neyaz ahmad nizami

Thursday, April 5, 2018

गुनाहो का तआरुफ यानी पापों का परिचय, नेयाज़ अहमद निज़ामी


गुनाह यानी पाप की दो क़िस्में हैं
1- गुनाहे सगीरा (छोटे छोटे गुनाह),
2- गुनाहे कबीरा (बङे बङे गुनाह),
गुनाहे सगीरा नेकियों (पुन्य) और एबादतों (पुजा पाट) की बरकत से मोआफ हो जाते हैं, जबकि गुनाहे कबीरा उस समय तक मोआफ नही होते जब तक कि आदमी सच्ची तौबा (पश्चाताप) करके लोगों के हक़ को मोआफ ना करा ले,
गुनाहे कबीरा(बङे गुनाह)किसे कहते हैं?
गुनाहे कबीरा हर उस गुनाह को कहते हैं, जिस से बचने पर अल्लाह तआला ने मग़फिरत (बख्शिश) का वादा फरमाया है।(حاشیہ بخاری ص 36)
और कुछ आ़लिमों ने कहा है कि हर वह गुनाह जिस के करने वाले पर अल्लाह व रसूल ने अज़ाब (दण्ड) सुनाई,या लानत फरमाई या अ़ज़ाब की ज़िक्र फरमाया।

गुनाहे कबीरा(बङे गुनाह) कौन कौन हैं?
गुनाहे कबीरा की तादाद (गिन्ती/मात्रा) बहुत ज़्यादा है मगर उन में से कुछ मश्हूर गुनाह यह हैं,
(1)शिर्क करना (2)जादू करना (3)हत्या करना (4)सूद खाना (5)यतीम का माल खाना (6)काफिरो से जिहाद के समय भाग जाना (7)किसी औरत पर ब्लात्कार का इल्ज़ाम लगाना (8)ज़िना (ब्लात्कार) करना (9)अग़लाम बाज़ी (मर्द मर्द से सेक्स) करना (10)चोरी करना (11)शराब पीना (12)झूट बोलना (13)झूटी गवाही देना (14)ज़ुल्म(अत्याचार) करना (15)डाका डालना (16) माता पिता को तकलीफ देना (17)हैज (मासिक खून) के समय और नेफास(बच्चा के पैदा होने के बाद का खून) के समय पत्नी से सोहबत (सेक्स) करना (18)जुआ खेलना (19)गुनाहे सगीरा (छोटे गुनाह) बार बार करना, (20)अल्लाह की रहमत से ना उम्मीद हो जाना, (21)अल्लाह के अज़ाब से निडर हो जाना, (22)नाच देखना (23)औरतो का बेपर्दा घूमना, (24)नापतौल में कमी करना (25)चुग्लीखाना (26)गीबत करना (27)दो मुस्लिमों को आपस में लङाना, (28)अमानत को हङपना, (29)किसी का माल ज़मीन आदि हङपना, (30)नमाज़ रोज़ा हज ज़कात जैसे फराएज़ को छोङना, (31)मुसलमानों को गाली देना,उनसे बेला वजह मार पीट करना वगैरह वगैरह सैंकङो गुनाहे कबीरा हैं,
और साथ में दूसरों को भी इन पापों से रोकना ज़रूरी है।
हदीस शरीफ में है कि अगर किसी मुसलमान को कोई गुनाह (पाप) करते देखे तो ज़रूरी है अपना हाथ बढा कर उस को पाप के करने से रोक दे, और अगर हाथ से रोकने की शक्ती ना हो तो कम से कम अपने दिल से उस पाप को बुरा समझ कर उस से नफरत ज़ाहिर करे और यह इमान का बहुत ही कमज़ोर दर्जा है, (مشکٰوۃ شریف ج2ص 437)
हदीस मे है कि कोई आदमी किसी क़ौम (क़बीला) में रहकर गुनाह का काम करे और वह कबूला शक्ती होने के बावजूद उस आदमी को गुनाह करने सो ना रोके तो अल्लाह तआला उस एक आदमी की वजह से पूरे क़बीले को उन के मरने से पहले अज़ाब मे डालेगा, (مشکٰوۃ جلد 2 صفحہ 437)
गुनाहों से दुनिया मे नुक्सान
गुनाहों के  प्रकोप से दुनिया में भी नुक्सान पहुंचते रहते हैं जिन में से कुछ यह हैं।
(1)रोज़ी कम होना, (2)मुसीबतों का ज़्यादा होना, (3)उम्र कम होना, (4)दिल में और कभी कभी तमाम बदन में अचानक कमज़ोरी होकर सेहत खराब हो जाना, (5)इबादत से महरूम हो जाना, (6)लोगों में ज़लील और रुस्वा हो जाना, (7)दिमाग में उल्टी सीधी बात का आना, (8)खेतों और बागों की पैदावार में कमी होना, (9)नेमतों का छिन जाना, (10)हर समय दिल का परिशान होना, (11)अचानक ला इलाज बिमारी मे पङ जाना, (12)अल्लाह और फरिश्ते और बन्दों की लानत का होना, (13)चेहरे का बे नूर या रौनक का ना होना, (14)बेशर्म हो जाना, (15)मरते समय मुंह से कलमा ता ना निकलना, गुनाहों (पापों) से दुनियावी बङे बङे नुकसाना होते हैं,।
{जन्नती ज़ेवर पेज107से109 तक}
मुरत्तिब,तर्जुमा: व तस्हील
 Neyaz Ahmad Nizami


मुझे आलिमों से प्रेम है:: नेयाज़ अहमद निज़ामी



हज़रत ख़्वाजा फरीदुद्दीन गंजशकर चिश्ती रहमतुल्लाह अलैह ने फरमाया(कहा) कि रसूल-ए-खुदा ﷺ ने फरमाया कि,
مَن اَحب العِلم وَالعلماء لَا یکتب خطیۃ
तर्जुमा: यानी जो व्यक्ती इल्म और ओलमा (ज्ञान और ज्ञानी) से प्रेम करता है उस का कोई गुनाह (पाप) नही लिखा जाता, सच्चा प्रेम ऊन का अनुसण करना है जब कोई उन से मुहब्बत करेगा तो ज़रूर उन का अनुसण करेगा और ना पसंदीदा बातों से रूका रहेगा और जब यह हालत होगू तो गुनाह (पाप) नही लिखा जाएगा ।
ओलमा और संतों की दोस्ती रसूल-ए-खुदा ﷺ की दोस्ती है,
 पस ऐ दर्वेश (फक़ीर) ! जो इन्सान 7 दिन साफ दिल से आलिमों कि सेवा सत्कार करता है,गोया सात हज़ार साल अल्लाह की इबादत करता है,
इबेलीस लईन सब को धोका दे जाता है, लेकिन आलिमों और संतों को नहीं दे सकता, इस लिए कि आलिमों और संतों की दोस्ती से बढकर कोई चीज़ नही,जिस दिल में आलिमों और सूफियों का प्रेम हो उन के पापों का खलिहान उन की मुहब्बत का एक ज़र्रा जलाकर नाचीज़ कर देता है। फिर फरमाया कि आलिम हैं जो रात को जागे और दिन को रोज़ा रखें, आलिम की एक दिन की इबादत (पूजा) उस आबिदों (एबादत करने वाले) की 40 साल इबादत (पूजा) के बराबर है जो आलिम ना हो,
जब बलाएं मुसीबतें आसमान से उतरती हैं तो उस शहर पर कम उतरती होती हैं जिस में ओलमा और मशाईख हों। {ھشت بھشت /اسرارالاولیاء ص 129}
मुरत्तिब,तर्जुमा: व तस्हील
 Neyaz Ahmad Nizami


Tuesday, April 3, 2018

शौच का सही (इस्लामी) तरीक़ा:नेयाज़ अहमद निज़ामी,




فِيهِ رِجَالٌ يُحِبُّونَ أَن يَتَطَهَّرُواْ وَاللّهُ يُحِبُّ الْمُطَّهِّرِينَ{سورہ توبہ108 پ11}
तर्जुमा: इस मस्जिद यानी मस्जिद-ए-क़ोबा में ऐसे लोग हैं जो पाक (पवित्र) होने को पसंद रखते हैं,और अल्लाह दोस्त रखता है पाक (पवित्र) होने वालों को,
तफ्सीर {विस्तार}: होज़ूर सरवर-ए-आलम ﷺ ने क़ोबा वालों से पूछा कि अल्लाह ﷻ ने तुम्हारी सफाई और पवित्रता की तारीफ {प्रशंसा} की है, तुम में कौन सी खोसूसियत {अच्छाई} है ? उन्होने कहा कि हम क़ज़ा-ए-हाजत {शौच} के बाद पानी से इस्तिंजा {शौच के बाद पानी लेना} करते हैं, यह उन के क़ुदरती सफाई का सबूत है,कि जब वह इस मोआमले में इतने सतर्क हैं,तो उन के बदन और कपङे के बारे में  ख़ुद ही अंदाज़ा लगा सकते हैं, इस से मालूम हुआ कि जो इन्सान बदन की सफाई और पवित्रता का ख़ेयाल रखता है, वह भी परवरदिगार-ए-आलम के समक्ष प्रशंसा के क़ाबिल होता है।{تفسیر ضیاء القرآن ج دوم ص254}
:: शौच करने से पहले और बाद की दुआ::
हदीस:1
अबू दाऊद इब्न माजा ज़ैद बिन अर्क़म रज़ीयल्लाहो अन्हु से रावी, रसुल ﷺ फरमाते हैं : यह शौचालय जिन्न और शैतानों के रहने की जगह है तो जब कोई बैतुलख़ला {शौचालय} को जाए तो यह पढ ले,  
ْ اَعُوْذُبِ اللَّهِ مِنَ الْخُبُثِ وَالْخَبَآئثِ
अऊज़ो बिल्लाहे मेनल ख़ुब्स़े वल खबाइस़,
तर्जुमा: मैं अल्लाह की पनाह मांगता हूं नापाकी (अपवित्रता) और नापाकों {अपवित्र लोगों} से,,
सही बुखारी व मुस्लिम में यह दुआ यूं है,
اَللّٰہُمَّ اِنِّیْ اَعُوْذُبِکَ مِنَ الْخُبُثِ وَالْخَبَآئثِ
अल्लाहुम्मा इन्नी अऊज़ो बिका मिनल खुब्से वल खबाइसे,
तर्जुमा: ऐ अल्लाह मैं तेरी पनाह मांगता हूं पलीदी और शैतानों से,
हदीस:2
उम्मुल मुमेनीन आइशा सिद्दीक़ा رضی اللَّهُ عنہا से रावी कि रसूल ﷺ जब शौचालय से बाहर आते तो यूं फरमाते     غُفرَانَکَ   गुफरानका,
इब्न माजा की रेवायत अनस رضی اللَّهِ عنہ से यूं है,
اَلْحَمْدُ لِلّٰہِ الَّذِیْ اَذھَبَ عَنِی اْلاَ ذٰی وَ عَافَانِیْ،
अल्हम्दुलिल्लाहिल्लज़ी अज़हबा अ़निल अज़ा व आअ़फानी,
तर्जुमा: तमाम तारीफ है अल्लाह के लिए जिस नें नुकसान की चीज़ मुझ से दूर कर दी और मुझे आराम दी,
हदीस:3
रसूल ﷺ ने फरमाया कि '' जब शौच को जाओ तो काबा शरीफ को ना मुंह करो, ना पीठ और वह खास जगह को दाहिने हाथ से छूने और इस्तिंजा करने से मना फरमाया,
हदीस:4
हज़रत अनस रज़ियल्लाहू अन्हू रिवायत करते हैं  जब शौच का इरादा फरमाते तो कपङा ना हटाते जब तक कि ज़मीन से क़रीब ना हो जाएं,
हदीस:5
अबू सईद रज़ियल्लाहु अन्हू से रेवायत है कि रसूल ﷺ फरमाते हैं: दो लोग शौच को जाएं और दोनो द्वार से कपङा हटा कर बातें करें  तो अल्लाह ﷻ उस पर गज़ब फरमाता है।
::शौच करने का तरीक़ा::
जब शौच को जाए तो शौचालय से बाहर यह दुआ पढे,
اَللّٰہُمَّ اِنِّیْ اَعُوْذُبِکَ مِنَ الْخُبُثِ وَالْخَبَآئثِ
अल्लाहुम्मा इन्नी अऊज़ो बिका मिनल खुब्से वल खबाइसे,
तर्जुमा: ऐ अल्लाह मैं तेरी पनाह मांगता हूं पलीदी और शैतानों से,
फिर बायां पैर पहले प्रवेश करे और निकलते समय पहले दाहिना पैर बाहर निकाले और यह दुआ पढे,
اَلْحَمْدُ لِلّٰہِ الَّذِیْ اَذھَبَ عَنِی اْلاَ ذٰی وَ عَافَانِیْ،
अल्हम्दुलिल्लाहिल्लज़ी अज़हबा अ़निल अज़ा व आअ़फानी, कहे।
तर्जुमा: तमाम तारीफ है अल्लाह के लिए जिस नें नुकसान की चीज़ मुझ से दूर कर दी और मुझे आराम दी,
जब तक बैठने के क़रीब ना हो कपङा बदन से ना हटाए ना ज़रूरत से ज़्यादा बदन खोले, फिर दोनो पैर फैलाकर बांए पैर पर भार देकर बैठे,छींक या सलाम या अज़ान का जवाब ज़बान से ना दे, और अगर छींके तो ज़ुबान से अल्हम्दुलिल्लाह اَلْحَمْدُ لِلّٰهِ ना कहे दिल में कह ले और बे गैर अवश्यकता अपने गुप्तांग की तरफ ना देखे और ना ही उस के बदन से निकली हुई वस्तू को देखे,देर तक ना बैठे कि इस से बवासीर का डर है, और पेशाब तरने की जगह में ना थूके ,ना नाक साफ करे, ना बार बार इधर उधर  देखे , ना आसमान की तरफ देखे, बल्कि शर्म के साथ सर झुकाए रहे,
जब शौच हो लेवे तो दाहिने हाथ से पानी बहाए और बांए हाथ से धोए और पानी का लोटा ऊंचा रखे कि छींटा ना पङे और पहले पेशाब की जगह धोए फिर पाखाना की जगह,खूब अच्छी तरह धोए, कि धोने के बाद हाथ में बू बाक़ी ना रह जाए, फिर किसी पाक कपङे से पोछ डाले और अगर कपङा पास ना हो तो बार बार हाथ से पोंछे  कि बराए नाम तरी रह जाए  फिर उस जगह से बाहर आए  और यह दुआ पढे :
اَلْحَمْدُ لِلّٰہِ الَّذِی جَعَلَ الْمَاءَ طَھُوْرًا وَالْاِسْلَامَ نُورًا وَقَائِدًا وَدَلِیْلًا اِلَی اللّٰہِ وَاِلٰی جَنَّاتِ النَّعِمِ اللّٰھُمَّ حَصِّنْ فَرْجِیْ وَ طَھِّرْ قَلْبِیْ وَ مَحِّصْ ذُنُوْبِیْ،
तर्जुमा: हम्द (तारीफ) है अल्लाह के लिए जिस ने पानी को पाक करने वाला और इस्लाम को नूर और खुदा तक पहुंचाने वाला और जन्नत का रास्ता बताने वाला किया ऐ अल्लाह तु मेरी शर्मगाह (गुप्तांग) को महफूज़ रख  और मेरे दिल को पाक कर और मेरे गुनाह (पाप) दूर कर।
मसअला: शौच {लघुशंका/दिर्घशंका} करते समय या धोते में ना ही काबा शरीफ की तरफ मुंह हो ना पीठ,चाहे मकान में हो या मैदान में और अगर भूल कर काबा शरीफ की तरफ मुंह या पुश्त करके बैठ गया तो याद आते ही तुरन्त दिशा बदल दे इस में उम्मीद है कि फौरन उस के लिए मग़्फेरत फरमा दी जाए,
::फेक़्ही मसला::
मसअला:1 शौच {लघुशंका/दिर्घशंका} करते समय सुरज,चांद,की तरफ ना मुंह हो ना पीठ यूंही हवा की जानिब पेशाब करना मना है,
मसअला: 2 कुंए या हौज़ या चश्मा के किनारे या पानी में भले ही बहता हुआ हो या घाट पर या फल्दार वृक्ष के नीचे या उस खेत में जिस में खेती मौजूद हो या साया{छांव} में जहां लोग उठते बैठते हों  या मस्जिद ईदगाह के बग़ल में या क़ब्रिस्तान या रास्ता में या जिस जगह पालतू जानवर बन्धे हों, इन सब जगहों  में पेशाब पाखाना मकरूह {इस्लाम को ना पसंद है मगर इस के करने पर कोई अ़ज़ाब नही} है„ इसी तरह जिस जगह वज़ू या गुस्ल {स्नान} किया जाता है वहां भी पेशाब करने मकरूह है।
मसअला:3 खुद नीची जगह  बैठना और पेशाब की धार उंची जगह गिरे यह मना है।
मसअला: 4 ऐसी सख्त {कङी} ज़मीन पर जिस से पेशाब की छींटे उङ कर आएं पेशाब करना मना है।
मसअला: 5 खङे होकर या लेट कर या नंगे होकर  पेशाब करना मकरूह है।
मसअला: 6 नंगे सर पाखाना या पेशाब को जाना मना है।
मसअला: 7 दाहिने हाथ से इस्तिंजा करना मकरूह है , अगर किसी का बायां हाथ बेकार हो गया हो तो दाहिने  हाथ से जायज़ है।
मसअला: 8 तहारत (पानी लेने ) के बाद हाथ पाक (पवित्र) हो गए मगर फिर धो लेना बल्कि मिट्टी लगाकर धो लेना मुस्तहब है,
मसअला: 9 तहारत (पानी लेने ) के  बचे हुए पानी से वज़ू कर सकते हैं कुछ लोग जो इस को फेक देते हैं यह नहीं चाहिए असराफ (फोज़ूल खरची) मे आता है। (फक़त)
{استفادہ از بہار شریعت جلد1 حصہ دوم استنجے کا بیان / تفسیر ضیاءالقرآن جلد دوم}

मुरत्तिब,तर्जुमा: व तस्हील
 Neyaz Ahmad Nizami

Tuesday, January 9, 2018

ग्यारहवीं शरीफ की हक़ीक़त: नेयाज़ अहमद निज़ामी




हर साल रबीउल अव्वल (इस्लामी महीना) की ग्यारहवीं तारीख को पूरी दुनिया में हज़रत शैख़ अब्दुल क़ादिर जिलानी رحمۃ اللہ علیہ के इन्तेक़ाल के दिन पर धार्मिक काम करने के पक्क्ष में बङे धूम धाम से मनाया जाता है, इस तारीख को सय्यदोना शैख़ अब्दुल क़ादिर जिलानी رحمۃ اللہ علیہ की रूह को सवाब पहुंचाने की नियत से गरीबों मस्कीनों खाना खिलाने,कपङा बांटने, और अपनी पुंजी को हिसाब से  लोगों पर खर्च करने का एहतमाम करते हैं,
दुआ, सदका, खैरात के सवाब का फायेदा मुर्दो को और पहुंचाने वालों को मिलता है,
हदीस: हज़रत अनस رضی اللہ عنہ  से रिवायत है कि
 उन्होने सरकारे दोआलम ﷺ से पूछा या रसूलल्लाह हम अपने मुर्दों की तरफ से सदक़ा और हज करते हैं और उन के लिए दुआ करते हैं,तो क्या यह उन को पहुंचता है?
 सरकार ﷺ ने फरमाया हां बेला शुब्हा वह पहुंचता है और इस से वह ख़ुश होते हैं।

हज़रत शैख अब्दुल हक मुहद्दिसे देहलवी हर साल ग्यारहवीं बङे अदब और एहतराम से मनाते थे,

रहा यह सवाल कि उसी ख़ास दिन को निर्धारित करना कैसा?
इस बारे में शैख अब्दुल हक मुहद्दिसे देहलवी फरमाते हैं किसी दिन के निर्धारित करने से कोई फर्क़ नही पङता ,किसी भी उर्स में एक तरह की दावत और ज़ेयाफत (मेहमान नवाज़ी) होती है,और यह ज़ेयाफत (मेहमान नवाज़ी) सुन्नत है अत: (लेहाजा़) एक दिन ख़ास कर के दावत का इन्तेज़ाम करना उस आम सुन्नत से बाहर नही कहलाएगा,,
और किसी  अच्छे कार्य के लिए दिनो को निर्धारित करना तो रसूल ﷺ से साबित है जैसा कि
हदीस: मुहम्मद बिन नोअमान  رضی اللہ عنہ  से मरवी है वह नबी ﷺ  मरफूअन बेयान करते हैं कि: जो अपने मां बाप या इन दोनो में से किसी एक की क़ब्र की हर जुमा को ज़्यारत करे उस को बख़्श दिया जाता है और उसे नेंक और फरमांबरदार लिख दिया जाता है,
दिनो के निर्धारित करने हेतू हबहुत सारे सोबूच मौजुद हैं जैसा कि हजरत ईसा علیہ السلام के बारे मे सुरह मर्यम आयत 33 में है
وَالسَّلَامُ عَلَىَّ يَوْمَ وُلِـدْتُّ وَيَوْمَ اَمُوْتُ وَيَوْمَ اُبْعَثُ حَيًّا

तर्जुमा: और सलामती मुझ पर जिस दिन मैं पैदा हुआ और जिस दिन मैं मरूं और जिस दिन मैं ज़िन्दा उठाया जाऊं,,
इन वाक़ेयात से पता चला कि पैदाईश का दिन और मौत का दिन दोनो मुहतरम (इज़्ज़त वाला) दिन हैं इसी लिए ओलमा (आलीम) ने वेसाल (मृत्यू) के दिन खाने की दावत, तिलावते कुरआन, अल्लाह ती तस्बीह, और उस जिन माली बदनी इबादत का सवाब बज़ुर्गाने दीन में से कीसी बुजूर्ग की रूह को इसाले सवाब करने को ख़ास फरमाया है,

जब ग्यारहवीं शरीफ का खास दिन मनाना जायज़ हुआ तो उस दिन मेहमानें की मेहमान नवाज़ी के लिए मूर्ग़ा बकरा वगैरह जिबह (हलाल) करना भी जायज हुआ,यह ध्यान रहे कि इस मौक़ा से जो जानवर  जिबह (हलाल) किया जाता है उस के जिबह (हलाल) के समय अल्लाह तअाला ही का नाम लिया जाता है और "बिस्मिल्लाहे अल्लाहु अकबर,, (بسم الله الله اكبر) कह कर ही जिबह (हलाल) किया जाता है,उस जानवर को गौसे आज़म का नाम लेकर नही जिबह किया जाता है,
हज़रत मौलाना शाह अब्दुर्रहमान अपनी मलफुज़ात मे फरमाते हैं कि,
"ग्यारहवीं की हकिकत यह है कि हज़रत शैख़ अब्दुल क़ादिर जिलानी رحمۃ اللہ علیہ  हर महीना रबिउल अव्वल की 11 तारीख रसूले अकरम ﷺ का फातेहा चहल्लुम मनाते थे आप के मानने वाले(अनूयाई) भी इन्ही तारीखों में यही फातेहा ग्यारहवीं के नाम से मनाने लगे,धीरे धीरे यह ग्यारहवीं खुद सय्यदोना अब्दुल क़ादिर जिलानी رحمۃ اللہ علیہ  की तरफ मन्सूब हो गई,आज कल जो ग्यारहवीं मनाई जाती है उस में सय्यदोना शैख़ अब्दुल क़ादिर जिलानी رحمۃ اللہ علیہ  का फातेहा होता है और उन के नाम से नेयाज़ दिलाई जाती है,
 (मफहूमे तजकेर-ए-मशाईखे एजाम पेज 175-176-177-178)


मुरत्तिब,तर्जुमा: व तस्हील
 Neyaz Ahmad Nizami


Sunday, January 7, 2018

जीवनी ग़ौस़-ए-आज़म-: नेयाज़ अहमद निज़ामी






:: आप का जन्म मुबारक ::
सय्यदोना गौस-ए-आ़ज़म का जन्म मुबारक 1 रमज़ान शरीफ जुमा (शुक्रवार) के दिन 470ھ मुताबिक़ 1077ء गिलान में हुआ आप के पुर्वज का वतन जियाल या जील या जिलान था इसी निस्बत से आप को जिलानी या गिलानी कहते हैं। (مفھوم مرآۃالاسرار ص562 و تزکرہ مشائخ عظام ص 188)

:: नाम नसब ::
आप का नाम नामी अब्दुल क़ादिर और कुन्नियत अबू मुहम्मद लक़ब मोहियुद्दीन महबूबे सुब्हानी है, और दुनिया इन्हे गौस-ए-आज़म,ग़ौस पाक, बङे पीर, पीरान-ए-पीर ,पीर दस्तगीर, सुल्तानुल अवलिया,दानाए असरारे ग़ैब, गौस़ुस्सकलैन, शेर बेशए मारफत,वगैरह के नाम से भी जानती है।

वालिद माजिद (पिता श्री) की तरफ से खानदानी सिलसिला यूं है::
हज़रत शैख़ अब्दुल क़ादिर जिलानी बिन सय्यद अबू सालेह मूसा जंगी दोस्त बिन सय्यद अबू अब्दुल्लाह बिन सय्यद यहया ज़ाहिद बिन सय्यद मुहम्मद रूमी बिन सय्यद दाऊद बिन सय्यद मुसा जौन बिन सय्यद अब्दुल्लाह स़ानी बिन सय्यद अब्दुल्लाह महज़ बिन सय्यद हसन मुस़न्ना बिन सय्यदोना इमामे हसन बिन अमीरुल मुमेनीन सय्यदोना अ़ली इब्न अबी तालिब رضی اللہ عنھم اجمعین ،

वालिदा माजिदा (माता श्री ) की तरफ से खानदानी सिलसिला यूं है::
हज़रत उम्मुल ख़ैर फातेमा बिन्त सय्यद अब्दुल्लाह सोमई ज़ाहिद बिन सय्यद अबू जमाल बिन सय्यद मुहम्मद बिन सय्यद अबुलअ़ता अब्दुल्लाह बिन सय्यद कमालुद्दीन ईसा बिन सय्यद अबू अ़लाउद्दीन अल जव्वाद बिन इमाम अली रज़ा बिन इमाम मुसा काज़िम बिन इमाम जाअ़फर सादिक़ बिन इमाम मुहम्मद बाक़र बिन इमाम ज़ैनूलआबेदीन बिन इमाम हुसैन बिन अमीरुल मुमेनीन सय्यदोना अ़ली इब्न अबी तालिब رضی اللہ عنھم اجمعین (تزکرہ مشائخ عظام ص188)

पिता की तरफ से हसनी और माता की तरफ से हुसैनी सय्यद होने के नाते आप رحمۃ اللہ عیہ को नजीबुत्तरफैन सय्यद भी कहा जाता है।

:: आप का बचपन ::
शैख़ अब्दुल क़ादिर जिलानी رحمۃ اللہ علیہ की माता श्री कहती हैं कि जब मेरा लङका पैदा हुआ तो रमज़ान शरीफ में दिन भर दूध नहीं पीता था जन्म के दूसरे साल आसमान में बादल होने की वजह से लोगों को रमज़ान का चांद दिखाई ना दिया इस लिए लोगों नें मेरे पास आकर सय्यदोना अब्दुल क़ादिर जिलानी के बारे में पूछा कि इन्होंने दुध पिया है कि नही? तो मैने उन को बताया कि मेरे बेटे ने आज दूध नही पिया है, इस के बाद छानबीन करने पर पता चला कि उस दिन रमज़ान की पहली तारीख थी यानी उस दिन रोज़ा था,(سیرت غوث اعظم- عالم فقری ص26)
शैख़ अब्दुल क़ादिर जिलानी رحمۃ اللہ علیہ फरमाते हैं कि मेैं उस समय अपने घर में बच्चा था जब मैं बच्चों के साथ खेलने का इरादा करता तो मैं कहने वाले को सुनता कि वह मुझसे कहता है ऐ बरकत वाले किधर जाते हो तब मैं डर कर भागता और अपनी मां की गोद में पङ जाता।
शैख़ अब्दुल क़ादिर जिलानी رحمۃ اللہ علیہ जब घर से मदरसा को जाते तो अध्यापक लङकों से कहते थे कि वली अल्लाह के लिए जगह चौङी करो ताकि वह बैठ जाए। (بہجۃالاسرار ص 50)

:: आप का होलिया मुबारक ::
शैख़ अब्दुल क़ादिर जिलानी رحمۃ اللہ علیہ ज़ईफ-उल-बदन, दरमियाना क़द, चौङा सीना, चौङी दाङी, लम्बी गरदन, गन्दुमी रंग, मिले हुए भंव, काली आंखें, बुलंद आवाज़,के मालिक थे।(غوث پاک کے حالات ص 24)

:: तालीम व तरबियत (शिक्षा व पोषण) ::
ग़ौस पाक رحمۃ اللہ علیہ ने अभी होश भी ना सम्भाला था कि वालीद माजिद (पिता श्री) का साया सर से उठ गया और अाप के नाना हज़रत सय्यद अब्दुल्लाह सोमई ज़ाहिद رحمۃ اللہ علیہ ने ग़ौस पाक के पालन पोशण की ज़िम्मेदारी अपने सर लेली और इस तरह अपनी मां की छत्र छाया तले आप परवान चढते रहे जब मकतब जाने की उम्र हुई तो तालीम का आग़ाज़ हुआ रहमते ख़ुदावन्दी शामिल-ए-हाल रही,(تزکرہ مشائخ عظام ص189)
बग़दाद का सफर ::
आप 18 साल की उम्र यानी 488ھ में अपनी मां की ख़िदमत में जाकर अर्ज़ किया कि मुझे राहे हक़ तआला पर चलने की इजाज़त दें ताकि बद़गाद जाकर इल्म (शिक्षा) प्राप्त करूं आप रोईं और 40 दिनार गौस पाक के कपङे के बगल में सी कर इजाजत दे दिया और उन्होने दुआ के साथ साथ नसीहत भी कीं कि झूट ना बोलना , मैं एक क़ाफिले के साथ बगदाद को रवाना हो गया हमदान से क़ाफिला गुज़र चुका तो 60डाकुओं ने क़ाफिले के उपर हमला कर दिया और सामान को लूटने लगे मगर मेरी तरफ किसी ने भी ध्यान ना दिया अचानक एक डाकू मेरे पास आकर पूछा ऐ फक़ीर तेरे पास क्या है मैने कहा 40 दिनार मेरे कपङों में सिले हुए हैं, लेकिन उसे यक़ीन ना आया और वह चला गया एक और डाकू ने वही सवाल किया मैने वही जवाब दिया वह भी चला गया दोनो ने अपने सरदार के पास जाकर वही माजरा बयान किया सरदार ने भी वही सवाल किया और मैने वही जवाब दिया, मेरा कपङा फाङकर देखा तो 40 दिनार पाकर डाकू के सरदार ने कहा कि तुमने अपने माल को जाहिर क्यु किया? मैने कहा कि मेरी मां ने झूट बोलने से मना किया था,यह सूनकर चोरों के सरदार ने रोना शुरू कर दिया और मेरे हाथ पर अपने साथियों के साथ तौबा कर ली और छीना हुआ सामान वापस दे दिया(مرآۃالاسرار ص563/564)
डाकुओं के सरदार का नाम अहमद बदवी था। (تذکرہ مشائخ عظام ص190)
रेयाज़त और मुजाहिदात::
जब आप बगदाद में 488ھ में शिक्षा के लिए आए तो उसी समय से तसव्वुफ की जानिब ध्यान और तप जारी था सुन सान जगहों में जाकर ज़िक्र व अज़कार में लगे रहते सबक (कलास) के बाद जंगल की तरफ निकल जाते दिन हो या रात आंधी हो या बारिश हर चीज़ से ला परवाह हो कर जंगलों में फिरते रहते सर पे छोटा सा अमामा (पगङी) होता, नंगे पैर कांटो और पथरीली ज़मीन पर चलते रहते दरिया-ए-दजला के किनारे साग या दुसरी तरकारियां खा लेते गरज़ेकि गौस-ए-आज़म के उपर जो भी मुसीबत पङती उसे बरदाश्त कर लेते।
खुद फरमाते हैं कि इल्मे शरीयत (धर्म ज्ञान) पुर्ण करने के बाद पूरे तौर पर सोलूक तसव्वफ की तरफ मुंह मोङ लिया और बगदाद के सब से बङे शैख तरीक़त हज़रत अबुल ख़ैर हम्माद बिन मुस्लिम दब्बास رحمۃاللہ علیہ से तरीक़त व माअरेफत का ज्ञान प्राप्त किया और जब ज़ौक़ बढता गया तो विरानो जंगलों का रुख अपना कर अपने आप को तरह तरह की रियाज़तों और मुशक्कतों में डाला,
आप रहमतुल्लाह अलैह फरमाते हैं कि नफ्स अपने इच्छा अनुसार मुझपे कभी हावी नही हुआ और ना ही दुनिया की सुन्दरता ने मुझे आकरसित किया

:: बैअ़त और ख़ेलाफता ::
नफ्स की सफाई के बाद किसी पीर कामिल की आरज़ू पैदा हुई और शैख अबू सईद मुबारक मख़ज़ूमी رحمۃاللہ علیہ से बैअ़त और खेलाफत लेने के बाद तरीकत व सोलूक के रोसूम सीखीं, इस के अलावा शैख़ मुहम्मद बिन मुस्लिम-उल-अयास से भी तसव्वफ व माअरेफत हासिल की, (تذکرہ مشائخ عظام ص192)

:: मुतफर्रिक़ात ::
आप ने कोई नया मदरसा नहीं खोला बल्कि अपने उस्ताद शैख अबू सईद मुबारक मख़ज़ूमी رحمۃاللہ علیہ के मदरसे ही में लोगों को इल्म के नूर से मनव्वर करते रहे,
हज़रत गौस़-ए-आज़म इर्शाद फरमाते हैं कि शुरू ज़माना में मैंने नबी अलैहिस्सलाम और हज़रत अली रज़ियल्लाहु अन्हु को ख़्वाब (सपने) में देखा कि मुझे वाज़ (पर्वचन) कहने का हुक्म फरमा रहे हैं और मेरे मुंह में अपना लुआबे दहन (मुंह का थूक) डाला , बस उस का असर यह हुआ कि मेरे लिए वाज़ (पर्वचन) कहने की बङी उप्लब्धी मिल गई,
आप की मजलिस (बैठकी) में कुल अवलिया व अम्बिया, हयात व अजसाद और अमवात अरवाह के साथ जिन और फरिश्ते हाज़िर होते थे खिज्र अलैहिस्सलाम तो कभी कभी मजलिस (बैठकी) में शरीक होते थे और वक़्त के मशाएख को मजलिस (बैठकी) में आने की दावत देते थे और कहते कि जिसे कामियाबी चाहिए वह शैख गौसे आज़म की मजलिस की नोकरी को जरूरी जान ले।

:: इन्तेक़ाल  (मृत्यू) ::
आप का वेसाल (मृत्यू) 27 शअबान सोमवार को 513 हिजरी में बद़दाद शरीफ में हुआ, मगर कुछ लोगों नें 4 शअबान, 10 मुहर्रम, 7 शअबान,508हिजरी भी लिखा है,
आप का मज़ार मुबारक बगदाद शरीफ मेंआप के मदरसे के बाबुल अजज़ में है।(سیرت غوث اعظم ص67)

::बीवियां और औलादें ::
गौसे आज़म रजियाल्लाहु अन्हु ने 51 साल की उम्र में शादी की,वह भी अल्लाह की रेज़ा के लिए आप ने फरमाया कि बहुत ज़माना से नबी अलैहिस्सलाम की सुन्नत के लिए निकाह की ख्वाहिश रखता था मगर यह सोच कर हिम्मत नही जुटा पाता कि कहीं शादी मेरी इबादत में रुकावट की वजह ना बन जाए मगर अल्लाह ने हर काम होने का एक समय मुक़र्रर कर रखा है लिहाज़ा जब वह समय आया तो अल्लाह के करम से मेरी शादी हो गई और अल्लाह ने 4बीवियां दीं और उन में से हर एक मुझ से मुहब्बत रखती थी (سیرت غوث اعظم247)
औलाद-:
हजरत शैख अब्दुल क़ादिर जिलानीرحمۃ اللہ علیہ की बहुत औलाद थे चुंकि आप की 4 बीवियां थीं इस लिए उन्ही से बहुत से बेटे और बेटियां पैदा हुईं, कहा जाता है कि आप के कुल 49 औलादें हुईं इतनी औलादें होने के बावजूद उन का पालन पोषण बहुत अच्छे तरीक़े से किए,
गौसे आज़म رضی اللہ تعالی عنہ फरमाते हैं कि जब मेरे घर कोई बच्चा पैदा होता है तो मैं उसे अपने हाथों में लेता हूं और यह कह कर कि वह मुर्दा है, फिर अगर वह मर भी जाता है तो मुझे उस की मौत से कोई रंज गम नही होता,
आप की औलादों में से कई इल्म के समुन्दर निकले। (سیرت غوث اعظم248)
आप के जिन बेटों का नाम सिरत व सवानेह की किताबों मे मिलता है उन के नाम यह हैं,
1-हज़रत सयदोना सैफुद्दीन अब्दुल वहाब जिलानी
2- हज़रत शैख़ शरफुद्दीन ईसा जिलानी
3- हज़रत शैख़ सेराजुद्दीन अब्दुल जब्बार
4- हज़रत शैख़ शमसुद्दीन अब्दुल अज़ीज़
5- हज़रत शैख़ अबू इस्हाक़ इब्राहीम
6- हज़रत शैख़ अबूल फज़्ल सय्यद मुहम्मद
7- हज़रत शैख़ अबू अब्दुर्रहमान सय्यद अब्दुल्लाह
8- हज़रत शैख़ ज़्याउद्दीन अबू नसर मुसा
9- हज़रत अबू ज़कर यहया
10- हज़रत शैख़ अबू अब्दुल्लाह अली
11- हज़रत शैख़ अबू बकर ताजुद्दीन अब्दुर्रज़ाक
मनाक़िबे गौसिया किताब में निम्न नाम और हैं
12- हज़रत शैख़ सय्यद यूसुफ
13- हज़रत शैख़ सय्यद अबू सॉलेह
14- हज़रत शैख़ सय्यद अब्दुल गफ्फार
15- हज़रत शैख़ सय्यद हबीबुल्लाह
16- हज़रत शैख़ सय्यद ज़ाहिद
17- हज़रत शैख़ सय्यद मंसूर
18- हज़रत शैख़ सय्यद अब्दुल ख़ालिक़
19- हज़रत शैख़ सय्यद अब्दुर्रउफ
20- हज़रत शैख़ सय्यद मज़दुद्दीन
तफरीहुल ख़ातिर नामी किताब में दो नाम और है,
21- हज़रत शैख़ सय्यद अब्दुल ग़नी
22- हज़रत शैख़ सय्यद अब्दुल गफूर  رحمھم اللہ تعالی علیھم اجمعین  (تذکرہ مشائخ عظام ص 170)

:: आप की करामात ::
गौसे पाक رحمۃ اللہ علیہ के पास उमर बिन सॉलेह अपनी उंटनी लेकर आया और उस ने कहा कि मेरा हज का इरादा है और मेरी इकलौती उंटनी चल नही सकती पस आप رحمۃ اللہ علیہ ने उस को एक उंगली लगाई और और उस की पेशानी (माथा) पर अपना हाथ रखा वह कहता था कि उस की हालत यह थी कि तमाम सवारियों से आगे चलती थी ।
गौसे पाक رحمۃ اللہ علیہ के पास अबुल मोआली आए और कहने लगे कि मेरे बेटे मुहम्मद को 15 महीने से बोखार आ रहा है, गौसे पाक رحمۃ اللہ علیہ ने फरमाया कि जाओ और उस के कान में कह दो ऐ उम्मे मुल्दुम तुम से अब्दुल क़ादिर फरमाते हैं कि मेरो बेटे से निकल कर हुल्ला की तरफ चले जाओ, यह कहने के बाद फिर कभी बुख़ार उन्हे हुआ ही नहीं। (غوث پاک کے حالات ص 50-51)
و آخر دعوان الحمد لللہ رب العالمین
जमा,तरतीब, तसहील,
 नेयाज़ अहमद निज़ामी 

Monday, June 26, 2017

::शव्वाल के छ:(6) रोज़े:: अज़: नेयाज़ अहमद निज़ामी



हदीस::
عَنْ أَبِي أَيُّوبَ الْأَنْصَارِيِّ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ قَالَ: "مَنْ صَامَ رَمَضَانَ ثُمَّ أَتْبَعَهُ سِتًّا مِنْ شَوَّالٍ كَانَ كَصِيَامِ الدَّهْرِ"

तर्जुमा: हज़रत अबू अय्यूब رضی اللہ عنہसे रेवायत है कि रसूलुल्लाह ﷺ ने फरमाया: "जिसने रमज़ान के रोज़े रखे फिर उस के बाद छ: रोज़े शव्वाल के रख लिए तो उस ने गोया हमेशा रोज़े रखे (मुस्लिम) ।
(ریاض الصالحین جلد دوم ص 120)

हदीस:: रसूलुल्लाह ﷺ ने फरमाया: जिस ने ईद उस फित्र के बाद छ:रोजे़ रख लिए  तो उसने पूरे साल का रोज़ा रखा , वह इस तरह कि "जो एक नेकी लाएगा उसे दस मिलेंगी तो रमज़ान के महीने का रोज़ा 10महीने के बराबर है और इन छ: दिनों के बदले में दो महीने„ तो पूरे साल  के के रोज़े हो गए।

हदीस:: अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ियल्लाहु अन्हुमा रावी कि रसूलुल्लाह ﷺ फरमाते हैं: जिस ने रमज़ान के रोज़े रखे फिर उस के बाद छ:दिन शव्वाल में रखे तो गुनाहों से ऐसे निकल गया, जैसे आज मां के पेट से पैदा हुआ है।
(بہار شریعت ج اول ص 1010)

नोट: बेहतर यह है कि यह रोज़े अलग अलग रखे जाएं ,और अगर ईद के बाद लगातार छ: दिन में एक साथ रख लिए तब भी कोई बात नही (حاشیہ بہار شریعت ج اول ص 1010)


तालीफ        
 Neyaz Ahmad Nizami



Tuesday, June 13, 2017

एअ़तेकाफ का बयान: नेयाज़ अहमद निज़ामी




::एअ़तेकाफ का कुरआन से सोबूत::
अल्लाह तआला फरमाता है:
وَلا تُباشِروهُنَّ وَأَنتُم عاكِفونَ فِي المَساجِدِ (پ2، س البقرۃ:187)

तर्जुमा: औरतों को हाथ ना लगाओ जब तुम मस्जिदों में एअतेकाफ से हो। (कन्ज़ुल ईमान)

::एअ़तेकाफ का हदीस से सोबूत::
हदीस: हज़रते आईशा सिद्दीक़ा رضی اللہ عنھاसे मरवी है कि नबी करीम ﷺ रमज़ान के आखरी अशरा (अन्तिम 10दिन) का एअतेकाफ फरमाया करते थे।
 (صراط الجنان و بہار شریعت بحوالہ بخاری و مسلم)

हदीस: हज़रत अनस रज़ियल्लाहु अन्हु फरमाते हैं कि मुहम्मदे अरबी ﷺ रमज़ान के आख़री अशरा (अन्तिम 10दिन) में एअतेकाफ करते थे, एक साल एअतेकाफ ना कर सके, जब अगला साल आया तो होजूर अनवर ﷺ ने 20 दिन एअतेकाफ किया।
 (ترمذی، کتاب الصوم، حدیث 803)


::एअतेकाफ की फज़ीलत::

दो हज और दो उमरों का सवाब:
हदीस: हज़रत अली رضی اللہ عنہ से रिवायत है कि सय्यदुल मुर्सलीन ﷺ ने इर्शाद फरमाया "जिस ने रमज़ान में 10 दिन का एअतेकाफ कर लिया तो ऐसा है जैसे दो हज और दो उमरे किए„।
(صراط الجنان جلد اول ص 301)
नोट: यही हदीस हज़रत इमाम हुसैन رضی اللہ عنہ से भी मरवी है (बहारे शरीयत जिल्द1 हिस्सा5 पेज 1020)
【दो हज और दो उमरों का सवाब】


ना कर सकने वाले नेकियों का सवाब:
हदीस: हज़रत अ़ब्दुल्लाह इब्न अ़ब्बास रज़ियल्लाहु अन्हु फरमाते हैं कि नबी करीम रउफो रहीम ﷺ ने एअतेकाफ करने वाले के बारे में फरमाया कि "वह गुनाहों से बाज़ (बचा) रहता है और नेकियों से उसे इस क़दर स़वाब मिलता है जैसे उसने तमाम नेकियां कीं।
यानी जो नेकियां वह एअतेकाफ की वजह से नहीं कर पाता है जैसे मरीज़ को देखने जाना, जनाज़े में शरीक़ होना, आदि उस का भी सवाब उसे मिलता है: नेयाज़ अहमद निज़ामी
(صراطالجنان ج اول ص 301 بحولہ ابن ماجہ)

जहन्नम से 3ख़न्दक़ें दूर:
हदीस: हज़रत अ़ब्दुल्लाह इब्न अ़ब्बास रज़ियल्लाहु अन्हु फरमाते हैं कि  प्यारे आक़ा ﷺ ने फरमाया: जिस ने अल्लाह ﷻ की रज़ा हासिल करने के लिए एक दिन का एअतेकाफ किया तो आल्लाह ﷻ उस के और जहन्नम के बीच तीन खन्दक़ें ला देगा और हर खन्दक़ पूरब और पश्चिम के इतनी दूरी होगी।
(صراطالجنان ج اول ص 301 بحولہ ابن ماجہ)

हर दिन हज का सवाब::
सईद बिन अब्दुल अ़ज़ीज़ फरमाते हैं कि मुझ तक हज़रत हसन बसरी رضی اللہ عنہ से  यह रिवायत पहुंची है कि मुअतकिफ (एअतेकाफ करने वाला) के लिए हर दिन में हज का सवाब है,
 (احکام تراویح و اعتکاف118)
हर दिन हज का सवाब::

::एअतेकाफ का शाब्दिक व धार्मिक मतलब(अर्थ)::

एअतेकाफ अरबी शब्द है जिस का अर्थ है ख़ुद को रोक लेना, बन्द कर देना, किसी की तरफ इतना ध्यान देना की चेहरा उस तरफ से ना हटे, (لسان العرب)
जबकि शरियत में "मस्जिद  में  अल्लाह ﷻ के लिए नियत के साथ ठहरना" एअतेकाफ कहलाता है,
(بہار شریعت پنجم ص 1020)

::एअतेकाफ के मसाईल::

मसअला: एअतेकाफ के लिए मुसलमान, आक़िल (अक़लवाला) और नापाकी,हैज़ (माहवारी) नेफास से पाक होना शर्त है,
बालिग़ होना शर्त नहीं बल्कि नाबालिग जिसे तमीज़ हो वह भी एअतेकाफ की नियत से मस्जिद में रुके तो सही है, (आलम गीरी)

मसअला: जामा मस्जिद होना एअ़तेकाफ के लिए ज़रूरी नही बल्कि  मस्जिदे जमाअत में भी हो सकता है,
मस्जिदे जमाअत वह है: जिस में इमाम और अज़ान देने वाले मुकर्रर हों,भले ही पांचो समय जमाअत ना होती हो, और आसानी इस में है कि हर मस्जिद में एअतेकाफ सही है अगरचे वह मस्जिदे जमाअत न हो,

मसअला:  सब से अफज़ल (अच्छा) मस्जिदे हरम में एअतकाफ है, फिर मस्जिदे नबवी में फिर मस्जिदे ला:अक्सा में फिर उस में जहां बङी जमाअत होती हो।

एअतेकाफ की तीन क़िस्में हैं:
(1) वाजिब , कि एअतेकाफ की मन्नत मानी यानी  ज़ुबान से कहा,महज़ दिल के एरादा से नही होगा।

(2) सुन्नते मुअक्केदा, कि रमज़ान के पूरे आखरी 10दिन में एअतेकाफ किया जाए यानी बीसवीं रमज़ान को सूरज डूबते समय एअतेकाफ की नियत से मस्जिद में हो और तीसवीं रमज़ान को सूरज के डूबने के बाद या उन्तीसवीं को चांद होने के बाद निकले, अगर बीसवीं तारीख को मगरीब की नमाज के बाद एअतेकाफ की नियत की तो सुन्नते मुअक्केदा अदा ना हूई, और यह एअतेकाफ "सुन्नते केफाया„ है कि अगर अगर सब छोङ देंगे तो सबसे पूछ होगी और अगर शहर में एक ने भी कर लिया तो सबकी ज़िम्मादारी ख़त्म हो जाएगी।

(3) इन दो के अलावा जो एअतेकाफ किया जाए मुस्तहब और सुन्नते ग़ैर मुअक्केदा है।।

मसअला: एअतेकाफे मुस्तहब और सुन्नत के लिए रोज़ा शर्त नही है और ना ही कोई खास समय रखा गया है ,बल्कि जब भी मस्जिद में एअतेकाफ की नियत की, जब तक मस्जिद में है मुअतकिफ है,मस्जिद से बाहर निकल आया एअतेकाफ ख़त्म हो गया (आलमगीरी)।

मसअला: रमज़ान शरीफ के आखरी 10दिनें में जो एअतेकाफ रखा जाता है उस में रोज़ा शर्त यानी ज़रूरी है,

मसअला: यह ज़रूरी नहीं कि खास एअतेकाफ ही के लिए रोज़ा हो बल्कि रमज़ान के रोज़े भी मुअतकिफ के लिए काफी हैं।

मसअला: मुअतकिफ का बेगैर किसी वजह के मस्जिद से निकलने पर एअतेकाफ जाता रहता है,

मसअला: मुअतकिफ ना चुप रहे , ना बात करे तो क्या करे,कुरआन मजीद की तिलावत करे हदीस फढे,दोरूद पढे, इल्में दीन का सीखना सिखाना, इस्लामी किताबों को पढे,या किताबत (कम्पोज़िंग) करे।

मसअला: मुअतकिफ (एअतेकाफ करने वाला) को मस्जिद से निकलने की दो वजहें हैं
(1) हाजते तबई' कि मस्जिद में पूरी ना हो सके जैसे, पाखाना, पेशाब, इस्तिंजा, वज़ू और ग़ुस्ल की ज़रूरत हो तो  गुस्ल (स्नान), मगर गुस्ल और वज़ू में शर्त यह है कि मस्जिद में ना हो सकें, और अगर मस्जिद में वज़ू और ग़ुस्ल के लिए जगह बनी है तो अब बाहर जाने की इजाज़त नही,

(2) हाजते शरई ईद या जुमा के लिए जाना,

मसअला: क़ज़ाए हाजत (शौच) के लिए गया तो तहारत (स्वछ) कर के तुरंत चला आए रुकने की इजाज़त नही,

मसअला: मुअतकिफ का मकान मस्जिद से दूर है और दोस्त का मकान क़रीब तो यह ज़रूरी नही कि दोस्त के मकान पे  क़ज़ाए हाजत (शौच) को जाए,बल्कि अपने मकान पर भी जा सकता है,

मसअला: अगर वह मस्जिद गिर गई  या किसी ने मजबूर करके वहां से निकाल दिया  और फौरन दूसरी मस्जिद में चला गया तो एअतेकाफ फासिद (टूटा) नहीं हुआ,

मसअला: डूबने या जलने वाले के बचाने के लिए मस्जिद से बाहर निकला या गवाही देने के लिए या जेहाद में सब लोगों का बुलावा आया और यह भी निकल गया, या मरीज़ की एआदत या नमाजे जनाज़ा के लिए गया, अगर्चे कोई दूसरा पढने वाला ना हो तो इन सब वजहों की हालत में एअतेकाफ टूट जाता है।

मसअला: पाखाना, पेशाब के लिए गया था  क़र्ज़ ख्वाह ने रोक लिया एअंतेकाफ टूट गया।

मसअला: औरत को छूना बोसा लेना वती (हमबिस्तरी) करना मुअतकीफीन के लिए हराम है।

मसअला: एहतेलाम (स्वप्नदोष) होने से एअतेकाफ टूट गया,

मसअला:  मुअतकिफ के गाली गलूच बकने या झगङा करने से एअतेकाफ टूटता नही।

मसअला:  मुअतकिफ मसजिद ही में खाए पीए सोए,अगर इस काम के लिए मस्जिद से  बाहर गया तो एअतेकाफ जाता रहा।

मसअला:  मुअतकिफ के अलावा और किसी को भी मस्जिद में खाने पीने सोने की इजाज़त नही, और अगर यह काम करना चाहे तो  एअतेकाफ की नियत करके मस्जिद में जाए और नमाज़ पढे या ज़िकरे इलाही करे,फिर यह काम कर सकता है।
(ماخوز از: بہار شریعت)

 तालीफ        
 Neyaz Ahmad Nizami