neyaz ahmad nizami

Saturday, January 8, 2022

हाफिज़-ए-मिल्लत का संक्षिप्त परिचय: नेयाज अहमद निज़ामी




जन्म:
1312 हीजरी----1894 ईसवी

हिफ्ज़ मुकम्मल, मदरसा हिफ्ज़-उल-क़ुरआन, मुरादाबाद:
1334 हि0---- 1915 ई0

अरबी पढाई की शुरूआत:
1339 हि0---- 1921 ई0

शिक्षा के लिए जामिया नईमिया मुरादाबाद:
1339 हि0---- 1922 ई0

दार-उल-उलूम मोईनिया अजमेर शरीफ में हज़रत सदर-उल-शरिया से शिक्षा:
1342 हि0---- 1924 ई0

हज़रत अशरफी मियां से बैअ़त (गुरूमुख) व अरादत:
1350 हि0---- 1931 ई0


फरागत (शिक्षा मुकम्मल) दस्तार बन्दी:
1351 हि0---- 1932 ई0

मुबारकपूर में पढाने के लिए आगमन:
1352 हि0---- 1934 ई0

दार-उल-उलूम अशरफिया (बाग़-ए-फिर्दौस) का संग-ए-बुनियाद:

1353 हि0---- 1935 ई0

दर्स-ए-बुखारी की शुरूआ़त:
1357 हि0---- 1938 ई0

दार-उल-उलूम अशरफिया की बिल्डिंग मुकम्मल:
1363 हि0---- 1944 ई0

सुन्नी दार-उल-अशाअत मुबारकपूर का क़ेयाम:
1379 हि0---- 1959 ई0

अशरफिया गर्ल्स स्कूल की शुरूआ़त:
1385 हि0---- 1965 ई0

हज के लिए यात्रा:
1387 हि0---- 1967 ई0

अशरफिया के लिए सरबराह-ए-आ़ला का चयन:
1391 हि0---- 1971 ई0

दर्सगाह अरबी यूनिवर्सीटी का संग-ए-बुनियाद:
1392 हि0---- 1972 ई0

दर्सगाह अरबी यूनिवर्सीटी में पढाई की शुरूआत:
1393 हि0---- 1973 ई0

हॉस्टल यूनिवर्सीटी संग-ए-बुनियाद:
1393 हि0---- 1973 ई0


इन्तेक़ल (देहान्त) :
1396 हि0---- 1976ई0

حیات حافظ ملت صفحہ نمبر 51-52
नोट: बहुत जल्द विस्तार से उन की जिवनी पेश करुंगा।

Thursday, October 8, 2020

मुंशी प्रेमचंद






भारत के सब से ऊंचे महान उर्दू हिन्दी के कहानीकार मुंशी प्रेम चंद ने 1897 से लिखने का काम शुरू क्या। प्रेम चंद की पहली कहानी “संसार का सब से अनमोल रत्न„ 1901 में “ज़माना„ में छपी थी। अपने देशप्रेम की भावनाओं से भरा उन की पहली कहानी “सोज़-ए-वतन„ (سوزِ وطن) 1907 में लोगों के बीच आया था, जिसे तुरंत ब्रीटिश सरकार नें ज़ब्त कर लिया था। इस के बाद उन के अमर उपन्यास “निर्मला„ “प्रतिज्ञा„ “सेवा सदन„ “प्रमाश्रम„ “रंगभूमी„ “कर्मभूमी„ “गोदान„ “कायाकल्प„ “गबन„ वगैरह छपे। इन की कहानियां मानसरोवर नाम से 8 भागों में एकट्ठा की गई हैं। प्रेम चंद ने “मर्यादा„ और “जागरण„ वगैरह पत्रों का भी संपादन किया। इन्होने खुद भी “हंस„ नाम से पत्र निकाला था।  
[ munshi paremchand]
प्रेम चंद का जन्म वाराणसी (उत्तरप्रदेश) के ग़रीब परिवार में हुआ था उनका असली नाम “धनपतराय„ था और वह उर्दू में “नवाबराय„ के नाम से लिखते थे मगर उनके सभी लेख उनके उपनाम (لقب) प्रेमचंद के साथ प्रकाशित हुए। आज़ादी से पहले 1936 में, 56 साल की उम्र में मृत्यू हो गए, उन का निधन होना भी इन की जीवन की तरह सादगी से भरा हुआ था।
[विश्व प्रसिद्ध 101 व्यक्तित्व भाग1 पेज 108]
नेयाज़ अहमद निज़ामी

Friday, October 2, 2020

महात्मा गांधी : नेयाज़ अहमद निज़ामी


मोहनदास करमचंद गांधी (महात्मा गांधी)  हिन्दुस्तान के आज़ादी के  आंदोलन के अगुआ थे। इन्ही की प्रेरणा से 1947 में भारत को आज़ादी हासिल हुई थी। विश्व इतिहास के अमर नायक म

हात्मा गांधी जीवन भर सच्चाई, अहिंसा, और प्यार के रास्ते दिखाते रहे। 

1894 में द. अफ्रीका (south africa) की रंगभेद नीती के खिलाफ में “नेशनल इंडियन कांग्रेस„ ( indain national congress) की स्थापना की। 

1907 में ब्रीटिश शासन के ख़िलाफ इन्होने “सत्याग्रह  आंदोलन„ की शुरूआत की,
1915 में साबर मती (sabar mati) आश्रम की स्थापना की और 
1919 में “सविनय अवज्ञा आंदोलन„ 
1920 में “असहयोग आंदोलन„ 
1930 में “नमक सत्याग्रह„ 
1942 में “भारत छोङो„ आंदोलन की अगुआई किया,
1947 में सांप्रदायिक सदभावना स्थापित करने के इन की कोशिश हकीकत में इन की ज़िन्दगी की खास उप्लब्धी थी। 
भ्रातृभाव कू स्थापना के लिए कई बार इन्होने अनशन भी किया “सत्य के साथ मेरे प्रयोग„ और “आत्मकथा„ नामी किताब इन की अमर रचनाएं हैं, गांधी जी ने हमेशा राष्ट्र के दलित और पीङित लोगों की मदद की, 

अछूतों को “हरीजन„ नाम देकर इन्होने सम्मानित किया,
गांधी जी का जन्म पोरबंदर (गुजरात) में 2अक्टूबर को हुआ था। भारत में शुरूआती पढाई पढने के बाद 1891 में आप ने इंग्लैंड से बैरिस्टरी पास किया। 
1894 में इन्हें द.अफ्रीका (south africa) जाना पङा, जहां से इन का राजनीतिक जीवन की शुरूआत हुई। 
दूसरे विश्व युद्ध में गांधी जी ने अपने देश वासियों से ब्रिटेन के लिए ना लङने के लिए अपील कीया था, जिस की वजह से इन्हें गिरिफ्तार कर लिया गया था। युद्ध के बाद इन्होंने खुद ही स्वतंत्रता की बागडोर संभाल ली, आखिरकार 1947 में हमारे देश को आज़ादी मिल ही गई।
1948 में नाथूराम गोडसे ने अपनी गोली से इन की जीवन लीला समाप्त कर दीया, इस दुर्घटना से सारी दुनिया शोक और गम में डूब गया।  
[विश्व प्रसिद्ध 101 व्यक्तित्व भाग1 पेज 42]



Thursday, April 9, 2020

शब-ए-बरात की इबादत (पूजा)



रसुले करीम ﷺ ने फरमाया शाअबान की पन्द्रहवी रात की इबादत (पूजा) बहुत अफजल (अच्छा) है, उस रात अल्लाह तआ़ला अपने बन्दों के लिए बहुत सारे दरवाज़े अपनी रहमत के खोल देता है, इसी संदर्भ में इस रात करनो वाले कुछ नमाज़े और कुछ ज़िक्र (वज़ीफा) पेश हैं,

नफ्ल नमाज़ें:
(1) शाअबान की पन्द्रहवीं रात स्नान करे अगर किसी वजह से स्नान ना कर पाए तो वज़ू कर के दो रकाअत तहियतुल वज़ू (تحية الوضو) पढे, हर रकाअत में अलहम्दो के बाद आयतुल कुर्सी एक बार, सुरह अख़लास (कुल हुअल्लाहु अह़द) तीन तीन बार पढनी है।

(2) शाअबान की पन्द्रहवीं रात दो रकाअत नमाज़ पढे   हर रकाअत में अलहम्दो के बाद आयतुल कुर्सी एक बार, सुरह अख़लास (कुल हुअल्लाहु अह़द) पन्द्रह पन्द्रह बार सलाम फेरने के बाद दोरूद शरीफ (जो दोरूद आप को याद हो) 100 बार पढ कर रिज़क़ की तरक्की के लिए दुआ करे, इन्शा अल्लाह इस नमाज़ की वजह से बरकत होगी,
(اوقات الصلوۃ ص 22)


Wednesday, August 28, 2019

अपनों की क़ब्र पर जाने से मुर्दा को सोकून मिलता है: नेयाज़ अहमद निज़ामी



अपने अज़ीज़,प्यारे, जाने पहचाने लोगों की क़ब्र  पर जाने से उन्हे उन्स सोकून मिलता है,
पैग़म्बर मुहम्मद ﷺ ने फरमाया:
„انس ما يكون للميت في قبره اذا زاره من كان في دار الدنيا“
तर्जुमा: क़ब्र में मुर्दा का ज़्यादा जी बहलने का वह समय होता है, जब ज़्यारत (दर्शन) को वह व्यक्ती आए जिसे दुनिया में मित्र रखता था। ( شفاءالسقام ص 65)

हज़रत आएशा रजियल्लाहू अन्हू से रावी कि होज़ूर ﷺ ने फरमाया:
ما من رجل یزور قبر اخیه و يجلس عليه الا استانس ورد عليه حتي يقوم.
तर्जुमा: जो व्यक्ती अपने भाई की क़ब्र की ज़्यारत को जाए, और उस के पास बैठे तो वह मुर्दा उस से उन्स (सोकून) हासिल (प्राप्त) करता है। उस का दिल उस को बैठने से बहलता है, और जब तक वह व्यक्ती उस के पास से ना उठे उस का जवाब देता है। (القبور از ابن ابی الدنیا)

अहयाउल ऊलूम की शरह(गाइड) पेज नंम्बर 367में है,
الفضل بن الموفق ابن خال سفيان بن عيينة قال:  لما مات أبي جزعت جزعا شديدا فكنت آتي قبره في كل يوم ثم اني قصرت عن ذلك فرأيته في النوم  فقال: يا بني! ما أبطأ بك عني؟ قلت وإنك لتعلم بمجيئي؟ قال ما جئت مرة إلا علمتها وقد كنت تأتيني فأسر بك ويسر من حولي بدعائك قال:  فكنت آتيه بعد كثيرا.

तर्जुमा:  फज़्ल बिन मोफिक़ सुफियान बिन ऐनिया के मामू ज़ाद भाई कहते हैं कि जब मेरो पिता का देहांत हुआ मैं बहुत परिशान हुआ तो हर रोज़ उन की क़ब्र को दर्शन (ज़्यारत) क जाता था, फिर मैं ने इस में कुछ सुस्ती कर दी, तो उन को ख्वाब ( स्वपन/सपना) में देखा तो कहा:
ऐ मेरे बेटे! क्यूं तुझे मुझसे देर होने लगी?
मैं ने  कहा कि क्या आप को मेरे आने की खबर होती थी?
उन्होने कहा: जब जब तुम आए मुझे खबर हो गई,
और जब तुम आते थे तो मैं तुम्हारे आने की वजह से ख़ुश होता था,
और तुम्हारी दुआ की वजह से मेरे इर्द गिर्द (आजू बाजू) के लोग ख़ुश होते थे,
फज़ल बिन मोफिक कहते हैं यह सुन कर मैं बहुत ज़्यादा जाने लगा।
और इसी किताब में है
قال الحافظ ابو طاھر السلفی سمعت ابا البرکات عبد الواحد بن عبدالرحمن ابن غلاب السوسی بالاسکندریة يقول: سمعت والدتی تقول: رأیت امی فی المنام بعد موتھا و ھی تقول یا ابنتی! اذا جِئتنی زائرۃ فا اقعدی عند قبری ساعة  اتملی من النظر الیک ثم ترحمی علی الخ،
तर्जुमा: हाफिज अबू ताहिर सल्फी कहते हैं:
कि मैने अबुल बरकात अब्दुल वाहिद सूसी से अस्कन्दरीया में सुना, वह कहते थे: मैं ने अपनी मां से सुना कि मैं ने अपनी मां को ख़्वाब में देखा, वह कहती थीं कि मेरी बेटी! जब तु मेरी ज़्यारत (कब्र दर्शन) के लिए मेरे पास आया कर तो एक घंटा मेरी क़ब्र के पास बैठी रह, ताकि मैं जी भर कर तुझ को देखुं फिर मेरे लिए रहमत की दुआ कर।
نُصْرَۃُالاصحاب صفحہ 111


मुरत्तिब,तरजुमा व तस्हील
 Neyaz Ahmad Nizami



Sunday, August 11, 2019

हलाल जानवर का कौन सा हिस्सा खाएं अथवा ना खाएं।

हलाल जानवरों के सभी बदन के हिस्सों का खाना हलाल यानी जायज़ हैं, मगर कुछ हिस्से ऐसे हैं जो हराम या मना या मकरूह हैं।
और वह 22 हैं, जिस का विवरण इस प्रकार हैं।

1 रगों का खून,

2 पित्ता,

3 मसाना,

4 - 5 नर मादा पहचानने की जगह,

6 बैज़े(कपूरे),

7 ग़दूद (गलदोद),

8 हराम मगज़,

9 गरदन के दो पट्ठे,

10 जिगर का खून,

11 तिल्ली का खून,

12 ग़ोश्त खून जो ज़बह करने के बाद निकलता है,

13 दिल का खून,

14 पित्त यानी वह पिला पानी जो पित्ते में होता है,

15 नाक का पानी,

16 पाखाना करने की जगह,

17 ओझङी,

18. आंत(अंतङी),

19 नुत्फा (विर्य),

20 वह नुत्फा (विर्य) कि खून हो गया,

21वह नुत्फा (विर्य)कि गोश्त का लोथङा हो गया,

22 वह नुत्फा (विर्य)कि पूरा जानवर बन गया और मुर्दा निकला  या बेगैर ज़बह मर गया।


(فتوٰی رضویہ جلد 20 صفحہ 240/241)

नोट: इन 22 जगहों को छोङकर बाकी सब का खाना हलाल है, कोई धार्मिक दृष्टीकोण सो कोई हर्ज नही।

नेयाज़ अहमद निज़ामी

Wednesday, May 15, 2019

इंजेक्शन लगवाने से रोज़ा टूटता है या नहीं?:





 चाहे रग(नस) में लगवाया जाए चाहे गोश्त(मांस) में इंजेक्शन लगवाने से रोज़ा नही टूटता,
क्युंकि इस के बारे में कानून यह है कि जेमाअ(पत्नी के साथ संभोग) और उस से जुङी हुयी चीज़ों के अलावा रोज़ा को तोङने वाली सिर्फ वह दवा और ग़ेज़ा (आहार) है जो जिस्म के मसामात (Pores/छिद्र) और रगों के अलावा किसी सुराख से सिर्फ दिमाग या पेट में पहुंचे,दुर्रे मुख्तार जिल्द 2 पेज 108 में है,
الضابط وصول ما فيه صلاح بدنه لجوفه
रद्दुल मुहतार में है ,
الذي ذكره المحققون أن معنى الفطر وصول ما فيه صلاح البدن إلى الجوف أعم من كونه غذاء أو دواء
और फतावा आलमगीरी जिल्द 1 प्रकाशक मिस्र पेज न. 191 में है,
أكثر المشايخ على أن العبرة للوصول إلى الجوف والدماغ،
इन सब अरबी वाक्यों का खुलासा यह है,कि आहार और दवा (अवसधी)उसी वक्त रोज़ा तोङेगी जब दिमाग़ या पेट तक किसी सुराख से पहुंचे,
फतावा आलमगीरी जिल्द1 प्रकाशक मिस्र पेज नम्बर 190 में है
 ”وما یدخل من مسام البدن من الدھن لا یفطر“
 यानी: जो तेल बदन के मसाम  (Pores/छिद्र) के ज़रिए जिस्म में प्रवेश करता है उस से रोज़ा नहीं टूटता,
 अब बात साफ हो गई कि जो इंजेक्शन गोश्त (मांस) में लगता है उस के बारे में तो ज़ाहिर है कि वह पूरे जिस्म में मसाम (Pores/छिद्र) ही के ज़रिए पहुंचता है अत: उस से रोज़ा नही टूटता,
 रह गया रग (नस) का इंजेक्शन तो उस के जिस्म में पहुंचने की कैफियत यह है कि दवा खून के साथ जिस्म में फैलती है, और जानकार लोग यह जानते हैं कि खून नसों से होते हुए दिल में जाता है और वहीं से फिर वापस नसों में आता है इस लिए रगों के इंजेक्शन से भी रोज़ा नही टूटेगा।
 (فتاوٰی فیض الرسول جلد اول ص517/518)


 roza


नेयाज़ अहमद निज़ामी