكْ لَنَا فِي رَجَب، وَشَعْبَانَ، وَبَلِّغْنَا رَمَضَانَ )
यानी: ऐ अल्लाह रजब और शअबान को बा बरकत (बरकत वाला) बना और हम को रमज़ान तक पहुंचा।


इस्लामी विद्वान फरमाते हैं की शअबान (شعبان) शब्द में एक बहुत बेहतरीन राज़ छुपा है वह यह कि शअबान (شعبان)  के अन्दर पांच हरूफ (अक्षर) हैं
1 शीन (ش)
2 ऐन.  (ع)
3 बा    (ب)
4 अलिफ (ا)
5 नून    (ن)

शीन (ش) से मुराद शर्फ (बुजुर्गी) है,यानी इस महीना को दूसरे महीनों पर सेवाए रमज़ान के खास बुजुर्गी हासिल है।

ऐन  (ع)  से मुराद उक़बा है, यानी इस बात की तरफ इशारा है कि शअबान की अज़मत करने वाले की दुनिया में इज़्ज़त होगी और आख़ेरत में बङा मरतबा मिलेगा।

बा  (ب)  से मुराद बरकत, बहबूद, बेहतरी और बोहतात है, यानी इस बात की तरफ इशारा है  कि दुनिया में बरकत व बहबूद हासिल होगी और क़ब्र में रोशनी की बोहतात (ज़्यादती) होगी और क़्यामत के मैदान में दरजात बुलन्द होंगे।

अलिफ (ا)  से मुराद अमन व अमान और उल्फत व अनवार है, यानी शअबान की इज़्ज़त करने वाले को दुनिया में अमन व अमान मिलेगा और आखेरत के दिन अमान हासिल होगा, वह क़्यामत की हौलनाकियों से महफूज़ रहेगा।

 नून  (ن) से मुराद नार (आग) है, यानी शअबान की खैर व बरकत हासिल करने वाला जहन्नम से निजात (छुटकारा) पाएगा और इस महीना में नफ्ल नमाज़ पढने वाले के दिल में नूर पैदा होता है और जो शख्स शअबान की अज़मत का लेहाज़ रखता है और इस की ताज़ीम करता है उस को दुनिया में इमान का नूर और आखेरत में आग से निजात (छुटकारा) मिलती है।। (غنیۃ الطالبین 1/188)


शअबान की फज़ीलत::
सय्यदे आलम ﷺ ने शब-ए-मेराज (मेराज की रात) अल्लाह तआला की बारगाह में मुनाजात की थी कि
अए अल्लाह! तुने हज़रत मुसा علیہ السلام को अ़सा (डंडा) दिया था, मुझे अपनी बारगाह से क्या चीज़ एनायत की?
अल्लाह तआला ने फरमाया आप को शअबान का महीना दिया,यह महीना आप की उम्मत के गुनाहों और शैतानी फरेब कारियों को दूर करेगा और सारे गुनाहों को मिटा देगा।

तमाम नबियों के सरदार जनाब अहमदे मुज्तबा ﷺ ने फरमाया:
رجب شھر اللہ و شعبان شھری و رمضان شھر امتی
यानी: रजब अल्लाह का महीना है, और शअबान मेरा महीना है, और रमज़ान मेरी उम्मत का महीना है।

प्यारे आक़ा व मौला मुहम्मद मुस्तफा ﷺ ने शअबान के बारे में फरमाया:
فضل شعبان شھری علٰی سائرالشھور کفضلی علٰی سائرالانبیاء۔
यानी: मेरे महीना शअबान को तमाम महीनों पर ऐसी फज़ीलत हासील है, जैसी मुझे फज़ीलत हासिल है तमाम नबियों पर। (شعب الایمان 3/369)

इसी मुबारक महीना में चांद को दो टुकङे करने वाला मोअजेज़ा भी नबी अलैहिस्सलाम से हुआ था।
अल्लामा इब्न हजर अ़स्कलानी फरमाते हैं कि
شعبان انشق فیہ القمر لسید ولد عدنان
यानी: शअबान वह मुबारक महीना हैजिस में होज़ूर ﷺ से चांद दो टुकङा हुआ।

हज़रते ओसामा रज़िृल्लाहु अन्हू फरमाते हैं कि मैने अर्ज़ की या रसूलल्लाह ﷺ मैं देखता हूं कि जिस तरह आप ﷺ शअबान में रोज़े रखते हैं इस तरह किसी भी महीना में नहीं रखते ?
नबी ﷺ ने फरमाया कि रजब और रमज़ान के बीच में यह महीना है, लोग इस से ग़ाफिल हैं इस में लोगों के आमाल अल्लाह की तरफ उठाए जाते हैं और मुझे यह महबूब है कि मेरा अ़मल इस हाल में उठाया जाए कि मैं रोज़ादार हूं। سنن نسائی ص 387حدیث 2354

(استفادہ از :  آقا کا مہینہ و منیرالایمان فی فضائل شعبان)

इस के अलावा भी दरजनों हदीसें हैं जिस में शअबान की अज़मत व फज़ीलत का ज़िक्र बार बार वारिद हुआ है और यही वह अज़मत वाला महीना है जिस में शब-ए-बरात जैसी अज़ीम रात भी है ,मैं कहता हूं एक मुसलमान के लिए इतना ही काफी है कि इस महीना को प्यारे आक़ा ﷺ नें रमज़ान के बाद सब से ज़्यादा महबूब रखा है,इस महीना में नबीﷺका  रोज़ा की कसरत फरमाना ही इस बात पर दलील है कि य़ह महीना अपने अन्दर कितनी बरकत समेटे हुए है। واللہ اعلم