neyaz ahmad nizami

Friday, February 22, 2019

क़ूतुब मदार की शिक्षा [नेयाज़ अहमद]





ज़िंदा शाह मदार رَحمَةُ اللّٰه عَلَيه ऐसे फकीरों में से हैं कि पूरी दुनिया में आप की कोई मिस़ाल नही मिलती है, और ना ही आप के जीवन की कोई मिस़ाल मिल सकती है क्युंकि आप ऐसा समुंदर थे जिस का कोई किनारा नही था, और इंसानी ताकत से बाहर है कि आप की 600 वर्ष के जीवन को लीखित ला सके,मगर कुछ यहा लिख देता हूं ताकि जन मानस फायदा प्राप्त करते रहें।

• हर इंसान के पास एक ही दिल है फिर उस में दुनिया और आख़ेरत की एक ही तरह मुहब्बत कैसे संभव है।

History of baba madar

• अल्लाह से तौबा (क्षमा) मांगिए और उसी पर डटे रहिए क्युंकि शान तौबा (क्षमा) करने में नहीं तौबा (क्षमा) पर डटे रहने में है।

• ईमान (ایمان/Faith) की जङ तौहीद (एक खुदा) और एखलास पर क़ायम है  तौहीद एखलास के ज़रिए अपने अमल की बुनियाद को मज़बूत कीजिए।

•आप के अमल (कर्म) आप के अकीदे (Beliefs) को ज़ाहिर करते हैं और आप के ज़ाहिर आप के बातिन (अंतरात्मा) की निशानी है।

• आप अपने तमाम मामलों में होजूर ُصَلَّی اللّٰه عَلَيْهِ وَسَلَّم के समीप खङे हो जाएं और आदेश व पैरवी के लिए तयार रहें।
                   [Madar Baba]

• अगर दिल सादर सत्कार वाला बन जाए तो जिस्म के सभी हिस्से सादर सत्कार वाले हो जाएंगे।

• बे गैर अमल इल्म (ज्ञान) की कोई हैसियत नही है वह आखेरत में कोई फायदा नही दे सकता।

• सूफी वह है जो अपने पसंदीदी चीज़ को छोङ दे और अल्लाह के अलावा किसी के साथ  भी सुकून से ना रहे।
            
       [History Of Madar]

• आप ने कहा कि
  الفقر نور من انوار الله والغناء غضب من اغضاب الله
यानी गरीबी अल्लाह के नूर में से एक नूर है और अमीरी (मालदारी) अल्लाह के गज़ब में से एक ग़ज़ब है।
(नोट: अमीरी से मतलब दुनिया के माल दौलत की मुहब्बत है)
(تاريخ سلاطين و صوفياء جونپور1439/1440)


Neyaz Ahmad Nizami


ओहुद पहाङ से ज़्यादा सवाब {(पुन्य} नेयाज़ अहमद निज़ामी




ताजदार-ए-मदीना ﷺ ने एक बार इर्शाद फरमाया क्या तुम में से कोई ऐसा नही है जो रोज़ाना ओहुद पहाङ के बराबर नेकी (पुन्य) कर लिया करे?
सहाबा ने कहा: आकाﷺ इस की ताक़त कौन रखता है?
फरमाया: हर एक इस की ताक़त रखता है,
अर्ज़ किया: सरकार ﷺ कैसे?
फरमाया सुब्हानल्लाह (سُبْحَانَ اللّٰه) का स़वाब (पुन्य) ओह़ुद से बढ कर है 
ला इलाहा इल्लल्लाह (ُلَااِلٰه اِلَّا اللّٰه ) का स़वाब (पुन्य) ओह़ुद से बढ कर है। 
अल्लाहु अकबर (اللّٰهُ اَکْبَر) का स़वाब (पुन्य) ओह़ुद से बढ कर है। 
अल्हम्दुलिल्लाह (الْحَمْدُلِللّٰهُ ) का स़वाब (पुन्य) ओह़ुद से बढ कर है।

ohud pahad


::ओह़ुद पहाङ एक परिचय::
ओह़ुद पहाङ  मदीना शरीफ के पास है,इसी जगह जंग-ए-ओहुद भी हुइ थी, यह पहाङ जन्नत (स्वर्ग) में भी जाएगा, इस की चौङाई लगभग पौने चार मील है,

हो सके तो रोज़ाना यह तीन वाक़्य ज़रूर कह लिया करें,
(1)अल्लाहु अकबर (اللّٰهُ اَکْبَر)  10 बार, (2) सुब्हानल्लाह سُبْحَانَ اللّٰه) 10) बार (3)अल्लाहुम्मग़्फिरली اَلّٰھُمَّ الغْفِرْلِی) 10बार।
(فیضان سنت ذکر کی فضیلت ص120 اسلامک پبلشر)

नेयाज़ अहमद निज़ामी




Tuesday, February 19, 2019

हज़रत सय्यद बदीउद्दीन (ज़िन्दा शाह मदार): नेयाज़ अहमद निज़ामी


सय्यद बदीउद्दीन क़ूतुब मदार (शाह मदार)  رحمۃ اللّٰه عليه


सय्यद बदीउद्दीन क़ूतुब मदार (ज़िंदा शाह मदार) رحمۃ اللّٰه عليه सूफी बजुर्ग हैं जिन्हे भारत नेपाल में मदार बाबा के नाम से जानते हैं,
कुछ लोगों से इन के बारे में पूछने पर बताने से स्मर्थ रहे तो सोचा कि क्यूं ना इन के बारे में एक संक्षिप्त परिचय लिखा जाए जिस से जन मानस को इन के बारे में जानकारी मिले।

:: जन्म एंव खानदान ::

तज़केरतुल मुत्तकीन किबात में है कि,
پس حضرت شاہ کونین حسنی و حسینی از سادات جعفریہ اند  و در شہر حلب ملک شام بروز دو شنبہ بوقت صبح صادق یکم شوال سنہ چہارصد وچہل و دو ہجرۃالنبیﷺ خانہ حضرت قدوۃالدین سید علی حلبی را از فیض مقدم منور و پرنور فرمودند (تذکرۃالمتَّقِین ص 4


खुलासा: हज़रत सय्यद बदीउद्दीन क़ूतुब मदार (ज़िंदा शाह मदार) رحمۃ اللّٰه عليه मुल्के शाम (सीरिया/syriya) के शहर हलब में 1 शव्वाल (इस्लामी महीना का नाम) 242ھ को सुब्ह के समय पैदा हुए,आप के पीता श्री का नाम क़ाज़ी सय्यद अली हल्बी था, आप बनी फातेमा के सादात (सय्यदों) में से थे,

आप के पीता की तरफ से खानदानी सिलसिला यूं है,
सय्यद बदीउद्दीन बिन सय्यद अली हल्बी बिन सय्यद बहाउद्दीन बिन सय्यद ज़हूरुद्दीन बिन सय्यद अहमद बिन सय्यद इस्माईल बिन सय्यद मुहम्मद बिन सय्यद  इस्माईल सानी बिन सय्यद इमाम जाफर सादिक़ बिन सय्यद मुहम्मद बाक़र बिन सय्यद इमाम ज़ैनुलआबेदीन बिन सय्यद इमाम हुसैन शहीदे करबला बिन अ़ली رضي اللّٰه عنھم اجمعين

आप की माता की तरफ से खानदानी सिलसिला यूं है,
हज़रत सय्यद बदीउद्दीन क़ूतुब मदार رحمۃاللّٰه عليه की माता,फातेमा सानी बिन्त सय्यद अब्दुल्ला बिन सय्यद ज़ाहिद बिन सय्यद मुहम्मद बिन सय्यद आ़बिद बिन सय्यद सॉलेह बिन सय्यद अबू यूसुफ बिन सय्यद अबुल क़ासिम मुहम्मद बिन सय्यद अब्दुल्लाह बिन हसन मुसन्ना बिन सय्यदना इमाम हसन बिन सय्यदना इमाम अली मुर्तुज़ा बिन अबी तालिब,
(تاریخ سلاطین و صوفیاء جونپور ص 1377/1378)

MADAR BABA

:: पीरी एंव मुरीदी ::
हज़रत सय्यद बदीउद्दीन ज़िन्दा शाह मदार को ज़ाहिर में पीरी एंव मुरीदी हज़रत तैफूर शामी उर्फ बायज़ीद बुस्तामी से प्राप्त हुयी। और यह सिलसिला यूं है,

“सय्यद बदीउद्दीन क़ूतुब मदार (ज़िंदा शाह मदार) رحمۃ اللّٰه عليه, हज़रत शैख़ बा यज़ीद बुस्तामी, हज़रत ख़्वाजा हबीब अ़जमी, हज़रत ख़्वाजा हसन बसरी, हज़रत सय्येदुना अली  رضی اللّٰه عنہ، हज़रत मुहम्मद ﷺ„
हज़रत क़ूतुब मदार (ज़िंदा शाह मदार) رحمۃ اللّٰه عليه को बेगैर किसी वास्ता के होज़ूर ﷺ से फैज (फायेदा) पहुंचा है, एक बार हज़रत क़ाजी महमूद कंतूरी ने हज़रत ज़िंदा शाह मदार رحمۃ االلّٰه عليه से कहा कि अपना सिलसिला मुझे तहरीर करा दीजिए, तो आप ने कहा:
اُكْتُبْ اِسْمَكَ ثُمَّ اِسْمِي ثُمَّ اِسْمَ رَسُوْلِ اللّٰه ﷺ
तर्जुमा: अपना नाम लिख फिर मेरा फिर होज़ूर ﷺ का (اخبارالاصفیاء ص54)

ख़ूबी:
तमाम इतिहासकार आप के बारे मे लिखते हैं कि आप कुछ खाते पीते ना थे और आप का कपङा ही मैला ना होता था, और ना ही मख्यिां उन पर बैठती थीं,और चेहरे पर नूर (प्रकाश) इतना कि हमेशा चेहरा ढांप कर रखते थे,जैसा कि “मदार-ए-आज़म„ नामी किताब में है कि हज़रत शाह मदार जब “हज़रत बा यज़ीद बुस्तामी„ की सेवा मे पहुंचे तो हज़रत ने «हब्स-ए-दम» का ज्ञान दिया जिस से आप सालों साल तक खाने पीने की इच्छा ना होती थी, (مدار اعظم اردو 34-34)


:: हज़रत स0 बदीउद्दीन शाह मदार رحمۃ اللّٰه عليه का मक़ाम व मर्तबा::
आप ने तमाम दुनिया का पैदल यात्रा किया और बङे बङे फक़ीरों और संतों से मुलाक़ात की और बहुत से लोगों ने आप से रूहानी (अंतरात्मिक) फायदा प्राप्त किया, क्यूंकि आप अपने वक़्त के क़ूतुब-उल-मदार थे इसी लिए आप को आज भी “ज़िन्दा शाह मदार„ कहते हैं,

:: क़ूतुब-उल-मदार,शाह मदार,या मदारिया बाबा 
क्यूं कहते हैं?::
जब विलायत का मर्तबा (पोस्ट) प्राप्त होता है तो उस को “वली„ कहते हैं, फिर जब तरक्की होती है तो “अब्दाल„ का मर्तबा हासिल (प्राप्त) होता है, फिर “औताद„ का फिर “क़ूतुब-उल-अक़्ताब„ का फिर “क़ूतुब-उल-मदार„ का यह सब सरकार दोआलम ﷺ की उस खास इनायत और तवज्जो का नतीजा (प्रिणाम) था जो हज़रत शाह मदार के साथ थी।
क़ूतुब-उल-मदार नबी ﷺ के बरकत वाले दिल से फायेदा प्राप्त करता है और उस का फैज (साया/असर) तमाम “अलवी और सिफली„ दुनिया पर होता है, और 12क़ूतुब उन के हुक्म के ताबेअ़ (अंडर) में होते हैं, क़ूतुब-ए-मदार का नाम “अब्दुल्लाह„ होता है और सातों आसमान के उपर से लेकर सातों ज़मीन के निचे तक की दुनिय उस की नज़र में रहती है, (مدار اعظم ص53)
«आप के मदार नाम के बारे में जो मशहूर है कि मदार का दूध पीने की वजह से मदार नाम जुङा यह गलत है نیاز احمد»

हज़रत शाह सय्यद ग़ुलाम अली मुजद्दीदी नक़्श बंदी ने फरमाया है कि:
حضرت سید بدیع الدین قطب مدار قُدِّس سِرَّہ قطب مدار بودند و شان عظیم دارند و ایشاں دعائے کردہ بودند کہ الٰہی مُرا گُرسَنگی نہ شود و لباسِ من کُہنہ نہ گَردند و لباسِ ایشاں کہنہ نگشت ہمو وے یک لباس تا بہ ممات کفایت کرد.
तर्जुमा: हज़रत हज़रत स0 बदीउद्दीन ज़िन्दा शाह मदार رحمۃ اللّٰه عليه अपने समय में क़ूतुब-ए-मदार थे और बहुत उंचा मर्तबा रखते थे और उन्होने अपने लिए दोआ फरमाई थी कि “ऐ अल्लाह! मुझे भूक और प्यास ना लगे और मेरा कपङा कभी मैला और पूराना ना हो और ना फटे„  और ऐसा ही हुआ कि इस दुआ के बाद तमाम जीवन खाना नही खाया और कपङा पूराना नही हुआ और एक ही कपङा मौत के वक्त तक बदन मुबारक पर पङा रहा। (مدارالامعارف ص 253)
मज़ार ज़िंदा शाह मदार

:: भारत में आगमन ::
अपने भाई सय्यद “अब्दुल्लाह„ के तीनों बेटों 🕕हज़रत ख़्वाजा सय्यद मुहम्मद अर्ग़ोन हज़रत ख़्वाजा सय्यद अबू तोराब कन्सूरी और हज़रत ख़्वाजा सय्यद अबुल हसन को सरकार क़ूतुब-उल-मदार अपने साथ हिन्दुस्तान और फिर मकन पूर तशरीफ लाए और वेसाल (देहांत) से पहले इन्ही तीनों जिगर गोशों को कूतुब-ए-मदार ने अपने खलीफा और चेलों के भरे भीङ में अपना सहायक और खलीफा (उत्तराधिकारी) बनाया और उसी समय से इन्ही तीनों ख्वाजों के बीच खलीफा होते चले आ रहे हैं।
दूसरी बार नबी ﷺ की दरबार में हाजरी के बाद हज़रत शाह मदार को स्थाई भारत मे रहने का आदेश मिल गया, और दीन -ए- इस्लाम के पर्चार पर्सार में लग गए,
आप समुंदर से होते हुए एक जंगल में पहुंचे जहां नबी मुहतर जनाब मुहम्मद ﷺ से मुलाकात हुई आप ने बैअत की और होजूर ﷺ ने अपने हाथों से 9 लुक़्मे खिलाए और वह जन्नती कपङा पहना  जो जीवन भर के लिए काफी हो गया।और आप ने तमाम दुनिया का दौरा किया आप जहां भी पहुंचे आप की निशानियां यादगारें मौजूद हैं, जो आप के आने और धर्म पर्चार पर्सार की निशानियां ब्यान कर रही हैं, कहीं मदार चिल्ला„ मदार दरवाज़ा„ मदार टिकरी„ मदार पहाङी„ मदार गेट„ मदार ढाल„ मदार गंज„ मदार पूर और रौज़ा मदार वगैरह वगैरह हैं। (تاریخ سلاطین و صوفیاء جونپور ص 1431/1432)
MADAR BABA KI JIVANI
:करामत:
1-इसी सिलसिले में आप कंतूर फिर घाटमपूर पहुंचे यहां का राजा ला वल्द (बे औलाद) था आप की दुआ से साहब-ए-औलाद हुआ और इस्लाम लाया।

2- शहर दर शहर दावत-ए-दीन देते हुए “सूरत„ में पहुंचे यहां पर एक नाबीना (अंधा) भीक मांग रहा था हज़रत शाह मदार को रहम आ गया आप ने दुआ किया वह अंधा अंखियारा हो गया ,यहां बहुत से लोग ईमान लाए ।

3- एक दिन आप ने सेवक मुहम्मद यासीन से पानी वजू के लिए मांगा मगर पानी नही मिला फिर आप की करामत से पानी का चश्मा (सोता) नज़र आया जो अब तक ऐसन(ایسن) के नाम सो मश्हूर है। (کتب عامہ)

4- एक जोङा रोता हुआ मदार शाह की बारगाह में पहुंचा कि मेरा एक बच्चा था जो मर गया है अल्लाह से दुआ करिए कि वह जी जाए क्युंकि उस के जीवन में हमारा भी जीवन है इस में कोई संदेह नही कि अल्लाह ने आप को वह ताकत दी है जो चाहें वही हो जाए,हजरत क़ूतुब-ए-मदार उन से बहुत प्रेम का परिचय दिया और बच्चे की लाश के पास पहुंच कर फरमाया (कहा) قُمْ بِاِذنِ اللّٰه यानी अल्लाह के आदेश से उठ वह लङका ला इलाहा इल्लल्ाह  पढता हुआ उठा और कहा कि दुनिया की ज़िन्दगी में कोयी भलाई नहीं, आप आखेरत में भेज दें आप ने फरमाया कि ऐश-ए-दुनिया नेकी व परहेज़गारी के साथ बेहतर है उस मौत से जो बे गैर अमल (कर्म) है ।تاریخ سلاطین و صوفیاء جونپور ص) 1434)

HISTORY OF MADAR BABA

:: इंतेक़ाल (देहांत) ::
हज़रत शाह बदीउद्दीन कूतुब मदार ने फरमाया कि मेरे जनाज़ा की नमाज़ “मौलाना होसामुद्दीन सलामती„ पढेंगे, यह उस समय मौजूद ना थे जौनपूर थे कि यकाएक हज़रत के देहांत का हाल मालूम हुआ, और वहा से चलदिए और यहां हज़रत शाह  मदार साहब ने कमरे का दरवाज़ा बंद कर लिया मौलाना होसामुद्दीन जिस समय मकनपूर हाज़िर हुए हां देखते हैं कि मकान का दरवाज़ा बंद है, उनहोने दस्तक दी तो दरवाज़ा खुल गया देखा तो हज़रत शाह मदार साहब नहलाए और कफनाए हुए मौजूद हैं (यह काम अदृश्य लोगों नें कर दिया था) उस के बाद खादिमों (सेवकों) नें और चारों तरफ से जो लोग हज़रत के इंतेक़ाल की ख़बर सुन के आए थे जनाज़ा उठाया मौलाना होसामुद्दीन सलामती साहब ने जनाज़ा की नमाज़ पढाई उस के बाद पवित्र जिस्म को दफन कर दिया गया।  यह गम मे डूबा हुआ हादेसा 17जमादिल अव्वल 838 हिजरी को हुआ साकिन-ए-बहिश्त (ساکن بہشت) देहांत की तारीख है। (مدار اعظم ص 87-88)

dam madar beda paar


तर्जुमा व तस्हील
Neyaz Ahmad Nizami




Friday, November 2, 2018

शराब और शराबी: लेखक" नेयाज़ अहमद निज़ामी



नशा  पिला के  गिराना तो सब को आता है 
मज़ा तो तब है कि गिरतों को थाम ले साक़ी
                                  अल्लामा इक़बाल

किसी भी तरह का नशा जिस तरह घरेलू जीवन के लिए अभिशाप है, उसी तरह सामाजिक  जीवन को भी श्रापित कर देता है, इस लत से ना केवल एक इन्सान की आर्थिक, व्यवहारिक, व्यापारिक, आदि स्थिती खराब होती है बल्कि घर गृहस्थी पर भी इस का असर पङता दिखाई देता है, जब नशे की लत अपनी चर्म सीमा पर होती है तो उसे इस लत को पुर्ण करने के बदले हर क़ीमत देने को तैयार रहता है, यहां तक कि अपनी ज़मीन, जायदाद, धन, वगैरह के एलावा अपनी अर्धांगिनी,एंव बच्चों को भी लुटाने में हिचकिचाहट महसूस नही करता, जब इस में इतनी बुराईयां हैं तो आइए धार्मिक दृष्टीकोंङ से इस के सत्य असत्य होने में खोज करते हैं, ताकि हम इस बुरी लत से  जहां तक हो सके बचें। [नेयाज़ अहमद]

अल्लाह तआला कुरआन में फरमाता है:

يَآ اَيُّـهَا الَّـذِيْنَ اٰمَنُـوٓا اِنَّمَا الْخَمْرُ وَالْمَيْسِـرُ وَالْاَنْصَابُ وَالْاَزْلَامُ رِجْسٌ مِّنْ عَمَلِ الشَّيْطَانِ فَاجْتَنِبُوْهُ لَعَلَّكُمْ تُفْلِحُوْنَ (90)
اِنَّمَا يُرِيْدُ الشَّيْطَانُ اَنْ يُّوْقِــعَ بَيْنَكُمُ الْعَدَاوَةَ وَالْبَغْضَآءَ فِى الْخَمْرِ وَالْمَيْسِـرِ وَيَصُدَّكُمْ عَنْ ذِكْرِ اللّـٰهِ وَعَنِ الصَّلَاةِ ۖ فَهَلْ اَنْتُـمْ مُّنْتَـهُوْنَ (91)
وَاَطِيْعُوا اللّـٰهَ وَاَطِيْعُوا الرَّسُوْلَ وَاحْذَرُوْا ۚ فَاِنْ تَوَلَّيْتُـمْ فَاعْلَمُوٓا اَنَّمَا عَلٰى رَسُوْلِنَا الْبَلَاغُ الْمُبِيْنُ (92
(سورہ مائدہ آیت نمبر 90-92)

तर्जुमा: ऐ इमान वालो! शराब और जुआ और बुत (मूर्ती) और तीरों से फाल निकालना यह सब नापाकी (अपवित्रता) हैं, शैतान के कामों मे से हैं, इन से बचो ताकि कामयाबी पाओ, शैतान तो यही चाहता है कि शराब और जुएं की वजह से तुम्हारे अन्दर दुश्मनी और बुग़्ज डाल दे और तुम को अल्लाह की याद और नमाज़ से रोक दे तो क्या तुम हो उन से रुकने वाले,
और अताअत (पैरवी) करो अल्लाह की और रसूल की अताअत (पैरवी) करो और परहेज़ (बचो) करो और अगर तुम ने रूगर्दानी (फिरोगे) की तो जान लो कि हमारे रसूल पर सिर्फ साफ तौर पहुंचा देना है(हमारे अहकाम को),
शराब पीना हराम है और इस की वजह से बहुत से गुनाह (पाप) जन्म लेते हैं, अत: इसे पापों और बे हयाईयों की अस्ल (जङ) कहा जाए तो ठीक है,
(بہار شریعت جلد 2 حصہ 9 صفحہ 384)
शराब जो अन गिनत जिस्मानी रूहानी बिमारियों की वजह है भाई चारा और मआशी (आर्थिक) खराबियों की जङ और फितना फसाद की निशानी है इस्लाम के पवित्र कानून में इस की गुंजाइश कैसे हो सकती है  अल्लाह ने इसे सिरे से हराम कर दिया मगर हराम होने का आदेश आहिस्ता  आहिस्ता दऔर भाग भाग कर के दिया ताकि लोगों को इस की पैरवी करना आसान हो जाए, चुनांचे सुरह बकरा में सिर्फ इतना कहा गया,
قُلْ فِيهِمَا إِثْمٌ كَبِيرٌ وَمَنَافِعُ لِلنَّاسِ (سوره البقره 219)
तर्जुमा: इन दोनो (जुआ,शराब) में बङा गुनाह (पाप) है, और लोगों के दुनियवी नफा भी, 

इस के कुछ दिन बाद यह आयत उतरी,
لَا تَقْرَبُوا الصَّلَاةَ وَأَنْتُمْ سُكٰرٰى (النساء آیت 43)
तर्जुमा: नशा की हालत में नमाज़ के पास ना जाओ,
भले शराब के हराम होने का विस्तार से इस में बयान (वर्ण) नही था मगर कई संजीदा तबियत के लोगों नें उसी वक्त ही से शराब छोङ दी थी।
(حاشیہ تفسیر ضیاءالقرآن جلد اول صفحہ 507 )

हदीसों में इस के पीने पर बहुत ही सख्ती से वईदें आई हैं ,कुछ हदीसें यहां लिखी जाती हैं

❶ हदीस-: होजूर ﷺ ने फरमाया (कहा) जो चिज़ ज्यादा मात्रा में नशा लाए, वह थोङी भी हराम (अवैध) है, (جامع الترمذی 1872 )

❷ हदीस-: सही मुस्लिम में जाबिर رضی اللّٰہ عنہ से मरवी कि रसूलुल्लाह ﷺ ने फरमाया (कहा) हर नशा वाली चीज़ हराम है।(صحیح مسلم کتاب الاشربہ)

❸ हदीस-: तारिक़ बिन सोवैद رضی اللّٰہ عنہ ने शराब के बारे में सवाल किया होजूर ﷺ ने मना किया, उन्होने कहा हम तो उसे दवा के लिए बनाते हैं आप ने कहा यह दवा नहीं यह तो खुद एक बिमारी है।
(صحیح مسلم کتاب الاشربہ)


عَنْ أَنَسِ بْنِ مَالِكٍ قَالَ : ( لَعَنَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ فِي الْخَمْرِ عَشْرَةً عَاصِرَهَا وَمُعْتَصِرَهَا وَشَارِبَهَا وَحَامِلَهَا وَالْمَحْمُولَةُ إِلَيْهِ وَسَاقِيَهَا وَبَائِعَهَا وَآكِلَ ثَمَنِهَا وَالْمُشْتَرِي لَهَا وَالْمُشْتَرَاةُ لَهُ ).
❹ हदीस-: अनस बिन मालिक से मरवी कि जो शख्स (आदमी) शराब के लिए शीरा निकाले और जो निकलवाए और जो पिए और जो उठा कर लाए और जिस के पास लाई जाए और जो पिलाए और जो बेचे और जो इस के दाम खाए और जो खरीदे और जिस के लिए खरीदी जाए इन सब पर रसूल ﷺ ने लानत फरमाई।
(فتاوی رضویہ جلددھم صفحہ 47)

❺ हदीस-: रसूल ﷺ ने फरमाया कि शराब से बचो कि वह हर बुराई की कुंजी (चाबी) है।
(المستدرک الحاکم)

::हुक्म::
मुसलमान बालिग अक्लमंद बे गैर मजबूरी शराब की एक बूंद भी पिए तो उस पर हद (सज़ा) है, 
(بہار شریعت جلد 2 حصہ 9 صفحہ389)

उस की सज़ा में 80 कोङे मारे जाएंगे गुलाम को 40 और बदन के अलग अलग हिस्से में मारेंगे,
(بہار شریعت جلد 2 حصہ 9 صفحہ 392)

शराब हराम और पेशाब की तरह नापाक (अपवित्र) और उस का पीना गुनाह-ए-कबीरा (बङा पाप) है पीने वाला फासिक़ फाजिर नापाक बेबाक (निडर) मरदूद है 
सभी नशा लाने वाली चीज़ हराम है:
जितनी चिजे़ं बारीक और सेयाल होकर नशा लाती हैं चाहे वह महुवा से बनाई जाएं या गुङ (भेली) या अनाज या लकङी या किसी बला से वह सब शराब हैं,उन का हर कतरा (बूंद)हराम भी और पेशाब की तरह नजिस व  नापाक (अपवित्र) है
 (فتاوی رضویہ جلد دھم ص 85)

[।।समाप्त।।]

मुरत्तिब,तर्जुमा: व तस्हील
 Neyaz Ahmad Nizami

Monday, October 8, 2018

सूफी सय्यद फख़रूद्दीनرحمةاللّٰه عليه परसौनी बाज़ार : नेयाज़ अहमद निज़ामी,



किसी भी वस्तु का विस्तार, उस की सत्य / असत्य का परिचय होता है, बिना इस के उस का वजूद सम्भव नहीं, जब हम किसी का सम्पूर्ण रूप से परिचय पा लेते हैं तो उस की हैसियत का आंकङा लगाने मे आसानी हो जाती है,
हमारे जिला महाराजगंज यू.पी. के एक गांव, परसौनी बाज़ार में एक महान हस्ती अपनी क़ब्र में विश्राम कर रहे हैं, जिन को उन के मानने (अनुयाईय) वाले फख़रूल औलिया के नाम से जानते हैं,
जिन का उर्स इस्लामी महीना सफर-उल-मुज़फ्फर की 21 तारीख को परसौनी बाज़ार में मनाया जाता है, उन के जीवन के  संक्षिप्त हालात निम्न हैं।(نیاز احمد نظامی)

::वेलादत (जन्म दिन)::
27रजब-उल-मोरज्जब, 1262ھ को सुब्ह सादिक़ के समय ख़लीलपूर उर्फ मियां का पुरवा, अल्लाहाबाद शहर से पश्चिम गंगा के दूसरे पार आप का जन्म हुआ,
पिता श्री मखदूम सुफी सय्यद शाह अब्द-उस-शकूर सोहरवर्दी अपने कमरे में क़ुरआन पढने  में व्यस्त थे, खबर दी गई , आप तशीरफ लाए, अपने पूत्र को गोद में लिया, दाएं कान में अज़ान और बाएं कान मे तकबीर कही, फिर शहादत की उंगली (अनामिका,अंगूठा के बगल वाली उंगली) के जरिए अपना थूक साहबजादे (पूत्र) के मुंह में डाला,

::नामकरण::
और उसी समय “मुहम्मद अहमद„ नाम रखा और इसी नाम पर सातवें दिन अक़ीक़ा भी किया, और बाद में उर्फी नाम “फखरूद्दीन„ रखा और दुनिया इन्हे  “फख्र-उल-औलिया/क़ूतुब-उल-औलिया„ के नाम से जानती है।

::शिक्षा दिक्षा::
पिता श्री सय्यद शाह अब्द-उस-शकूर ने अपने पुत्र फखरूद्दीन की शिक्षा का शुभारंभ कराया, कायदा बगदादी, अम्मा पारा, नाज़रा-ए-कुरआन, और फारसी की शुरूआती किताबों के बाद  नहो(अरबी ग्रामर) सर्फ, फिक्ह, और ओसूल-ए-फिक्ह, की बुनियादी किताबें मिश्कात, जलालैन, हेदाया, शरह अकायद, फल्सफा, हिकमत, मंतिक़, आदि की शिक्षा पूरी कराई, इस के बाद फख्र-उल-औलिया दुनियावी पढाई की तरफ ध्यान दिए, मकामी स्कूल में एडमीसन  लिया मीडिल क्लास तक पढाई करते रहे, क्लास में फस्ट पोज़ीशन पर रहे, अच्छे नम्बर से इम्तेहान में पास हुए और 22 वर्ष की आयू में धार्मिक और दुनियावी पढाइ पूरी कर ली।

::बैअ़त (मूरीदी) व खेलाफत::
आप के पिता सय्यद शाह अब्द-उस-शकूर ने आप को सय्यद शाह सुल्तान हसन क़ादरी की बारगाह में मिन्डारा शरीफ जिला ईलाहाबाद भेज दिया,
सय्यद शाह सुल्तान हसन क़ादरी एक पहुंची हुई हस्ती और बा करामत पीर थे फखरुल औलिया उन के पास जाकर अलौकिक शक्तियों की प्राप्ती के लिए जप तप कर  के उसे हासिल कीं और कई साल तक उन से शिक्षा लेते रहे,जब आप जाहिरी बातीनी ज्ञान प्राप्त कर लिए  तो सय्यद शाह सुल्तान हसन क़ादरी ने कादरी  सिलसिला में बैअत (गुरमुख) ली और इस की इजाज़त भी दी,

::शादी मुबारक::
मिन्डारा शरीफ मे रहने के जमाना ही में आप काफी मशहूर हो गए थे,इसी वजह से आप की शादी का रिश्ता दूर दूर से आने लगा, मगर पीर के हुक्म के मुताबिक सन 1294ھ को पिता ने फखर-उल-औलिया के लिए सय्यद शाह “सज्जाद अली„ की लड़की से रिश्ता मंजूर कर लिया और  निकाह हो गया और सय्यद शाह सुल्तान हसन क़ादरी علیہ الرحمہ ने निकाह पढाई।

::औलादें::
आप की तीन औलादें हुईं, तीनों लड़के, लड़कियां एक भी नहीं,
(1) हजरत शैख-ए-क़ादरियत अ़ल्लामा शाह सूफी सय्यद “अब्द-उल-क़ुद्दूस„ क़ादरी علیہ الرحمہ मज़ार पाक शहडोल MP

(2) हजरत मखदूम शाह सुफी सय्यद वसीयुद्दन अहमद क़ादरी علیہ الرحمہ नैनीचक अल्लाहाबाद

(3) हजरत मखदूम शाह सुफी सय्यद वलीउद्दीन अहमद क़ादरी علیہ الرحمہ मज़ार पाक जहांगीर नगर, फतहपूर (यूपी)

हजरत  अ़ल्लामा सूफी सय्यद “अब्द-उल-क़ुद्दूस„ क़ादरी علیہ الرحمہ के लड़के हज़रत सूफी सय्यद शाह अब्द-उर-रब साहब علیہ الرحمہ हैं, जो कालरी (कोईलरी)में सरकारी सर्विस कर रहे थे फरवरी 2013 मे रिटायर हुए,  इस के अलावा खानक़ाहे क़ादरिया, फखरिया (क़ादरी आस्ताना) के सज्जादा नशीन (उत्तराधिकारी) और दारुल उलूम क़ुद्दूसिया अहल-ए-सून्नत फखरुल उलूम परसौनी बाज़ार महाराजगंज (यूपी) के सरपरस्त (संगरक्षक) भी थे, जिन का इंतेक़ाल (देहांत) 5 मुहर्रम 1439 ھ मुताबिक़ 25 सितम्बर 2017 में हुआ,

हजरत मखदूम शाह सुफी सय्यद वसीयुद्दन अहमद क़ादरी علیہ الرحہ जिन के बारे में इन के पिता ने फरमाया था कि मेरा दुसरा बेटा हकीम सूफी होगा, इन के दो पुत्र हैं (1) सय्यद शाह वजीहुद्दीन उर्फ बन्दे मियां (2) सय्यद शाह मुहम्मद फोज़ैल साहब दोनो साहबज़ादे हयात से (जीवित) हैं और धर्म प्रचार प्रसार में व्यस्त हैं,

हजरत सुफी सय्यद वलीउद्दीन अहमद क़ादरी علیہ الرحمہ जिन के बारे में उन के पिता ने फरमाया कि यह आखरी शैख  होगा,
इन की दो शादी हुई, लगभग 30 साल की उम्र में पहली पत्नी सय्यदा आलिया जो बेटी हैं सय्यद मुज्तबा खलीलपूरी की का पैगाम आने पर हा कह दिया गया और निकाह कर दिया गया इन से दो औलादें हुईं एक लड़का और एक लड़की बाल अवस्था ही में दोनो का देहांत हो गया और आप की पत्नी भी इस दुनिया को अलविदा कह के बाकी रहने वाली दुनिया में चली गईं यानी इन का भी देहांत हो गया,पहली बीवी के इन्तेकाल के छ: सात वर्ष गुजर जाने के बाद घर वालों व कुछ लोगों के बार बार कहने के बाद मिनहाज पूर कोशाम्बी में आप का दुसरा निकाह हुआ,सय्यदा कनीज़ फातेमा मखदूम सय्यद मिनहाजुद्दीन हाजियुल हरमैन बिहारी के खानदान से थीं जो बहुत ही पाक सीफत परहेजगारी, वगैरह की मालकिन थीं,
दूसरी पत्नी सय्यदा कनीज़ फातेमा से छ: लड़के और 3 लड़कियां हुईं छ:में से 5 का बालावस्था ही में इन्तेकाल (देहांत) हो गया आखरी साहबजादे मखदूम शैख शोएब अहमद जो मश्हूर हैं सय्यद गुलाम ग़ौस़ मियां कादरी के नाम से हैं, जो आप के खलीफा और उत्तराधिकारी बने,
तीन लड़कियों के नाम यह हैं
(1) सय्यदा सितारा खातून
(2) सय्यदा नजमा खातून
(3) सय्यदा अंजुम खातून


::परसौनी बाज़ार में आगमन::
घरेलू  अवश्यकताओं को पूरा करने के बाद धर्म प्रचार की तरफ ध्यान केन्द्रित किया,
सुफी सय्यद शाह अब्द-उस-शकूर सोहरवर्दी के मूरीदीन (चेले) की अच्छी खासी संख्या बिहार बलिया के कुछ एलाक़ों में थी पहले आप ने वहां की यात्रा किया फिर बंगाल, अंडमान, तक गए वापसी में मखदूम-ए-बिहार के दरबार में हाज़री दी पटना आने के बाद मालूम हुआ कि बरेली शरीफ के बड़े हज़रत यहां आए हैं आप अल्लामा ज़फरुद्दीन बिहारी के पास गए वहीं सदरुश्शरिया और आला हज़रत رضی اللہ عنھما से मुलाक़ात की फिर कुछ दिनो तक उत्तर प्रदेश में टांडा के अलाक़ों में ठहरे धर्म प्रचार किया फिर नेपाल के सरहदी क्षेत्रों की तरफ ध्यान दिया और शाअ़बान 1338ھ को जुमा की नमाज पढने के लिए गोरखपूर की मस्जिद में हाज़िर हुए नमाज़ के बाद जप तप (औराद व वजीफा) में लीन हो गए, तभी परसौनी बाज़ार के कुछ लोग जैसे अब्दुल करीम उर्फ बंधू शैख, और अली एमाम, वगैरह नमाज़ के बाद मस्जिद के एक कोने में बैठे कुछ बाते कर रहे थे, उन लोगों की नज़र फख़रूल औलिया पर पड़ी इन को देख कर बहुत प्रभावित हुए  और फख़रूल औलिया के पास आकर बैठ गए,और उन्होने कहा होजूर हमारा एलाका बहुत ही पिछड़ा और जहालत का गढ है, इस्लाम बराए नाम है ,अगर हमारे तरफ ध्यान दें तो शायद आप की चर्णो की बरकत से कुछ सूधार बो जाए,
आप ने फरमाया: तुम मुझे जानते हो?
कहने लगे: जानते तो नहीं मगर नूरानी सूरत से पता चल रहा है कि इस्लाम के सच्चे प्रचारक हैं, गुस्ताखी मोआफ करें,
आप ने फरमाया: गुस्ताखी की कोई बात नहीं मेरा काम धर्म प्रचार है  अगर मेरी वहां जरूरत है तो फिर मुझे अपने साथ ले चलो,
उन लोगों ने फखरूल औलिया को अपने साथ परसौनी लाए और इन्ही लोगों के यहां रह कर दीन का प्रचार करना शूरू किया,लोगों नें दिल खोल कर आप की मदद की और हमेशा मदद कौ तत्पर रहे।

::शक्ल व सूरत::
कद: लम्बा,
जिस्म: भरा हुआ पुर गोश्त,
चोहरा: गोल,
रंग: सफेदी लिए हुए गोराई,
आंखें: गोल और जलाल से भरी हुई,
दाढी: काफी घनी सीने तक फैली हुई,
आखरी उम्र में सर और दाढी के बाल सफेद हो गए पैदल ज्यादा यात्रा करते, चलने में तेज़, लेहजा नरम, थकान का असर जाहिर नही होता यानी पता नही चलता,

::खाना पीना::
खिचड़ी, जौ या गेहुं की चपाती, कद्दू की सब्ज़ी साग, मुर्गा बकरा का गोश्त कभी क कभी कभी,

वस्त्र: कपड़े की दो पलिया टोपी, अमामा (पगड़ी), लुंगी, कभी कभी पजामा,चांदी की एक नग वाली अंगूठी, असा(लाठी), खद्दर की शिर्वानी, और खद्दर का कलिदार कुर्ता, खद्दर की बन्डी।

::वेसाल देहांत::
तब्लीगी दौरे  से वापसी के बाद अब्दुल करीम उर्फ बंधू शैख के घर रुके अब्दुर्रहीम (जिनकी बैलगाड़ी से सफर करते थे) को बुलाया और कहा:
अब तब्लीग (धर्म प्रचार) में नही जाना है तुम आज़ाद होकर अपने घरेलू काम में लग सकते हो, फिर अपनी मुरीदा (मुरीदनी) मरयम को बुलाया अपनी अंगूठी, अमामा (पगड़ी) दिया और फरमाया मेरा बड़ा लड़का “अब्द-उल-क़ुद्दूस„ जब परसौनी आए तो उसे दे देना उस के बाद नहाया कपड़ा बदले ज़ोहर की नमाज़ पढी, फिर चारपाई पर लेट गए मुरीदों से कहा कि ना मेरा बदन छूना, और ना ही चारपाई यहां से हटाना उस के बाद लीन होकर अल्लाह की याद में डूब गए।
लगातार कई दिनों तक उसी तरह धूप में बेगैर कुछ खाए पिए लीन रहे, इस से पहले भी ऐसे ही मोराकेबा में बैठते मगर इतना लम्बा नहीं, दो दिन गुजरने के बाद लोगों कू परिशानी बढी,धूप,शबनम(ओस), बारिश से बचने के लिए कुछ लोगों ने चारपाई उठा कर कमरा में कर दिया, और फखरूल औलिया को चारपाई पर लेटा दिया यह वाकेया “21 सफर 1348ھ मोताबिक 1928ई.„ का है,
लोगों ने देखा आंखें बंद है सांस रुकी है डॉक्टर बुलाए गए उन्होंन जांच किया और कहा जुबान का हिलना और और दिल की धड़कन अल्लाह का जिक्र करने की वजह से है वरना हकीकत में आप का इंतेकाल (देहांत) हो गया है, हालांकि बात यह नही थी,
यह बात जंगल की आग की तरह फैल गई जवार के लोग उमंडते हुए सैलाब की तरह आने लगे, कुछ लोगों के जरिए, नहला धुला कर नमाज़-ए-जनाज़ा पढी गई गांव के उत्तर दिशा में दफन किया गया।
और एक अजीम हस्ती दुनिया की नजर से ओझल हो गई।

::करामत:
“किसी के वली होने के लिए करामत जरूरी नही ,
फखरूल औलिया करामत के बाब में फरमाते हैं कि तुम ने अकाबेरीन (बड़े विद्वान) की किताबों में नही पढा? एमाम ग़ेजाली के अकवाल(वाणी) नही सुना? कि आप फरमाते हैं, कि किसी को हवा में उड़ते देख कर यह ना समझो कि वह वली है जब तक कि उस के अन्दर अल्लाह का डर ना देख लो„ (سیرت فخرالاولیاء ص52)

करामत 1–: मुहम्मदपूर टांडा ज़िला फैज़ाबाद का वाक्या है एक बार फखरूल औलिया मुहम्मदपूर गांव में मौजूद थे इशा की नमाज़ के बाद आप मुरीदीन को ज्ञान की बातें बता रहे थे  उसी बीच जनाब लाल मुहम्मद साहब उर्फ कालू शैख (जिन के यहां फखरूल औलिया ठहरे हुए थे) कहा कि अमुक ने यह करिश्मा दिखाया अमुक ने यह करिश्मा दिखाया,कुतबुल औलिया को जोश आ गया क्या कमाल किया अगर मैं यह कहूं कि (इशारा करते हुए) यह पेड़ यहां से वहां चला जाए तो क्या कमाल किया कमाल तो यह है कि मुहम्मद की शरीयत पर डटा रहे ,आप का यह फरमाना था कि पेड़ उसी जगह जा लगा जिस जगह के लिए आप ने इशारा फरमाया था।

करामत 2–: हजरत कुतबुल औलिया के देहांत के एक साल बाद का वाकेया है, एक बार मास्टर अब्दुर्रशीद साहब बलियावी के पैर में बहुत बड़ा फोड़ा निकल आया था  डॉक्टरो नें जवाब दे दिया था उन के भाई अब्दुस्सुब्हान कल्कत्ता में कम्पाउंडर थे अब्दुर्रशीद अपने भाई अब्दुस्सुब्हान के साथ कलकत्ता ऑप्रेशन की नियत से गए घर से हस्पताल अपने भाई के साथ जा रहे थे अचानक सिन्दुरिया पट्टी के पश्चिम सड़क पर होजूर कुतबुल औलिया से मुलाकात हो गई आप ने फरमाया कि “कहां की तयारी है„ अब्दुर्रशीद ने बताया कि फोड़े का ऑप्रेशन कराने जा रहा हुं डॉक्टरों ने जवाब दे दिया है, आप ने कह फोड़ा दिखाओ अब्दुर्रशीद ने फोड़े को दिखाया आप ने हाथ फेरा और कहा “कहां फोड़ा है„ फोड़ा फौरन (तुरंत) गायब हो गया।
(از منہ شیخ المشائخص 70)

 (और विस्तार से जानने के लिए किताब “सीरत-ए-फखरूल औलिया„ को पढें)

(ماخذ و مراجع:)
(سیرت فخرالاولیاء، اجالوں کا سفیر، از منہ شیخ المشائخ )

نوٹ: کہیں کہیں اصل کتاب کے جملوں کو چھوڑ کر صرف مفہوم جملہ لیا گیا ہیے تاکہ قاری کو سمجھنے میں آسانی ہںو٬ نیاز احمد نظامی)

तालीफ: नेयाज अहमद निज़ामी


Friday, September 28, 2018

नाप तौल इंसाफ से करो:मो0 ज़ीशान रज़ा मिस्बाही (हिन्दी:नेयाज़ अहमद



रब फरमाता है:
وَأَوْفُواْ الْكَيْلَ وَالْمِيزَانَ بِالْقِسْطِ لاَ نُكَلِّفُ نَفْسًا إِلاَّ وُسْعَهَا, (سورہ الانعام ۱۵۲)
तरजुमा: और नाप और तौल इंसाफ के साथ पूरी करो,  हम किसी जान पर बोझ नहीं डालते मगर उस के मक़दूर (ताकत) भर।

दूसरी जगह अल्लाह फरमाता है:
وَأَوْفُوا الْكَيْلَ إِذَا كِلْتُمْ وَزِنُوا بِالْقِسْطَاسِ الْمُسْتَقِيمِ ۚ ذَٰلِكَ خَيْرٌ وَأَحْسَنُ تَأْوِيلًا (سورہ الانعام ۳۵)
तरजुमा: और नापो तो पूरा नापो और बराबर तराजू से तौलो, यह बेहतर है और इस का परिणाम अच्छा।

सुरह रहमान में है:
وَوَضَعَ الْمِيزَانَ أَلَّا تَطْغَوْا فِي الْمِيزَانِ وَأَقِيمُوا الْوَزْنَ بِالْقِسْطِ وَلَا تُخْسِرُوا الْمِيزَانَ،(سورہ الرحمن ۷-۸-۹)
तरजुमा: यानी अल्लाह ने तराज़ू रखा ताकि उस से चीज़ों (वस्तुओं) की कमी ज़्यादती मालूम हो जाएं और लेन देन में इंसाफ बना रहे,और किसी का कोई हक़ ना मार सके,

सुरह हदीद में है:
وَأَنْزَلْنَا مَعَهُمُ الْكِتَابَ وَالْمِيزَانَ لِيَقُومَ النَّاسُ بِالْقِسْطِ ۖ (الحدید 25)
तरजुमा: और उन के साथ केताब और अद्ल (इंसाफ) की तराज़ू उतारी कि लोग इंसाफ पर कायम (अटल) हों, 
इसयन कुरआनी आयतों से हमें मालूम होता है कि नाप तौल मे इंसाफ से काम लिया जाए और कमी से बचा जाए बल्कि बचना ज़रूरी है वरना हम अल्लाह की ना फरमानी की वजह से अज़ाब के ज़िम्मादार जैसा कि हम से अगली उम्मत पर हुआ था,

:: ना हक तौलने वालों पर अजाब ::
सूरह आअराफ में है:
وَإِلَى مَدْيَنَ أَخَاهُمْ شُعَيْبًا قَالَ يَا قَوْمِ اعْبُدُواْ اللَّهَ مَا لَكُم مِّنْ إِلَهٍ غَيْرُهُ قَدْ جَاءَتْكُم بَيِّنَةٌ مِّن رَّبِّكُمْ فَأَوْفُواْ الْكَيْلَ وَالْمِيزَانَ وَلاَ تَبْخَسُواْ النَّاسَ أَشْيَاءَهُمْ وَلاَ تُفْسِدُواْ فِي الأَرْضِ بَعْدَ إِصْلاحِهَا ذَلِكُمْ خَيْرٌ لَّكُمْ إِن كُنتُم مُّؤْمِنِينَ، (الاعراف 85)

तरजुमा:और मदयन की तरफ उन की बेरादरी से शोएब को भेजा (शोएब ने) कहा ऐ मेरी क़ौम अल्लाह की इबादत (पूजा) करो, इस के सिवा तुम्हारा कोई माअबूद (पुज्यनीय) नही, बेशक तुम्हारे पास तुम्हारे रब की तरफ से रोशन (खुली हुई) दलील आई (चमत्कार), तो नाप और तौल पूरी करो और लोगों की चीजे़ं घटा कर ना दो और जमीन में इंतेज़ाम के बाद फसाद ना फैलाओ यह तुम्हारा भला है अगर ईमान लाओ,

सूरह हूद में है:

وَاِلٰى مَدْيَنَ اَخَاهُـمْ شُعَيْبًا ۚ قَالَ يَا قَوْمِ اعْبُدُوا اللّـٰهَ مَا لَكُمْ مِّنْ اِلٰـهٍ غَيْـرُهٝ ۖ وَلَا تَنْقُصُوا الْمِكْـيَالَ وَالْمِيْـزَانَ ۚ اِنِّـىٓ اَرَاكُمْ بِخَيْـرٍ وَّاِنِّـىٓ اَخَافُ عَلَيْكُمْ عَذَابَ يَوْمٍ مُّحِيْطٍ (84) وَيَا قَوْمِ اَوْفُوا الْمِكْـيَالَ وَالْمِيْـزَانَ بِالْقِسْطِ ۖ وَلَا تَبْخَسُوا النَّاسَ اَشْيَآءَهُـمْ وَلَا تَعْثَوْا فِى الْاَرْضِ مُفْسِدِيْنَ (الھود 84-85)
तरजुमा: और मदयन की तरफ उन के हम कौम शोएब को (भेजा, शोएब ने) कहा ऐ मेरी क़ौम! अल्लाह को पूजो उस के सिवा तुम्हारा कोई माअबूद (पुज्यनीय) नही और नाप और तौल में कमी ना करो बे शक मैं तुम्हे आसूदा हाल(कुशल मंगल) देखता हुं, और मुझे तुं पर घेर लेने वाले दिन के अजाब (दंड) का डर है, और ऐ मेरी क़ौम! नाप और तौल इंसाफ के साथ पूरी करो और लोगों को उन की चीज़ें घटा कर ना दो और ज़मीन में फसाद मचाते ना फिरो।

इन उपर की आयतों में हजरत शोएब علیہ السلام की कौम का जिक्र है,  हजरत शोएब علیہ السلام ने अपनी कौम को पहले तौहीद का आदेश दिया और उस के बाद उन के अन्दर जो बुराईयां थीं, उन से मना किया , उन में जो बुराई सब से ज़्यादा उन के अन्दर घर कर गई थीं, “वह नाप तौल में कमी थी,,  हजरत शोएब علیہ السلام इस बुराई से बार बार उन को रोकते रहे और खुदा के अज़ाब का डर दिलाते रहे कि अगर वह इस से नही रुके तो उन पर खुदा का ऐसा अजाब उतरेगा जिस में वह सब के सब बरबाद हो जाएंगे, मगर उन की कौम के घमंडी लोग इस से बाज नही आए, और  हजरत शोएब علیہ السلام को धमकी देने लगे कि हम तुम्हे और तुम्हारे साथ मुसलमानो को बस्ती से निकाल देंगे, इस के अलावा जो बुराईयां उन के अन्दर थीं वह उन से भी नहीं रुके, आखिर कार ऱब के अज़ाब में गिरफतार हुए और सब के सब हलाक हो गए,
उन की हलाकत का वाक्या कुरअान मजीद की जुबानी सुनिए,
فَأَخَذَتْهُمُ الرَّجْفَةُ فَأَصْبَحُواْ فِي دَارِهِمْ جَاثِمِينَ
الَّذِينَ كَذَّبُواْ شُعَيْبًا كَأَن لَّمْ يَغْنَوْا فِيهَا الَّذِينَ كَذَّبُواْ شُعَيْبًا كَانُواْ هُمُ الْخَاسِرِينَ.(الاعراف -91-92)
तरजुमा: तो उन्हे ज़लज़ले ने आ लिया, तो सुब्ह अपने घरों में ओंधे पङे रह गए शोएब को झुटलाने वाले, जैसा कि उन घरों में कभी रहे ही ना थे, शोएब को झुटलाने वाले ही तबाही में पङे।

हजरत इब्न अ़ब्बास ने फरमाया कि अल्लाह ने उस क़ौम पर जहन्नम (नर्क) का दरवाज़ा खोला और उन पर दोजख की तेज़ गर्मी भेजी जिस से सांस बंद हो गए, अब ना उन्हे साया काम देता था ना पानी,
इस हालत में वह तहखाना में घुस गए लेकिन वहां बाहर से ज्यादा गर्मी थी वहां से निकल कर जंगल की तरफ भागे, अल्लाह ने एक अब्र (बादल) जिस में ठंडी और अच्छी लगने वाली हवा थी उस के साए में आए और एक ने दुसरे को पुकार पुकार कर एकट्ठा कर लिया, मर्द औरत बच्चे सब एकट्ठा हो गए,तो वह अल्लाह के हुक्म (आदेश) से आग बन कर भङक उठा, तो वह उस में इस तरह जल गए जैसे भाङ में कोई चिज़ भुन जाती है।
यह हमारे लिए सीख है, लेहाजा हमें अपनी कमी देखनी चाहिए और उसे जल्द से जल्द समाप्त करनी चाहिए,यह बुराई बहुत पाई जाती है, खासकर व्यापारी इस में ज्यादा सम्मीलित हैं जो नापने तौलने का काम करते हैं,ऐसोंको जल्द से जल्द इस बुरी लत से बचना चाहिए। ||समाप्त||
(دس اھم احکام قرآن۹۵ تا ۹۸)


Thursday, September 27, 2018

मुसलमानों की आराम खोरी या हराम खोरी:नेयाज़ अहमद (हिन्दी अनुवादक)

लेखक: जावेद चौधरी::


हमने अपने 14सौ वर्षों के इतिहास में गैरों को इतना फतह नही किया जितना हम एक  दुसरे को फतह करते रहे,आप को शायद यह जान कर आश्चर्य होगा कि मुसलमानों नें दुनिया का 95% इलाक़ा इस्लामी सन की पहली शताब्दी में फतह कर लिया था ।
• मुसलमान 1350 साल उस एलाके के लिए एक दूसरे से लङते रहे,
• हमारे  ज्ञान, फलसफा, साइंस, और इजादात की 95% इतिहास भी सिर्फ 300साल तक घेरे हुए है,
• हम ने वाक़ई 1000 साल में जंगो के सिवा कुछ नही किया ,
• आप आज 2018 से हज़ार साल पीछे चले जाइए
आप को ..............
•महमूद गजनवी हिन्दुस्तान पर हमले करता मिलेगा,
सब से पहले मुल्तान पर हमला करके इस्माईली फिर्क़े के मुसलमानों का क़त्ल-ए-आम किया करता था और दौलत लूट ले जाता था,
• आप स्पेन में मुसलमान के हाथों मुसलमान  का गला कटते देखेंगे ,
• आप को तुर्की में सलजूक तलवारें  उठा कर फिरते नजर आएंगे,
• आप को अरब में लाशे बिखरी मिलेंगी,
• शिया सुन्नी - सुन्नी शिया के सर उतारते नज़र आएंगे,
• मुसलमान  मुसलमान  को फतह (विजय)  करता नज़र आएगा,
• मुसलमान  मुसलमान  की मस्जिदें जलाते दिखाई देंगे,
और........
•  आप मोमिन के हाथों मोमिनों के सरों के मिनार बनते देखेंगे,
• आप 1018ई0 से आगे आते चले जाएं आप के सारे तबक़ रोशन होते चले जाएंगे,
आप को.........
• मुसलमान मुसलमान की हत्या करते और उस के बीच हराम खोरी करते नजर आएंगे,
• हमने उस के बाद बाकी हजार साल तक हराम खोरी के सिवा कुछ नही किया ,

इस्लामी दुनिया हज़ार साल से.....

•कंघी से लेकर नील कटर (nail cutter) तक उन लोगों की इस्तेमाल कर रहा है ..जिन्हें हम दिन में पांच बार बद दुआएं देते हैं,
• आप कमाल देखिए, हम मस्जिदों यहुदियों के पंखे और AC लगा कर,
•इसाइयों की टोटियों से वज़ू करके,
• काफिरों (खुदा का ना मानने वाला) के साउंड सिस्टम पर अज़ान देकर,
और.....
• लादीनों (China) जाय नमाज (مُصلّٰی) पर सजदा करके सारी दुनिया के लादीनों (China) की बरबादी की बद दुआ करते हैं,
• हम दवाएं भी यहूदियों की खाते है,
• बारूद भी काफिरों का इस्तेमाल करते हैं ,
और

::पूरी दुनिया पर इस्लाम के विजयी होनेका स्वप्न भी देखते हैं ::

• आप को शायद यह जान कर आश्चर्य होगा कि हम खुद को दुनिया का सब से बहादुर क़ौम समझते हैं,

लोकिन........
हमने पिछले 500 वर्षो में काफिरों के खिलाफ कोई बड़ी जंग नही जीती, हम 5सदियों से मार और सिर्फ मार खा रहे हैं।

•प्रथम विश्व युद्ध से पहले पूरा अरब एक था यह खेलाफत-ए-उस्मानिया  का हिस्सा था,

•यूरोप ने 1918 में अरब को 12 देशों में बांट दिया, और विश्व की बहादुर क़ौम देखती की देखतू रह गई,

•हम अगर लड़ाकू थे, हमारा अगर लड़ने का 1400 वर्षों का तजरबा था को हम कम से कम लड़ाई ही में ‘‘प्रफेक्ट,, हो जाते,

•और कम से कम दुनिया के हर हथियार पे मैड बाई मुस्लिम (Made by Muslim) का ट्रेड मार्क ही लग जाता,

और...........
•हम अगर दुनिया की बहादुर फौज ही तयार कर लेते तो आज मार ना खा रहे होते,

•आज कम से कम इराक़, लीबिया, मिस्र, अफग़ानिस्तान, और शाम (सीरिया) मानवी विडंबना ना बन रहे होते,

::आप इस्लामी दुनिया की बद किस्मती (दुर्भाग्यता)देखिए::

•हम लोग आज युरोपिय बन्दूक़ों, टेंकों, तोपों, गोलों, गोलियों, और अमेरिकी जंगी जहाज़ों के बेगैर और उन की ‘‘war technologies,, की मदद के बेगैर काबा शरीफ की सुरक्षा भी नही कर सकते,

• हमारी शिक्षा का हाल यह है दुनिया की 100 ही यूनिवर्सीटियों की सूची में इस्लामी देशों की एक भी यूनिवर्सीटि नही आती,

• सारी इस्लामी दुनिया मिलकर जितने रिसर्च पेपर तयार करती है, वह अमेरिकी के एक शहर बोस्टन में होने वाली रिसर्च आधा बनता है,

• पूरी इस्लामी दुनिया के राजा इलाज के लिए युरोप और अमेरिका जाते हैं,

•यह अपने जीवन का आखरी हिस्सा यूरोप, अमेरिका, कैनेडा, और न्यूज़िलैंड में व्यतित (गूजारना) चाहते हैं,

•दुनिया का 90% इतिहास इस्लामी दुनिया में है लोकिन इस्लामी दुनिया के 90% खुश्हाल लोग घूमने फिरने के लिए  पश्चिमी देशों में जाते हैं,

• हम ने 500 साल से दुनिया को कोई दवा कोई हथियार, कोई नया फलसफा, कोई खुराक, कोई अच्छी पुस्तक, कोई नया खेल,
और कोई अच्छा कानून नहीं दिया,

• हमने अगर इन 500 वर्षों में कोई अच्छा जूता ही बना लिया होता तो हमारा फर्ज-ए- कफाया अदा हो जाता,

• हम हजार बरसों में साफ सुथरा मुत्रालय नहीं बना सके, हमने मोज़े,और सिलीपर चप्पल, और गर्मियों में ठंडा और सर्दियों में गरम लिबास तक नहीं बनाया,

• हमने अगर कुरान मजीद की छपाई के लिए कागज प्रिंटिंग मशीन और स्याही ही बना ली होती तो हमारी इज्जत रह जाती, मगर यह भी हमारे अलीमों की बुलंद सोच में बसने वाले ‘‘काफिरों,, ने ही बनाई है,

• हम तो काबा शरीफ के गिलाफ के लिए कपड़ा भी इटली से तैयार कराते हैं,

• हम तो मक्का मदीना के लिए साउंड सिस्टम भी यहूदी कंपनियों से खरीदते हैं,

•हमारे लिए आबे जमजम भी काफिर कंपनियां निकालती है,

• हमारी तस्बीहात और जा नमाज भी चीन से आती है,

• और हमारे अहराम और कफन भी जर्मन मशीनों पर तैयार होते हैं,
• हम माने या ना माने लेकिन यह सत्य है दुनिया के डेढ़ अरब मुसलमान खरीदार से ज्यादा कोई हैसियत नहीं रखते,

• यूरोप जीवन की नेमत तयार करता है बनाता है इस्लामी दुनिया तक पहुंचाता है,

और हम इस्तेमाल करते हैं.......

• और इसके बाद बनाने वालों को आँखें निकालते हैं, और उन पर लाखो मर्तबा लानत और मला मत भेज कर सर फख्र से ऊंचा करते हैं,

• आप विश्वास कीजिए जिस साल ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड ने सऊदी अरब को भेड़ देने से इंकार कर दिया उस साल मुसलमान हज पर कुर्बानी नहीं कर सकेंगे,

• और जिस दिन यूरोप और अमेरिका ने इस्लामी दुनिया को गाड़ियां, जहाज, और कंप्यूटर, बेचना बंद कर दिए हम उस दिन घरों में कैद होकर रह जाएंगे,
• हम शहर में नहीं निकल सकेंगे यह हैं हम और यह है हमारी औकात लेकिन आप किसी दिन अपने दावे सुन लें,
• आप उन नौजवानों के नारे सुन लें जो मैट्रिक का इम्तिहान पास नहीं कर सके,



जिन्हें पेच तक नहीं लगाना आता......
मगर जिस दिन उनके बुढे पिता की दिहाड़ी ना लगे उस दिन उनके घर चूल्हा नहीं जलता,

आप उनके नारे
 उनके दावे सुन लीजिए.....

• यह लोग पूरी दुनिया में इस्लाम (और अब सिर्फ अपने पीर साहब का) झंडा लहराना चाहते हैं,

• यह गैरों को नेस्तनाबूद करना चाहते हैं,

::आप अपने आलिम की तकरीर भी सुन लीजिए::

• अपने माइक की तार ठीक नहीं कर सकते यह अल्लाह और अल्लाह के रसूल का नाम अपने मुरीद को मार्क जुकरबर्ग (Facebook) के जरिए पहुंचाते हैं,

• यह लोगों को थूकने की तमीज नहीं सिखा सके,

• आज तक इब्ने कसीर.(महान इस्लामी विद्वान) इमाम गजाली (महान इस्लामी विद्वान) और मौलाना रूम से आगे नहीं बढ़ सके,

• पूरे इस्लामी देशों में एक भी ऐसा व्यक्ति नहीं जो इब्न अरबी (महान इस्लामी विद्वान) को समझने का दावा कर सके,

 इब्ने रुश्द (महान इस्लामी विद्वान) भी हमें यूरोप के स्कॉलर्स ने समझाया था,

• ईब्न होशाम (महान इस्लामी विद्वान) और इब्न इस्हाक़ (महान इस्लामी विद्वान) भी हम तक ऑक्सफोर्ड प्रिंटिंग प्रेस के जरिए पहुंचे थे,

• लेकिन आप अलीमों की तकरीर सुन लें आपको महसूस होगा कि पूरी दुनिया का सिस्टम इनके पीर साहब चला रहे हैं,

• यह जिस दिन आदेश देंगे उस दिन सूर्योदय नहीं होगा और यह जिस दिन फरमा देंगे उस दिन पृथ्वी पर अन्न (अनाज) नहीं उगेगा,

:: हमने आखिर आज तक किया क्या है::

 हम किस कर्म पर दुनिया की सबसे बड़ी कौम समझते हैं जो आज तक हर जुम्मा के खुतबा में गला फाड़ फाड़कर मुस्तफा का कानून पर फख्र करने के बावजूद उसे मुसलमानों के किसी भी मुल्क में लागू नहीं कर सके,

 मुझे आज तक इस सवाल का जवाब नहीं मिल सका::

 हम अगर दिल पर पत्थर रख कर यह सच मान लें तो फिर हमें पता चलेगा हमारी ‘‘हराम खोरी,, हमारी जींज का हिस्सा बन चुकी है।
{ہندی ترجمہ کرتے وقت کچھ جگہ لغوی معنہ کو نہ لکھکر عرفی و مفہومی معنہ کر دیا گیا تاکہ قاری کو سمجھنے میں آسانی ہںو،نیاز احمد ،}

लेखक: जावेद चौहदरी
मुरत्तिब,तर्जुमा: व तस्हील
 Neyaz Ahmad Nizami